उमेश प्रसाद सिंह
जब से होश संभाला है, देखता आ रहा हूं हमारे जनतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव चुनाव आयोग की अधिसूचना से शुरू होता है। हमारे बाकी पर्व-त्योहार भले ऋतुओं पर आधारित हैं, मगर हमारा सबसे बड़ा पर्व चुनाव आयोग पर आधारित है। राष्ट्रीय पर्व तो अब भी भारतीय जनता की भागीदारी से वंचित हैं। वह दिन अब भी जन-जीवन के जेहन में जागृत नहीं हो सका है। मगर महापर्व को याद न रख पाना और उसमें शामिल न हो सकना किसी के भी वश के बाहर की बात है। यह महापर्व एक दिन का उत्सव नहीं है, महीनों का है। पखवाड़े और महीने पर्यंत चलने वाले मदनोत्सव के प्राचीन स्वरूप पर हम कतई विश्वास नहीं कर पाते अगर चुनाव पर्व हमारे बीच न होता। यह हमारी प्राचीन परंपरा का एकमात्र जीवित साक्ष्य है।
जब-जब चुनाव आता है, जनता मुश्किलों में घिर जाती है। चुनाव में जनता आखिर क्या करे? इस महापर्व में उसकी भूमिका क्या है? जनता को बताया जाता है, वह निर्णायक है। उसे समझाया जाता है, वह संचालक है। जनता को लगता है कि वह केवल दर्शक है। जनता समझती है, वह श्रोता है सिर्फ। इस उत्सव की समूची प्रस्तुति जनता के हाथ से बहुत दूर है।
हमारा संविधान कहता है, हमारे गणतंत्र में मत सबसे मूल्यवान है। बाकी सब चीजों से महंगा। मगर हमारा संविधान हमारी जनता तक पहुंचा ही कहां है, जो वह उसकी बात जाने। संविधान तो आज भी अदालतों के बंद दरवाजों में कैद है। आज भी वह वकीलों की काली कोट के भीतर दुबका पड़ा है। संविधान तो आज भी अपने रखवालों की मुस्तैद घेरेबंदी में सुरक्षा के लिहाज से पाबंद है। जनता के लिए वोट सबसे सस्ती चीज है। वह दे देगी। उसे देना ही है, तो दे देगी। किसी को भी दे देगी। कौन बड़ा भारी फर्क है, एक-दूसरे में। सब एक जैसे ही तो हैं। समझो तो सब सगे हैं। समझो तो सब बेगाने।जनता वोट दे देगी। वह बिना कीमत समझे, बिना किसी कीमत के दे देगी। नहीं तो दे देगी बहुत-छोटी कीमत पर। जनता अपना वोट आश्वासन पर दे देगी। आज जब बाजार में कोई भी चीज उधार में मिलनी मुश्किल है, जनता वोट आश्वासन के उधार पर दे देती है। सिर्फ दे नहीं देती, देकर भूल भी जाती। वह उधार वसूलने की सोचती भी नहीं। वसूलने का उसे खयाल भी नहीं रहता। उधार खाने वालों की बात ही क्या? वे उसे हजम करके डकारने को बैठे ही हैं। उन्हें अपने कर्ज उतारने की सुधि ही नहीं रहती, उल्टे किसानों के कर्ज माफ करने की मुनादी करते रहते हैं। कितनी मजेदार बात है।
हां, जिनका उधार में विश्वास नहीं, वे नकद लेकर दे देंगे। बहुत जनता तो वोट दारू के कुछ पाउचों पर दे देती है। वोट की ही तो बात है। छोड़ो ले लो। क्या रखा है, अदना-सा वोट में। नहीं भी देंगे तो क्या करेंगे? क्या रख कर अचार डालना है। एक साड़ी, एक कंबल भी वोट के लिए काफी है। मोबाइल और लैपटाप भी वोट देने के लिए उकसाने में कम नहीं है। और कुछ नहीं तो अपनी-अपनी जाति का वास्ता तो है ही। जाति, जनता के लिए इस समय सबसे पसंद की कीमत है, वोट देने के लिए।जनता की पसंद भी जनता के हाथ में नहीं है। जनता को क्या पसंद करना चाहिए, इसका भी निर्धारण राजनीतिक दल ही करते हैं। जनता के लिए राजनीतिक दलों की मुख्य घोषणा जाति पर ही आधारित है, बाकी घोषणा-पत्र तो केवल मीडिया के काम की चीज है। अब तो कई-कई दलों की अपनी जाति है। कई-कई जातियों के अपने दल हैं। फिर भी जनता है। जनता क्या है? यह बड़ा मुश्किल सवाल है। जनता की शक्ल की पहचान कर पाना बड़ा कठिन है। जनता के बारे में सबकी अपनी अलग-अलग समझ और राय है। राजनेताओं के लिए जनता कुछ और है। पत्रकारों के लिए कुछ और। अधिकारियों के लिए कुछ और। बुद्धिजीवियों और लेखकों के लिए कुछ और। व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए कुछ और। जनता के लिए जनता क्या है, पता नहीं। जनता में अपने को छोड़ कर दूसरों को जनता समझने की समझ पांव तोड़ कर बैठी है।
हमारे जनतंत्र का जन बड़ा अबूझ है। बूझने की कोशिश में बुद्धि ही हेरा जाती है। अक्ल पर ताले पड़ने लगते हैं। अब भला कौन इतनी मशक्कत मोल ले। सो, अक्सर लोग इसे छोड़ देते हैं। क्या फायदा इतनी माथापच्ची करने का। जन को न समझने से भला कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा। जन जो है, है। जिसके लिए जो है, रहे। किसी के लिए जन सिर्फ वोट है। संज्ञा नहीं है। संख्या है। किसी के लिए घूस है। किसी के लिए जन, जी हुजूरी है। चमचागिरी है। जो घूस देने में तनिक न हीलाहवाली करे, जो घूस देकर खुशामद भी करे। दांत भी निपोरे। वह जन है। ठीक जन है। काम का जन है। पहचान का जन है।किसी के लिए जन कंगाल है। जिसके पास कुछ नहीं है, न बल, न बुद्धि, न धन, न अन्न। जो भूखा है। जिसके आगे जूठी रोटी का भी टुकड़ा फेंक दो, लपक लेगा। यह जन भी ठीक जन है। किसी के लिए जन, वंचित है। शोषित है। जिसको धोखा दिया है। जिसको कुचला गया है, दबाया गया है। जिस पर बड़ा जुर्म किया गया है। बड़ा सताया गया है। जो बेजुबान है। जो बेजुबान है, उस जन की जुबान बनने के लिए जबान वालों के बीच धक्का-मुक्की है। यह जन भी ठीक जन है। काम का जन है।
किसी के लिए जन का मतलब जाति है। किसी के लिए धर्म है। किसी के लिए जन का मतलब देशप्रेम के पाखंड का पुजारी है। बहुत-बहुत से मतलब हैं।
कुल मिलाकर हमारे जनतंत्र में जन के पहचान का जो चेहरा विज्ञापित चेहरा है, वह बड़ा विद्रूप चेहरा है। बड़ा शर्मनाक चेहरा है। माथा लज्जा से झुक जाता है। हमारे जनतंत्र का जन ऐसा क्यों है? अगर इसी जन का हमारा जनतंत्र है, तो कैसा है?जब हमारा जन ही जुगुप्सित होगा। जब जन जुगुप्सा कारक होगा तो भला हमारा जनतंत्र गरिमायम कैसे हो सकेगा?
अब जन क्या करे? जनता क्या करे? जनता जय बोलने के अलावा क्या करे? कर भी क्या सकती है। जब हमारे जन की पहचान ही इतनी पिछड़ी हुई है। समय से बहुत पीछे पड़ी हुई है तो हमारा विकास अग्रगामी कैसे बन सकता है?नहीं बन सकता। वोट देना जनता का चुनाव नहीं, जनता की विवशता है। उसे देना ही है, इसलिए दे रही है। न भी दे तो क्या होगा। कुछ नहीं। देगी भी तो क्या होगा? कुछ नहीं। जाने कितनी बार देकर देख लिया है। सबका कहा मान लिया है। किसी ने अपना कहा नहीं किया है। वह अपना कहा करे भी क्यों। उसने जिस जन को विज्ञापित किया है, उसकी पहचान को बचाए भी रखना है। इसलिए बचाए रखना है कि वह काम का जन है। वह जनतंत्र की सत्ता के लिए बड़े काम का जन है। इसकी पहचान बदली तो फिर सत्ता का खेल आसान नहीं रह जाएगा। लोहे के चने चबाने पड़ जाएंगे। यह जय बोलने वाली जनता ठीक है। यह जितने लंबे समय तक ऐसी बनी रहे, ठीक है। जनतंत्र के लिए जय बोलने वाली जनता ठीक है। हमारा जनतंत्र जय बोलने का जनतंत्र है। ०
