रणजीत साहा
अलेक्सेई माक्सिमोविच गोर्की समाज के निचले स्तर से आए थे। उनका जीवन बड़ा कठिन था। उन्होंने रूस के जनसाधारण से सदा संबंध बनाए रखा। उनके विचारों, आकांक्षाओं, आवश्यकताओं और दुखों को कभी नहीं भुलाया। वे श्रमिकों और सर्वहारा से उत्कट प्रेम करते थे और उनके खिलाफ किसी प्रकार का अन्याय या उत्पीड़न सहन नहीं कर सकते थे। उन्होंने लोगों के जीवन को सुखी और बेहतर बनाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। यौवनावस्था से ही उन्होंने श्रमिक वर्ग के स्वातंत्र्य आंदोलन में अपनी जिदगी झोंक दी थी। निरंतर स्वाध्याय ने उनके जीवन को न केवल प्रेरित किया, बल्कि अपने देशकाल को समझने और यथास्थिति को बदलने के लिए आंदोलित भी किया। गोर्की ने जीविका के लिए कई जगहों पर काम किया। काम की ज्यादती के बावजूद उन्होंने बहुत-सी राजनीतिक और वैज्ञानिक रचनाओं का अध्ययन किया, जिनमें कार्ल मार्क्स और प्रजातंत्रवादी डेमोक्रेटों का साहित्य भी शामिल था। 1891 में गोर्की ने रूस की पहली बार पैदल यात्रा की, जिसका उद्देश्य था जनसाधारण को निकट से देखना। इस यात्रा से उन्हें तत्कालीन देश की स्थिति, किसानों की बदहाल जिंदगी, शहरी मजदूरों की बदतर हालत, आवारा और भीखमंगों की जहालत की जानकारी मिली। मेहनत-मजदूरी करते किसी तरह जीविका कमाते उनकी अनुभव-यात्रा चलती रही और वोल्गा, दोन, यूक्रेन, बेस्साराबिया, आडेसा और क्रीमिया होती हुई अंत में तिफ्लिस पहुंची। इस यात्रा के दौरान उन्होंने किसानों और कामगारों के साथ काम किया और पानी के जहाजों पर ढुलाई तक की। इस यात्रा में उनका परिचय अजीबोगरीब दुनिया, अनगिनत लोगों और अकूत पात्रों के संसार से हुआ, जिसका उपयोग उन्होंने बाद में यथाप्रसंग अपनी रचनाओं में किया।
कहानियों के साथ उन्होंने उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, लोक साहित्य और निबंध आदि लिखे। उनकी ‘देलो आतार्मोनोवीख’, ‘झीजन क्लीमा सामगीना’, ‘स्तारूखा इजरगोल’ जैसी रचनाएं काफी चर्चित हुर्इं, लेकिन उनके ‘मात्य’ यानी ‘मां’ उपन्यास ने उन्हें न केवल विश्व प्रसिद्धि दिलाई, बल्कि बीसवीं सदी के शीर्ष साहित्यकारों की श्रेणी में सम्मानित स्थान पर पहुंचा दिया। तत्कालीन रूसी समाज, समाजवादी भावबोध और जनवादी आंदोलन को समझने में यह उपन्यास मददगार है। ‘मां’ में गोर्की ने रूसी श्रमिक वर्ग के आक्रोश से उत्पन्न जनशक्ति के चित्रण द्वारा उस युवा शक्ति का आह्वान किया, जो उनके जीवन में संचारित हो चुकी थी। वे उन सभी पीड़ा और यंत्रणा देने वालों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए उठ खड़े हुुए। इसमें श्रमिक क्रांतिकारियों के ऐसे अनेक जुझारू चरित्र उपस्थित हैं, जिनके संघर्ष से हमें श्रमिकों के क्रांति आंदोलन की यथार्थ झांकी मिलती है। इसमें समाजवादी चेतना को सामाजिक यथार्थवाद के संदर्भ में पहले जांचा-परखा गया और फिर जनसाधारण के सम्मुख रखा गया।
1901-02 में नोवोगोरोद और सोर्मोव में मई दिवस के उपलक्ष्य में जो प्रदर्शन हुए और बाद में सोर्मोव कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों पर जो मुकदमा चलाया गया- वही इस उपन्यास का आधार बना। उपन्यास के मुख्य पात्र पावेल व्लासोव और उसकी मां पालेगेया निलोवना का चरित्र सोर्मोव प्रदर्शनों में भाग लेने वाले सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी प्योत्र आंद्रेयेविच जालोमोव और उसकी मां आन्ना क्रिलोवना के बहुत निकट है।
‘मां’ का नायक पावेल व्लासोव हमारे सामने एक साधारण मजदूर के तौर पर आता है। वह वोदका पीकर और रात को रंगरेलियां मनाता और देर रात लौटता। लेकिन ऐसे जीवन से वह स्वयं संतुष्ट नहीं था। जल्दी ही उसे पुस्तकें पढ़ने और क्रांतिकारी दलों में काम करने की रुचि पैदा हो गई। उसने फैक्टरी में श्रमिक युवकों का संगठन किया, रूसी क्रांति के विचारों का प्रचार किया, इश्तिहार बांटे और श्रमिकों में जागृति पैदा की। जब एक दलदली क्षेत्र को सुखाने के खर्च के मामले में फैक्टरी के अधिकारी मजदूरों के वेतन में से एक प्रतिशत कटौती करने पर उतारू थे तो उनका क्षोभ बढ़ गया और पावेल ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए श्रमिकों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया। हड़ताल सफल नहीं हुई और पावेल को उसके साथी अंद्रेई के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन इससे उनके क्रांतिकारी विचारों का दमन नहीं हो पाया। जेल से रिहा होने पर उसने मई-दिवस के अवसर पर प्रदर्शनों का आयोजन किया और इस बार उसे बड़ी सफलता मिली। एक बार फिर उसके गिरफ्तार किए जाने पर फैक्टरी का कामकाज ठप्प हो गया, क्योंकि सारे मजदूर उसके साथ खड़े हो गए।
इस उपन्यास का नाम ‘मां’ रख कर गोर्की ने उपन्यास के प्रमुख विचारों को एक-एक कर समझने और उन पर अमल करने के लिए मां के चरित्र पर विशेष बल दिया था। दरअसल, यह उपन्यास मां के चरित्र के विकास का ही इतिहास है। गोर्की ने इसे निमित्त बना कर वह रास्ता दिखाया, जिसे उस समय के क्रांतिकारियों ने अपनाया था। मां पेलेगेया निलोवना ने कभी अत्यंत कठिन जीवन जिया था। काम के बोझ और पति की मार ने उसे आज्ञाकारिता और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति बना दिया था, जिसके चलते अपने कमरे में बंद मां ने सारा जीवन भय में बिताया था। पहले तो अपने बेटे पावेल और फिर उसके साथियों की बातें और उनके कार्य-कलाप उस अनपढ़ मां की समझ में ही नहीं आते थे, लेकिन वृद्धावस्था के बावजूद उसमें नए विचार और भावनाएं जागृत हो गर्इं और एक नए संसार के प्रति उसकी आंखें खुल गर्इं। वह धीरे-धीरे समझने लगी कि गरीब और लाचार जनता के दुखों का मूल कारण क्या है और इसका समूल नाश कैसे हो सकता है।
मई दिवस को आयोजित कार्यक्रम और उसमें पावेल के भाषण के बाद मची हलचल और सत्ता पक्ष के सिपाहियों द्वारा हड़तालियों को बेदखल किए जाने के बाद उसकी मां के मन में कभी जिस क्रांति बीज का अंकुरण हुआ था, कथाक्रम में उसका पल्लवन निरंतर होता चला गया है। पावेल को सैन्य अदालत द्वारा निर्वासन की सजा सुनाई गई थी और वह एक तरह से लंबे समय तक कथादृश्य से ओझल रहा। इस दौरान उसकी मां उन सभी तैयारियों में सक्रिय रूप से हिस्सा बांटती रही, जो समाजवादी आंदोलन को निर्धारित गंतव्य तक पहुंचाने में सहायक हो सकती थीं। उपन्यास के समापन के कुछ पूर्व सैन्य अदालत के सम्मुख प्रस्तुत होकर पावेल ने निरंकुश शासन और सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया और सामाजिक और जनवादी झंडे तले इसके समर्थन में अपने दृढ़संकल्प को दोहराते हुए उपस्थित जनसमूह के समक्ष अपने वक्तव्य को इतने प्रभावी ढंग से रखा कि उसका वक्तव्य इस सामाजिक क्रांति का घोषणा-पत्र ही बन गया।
पावेल के इस गंभीर और प्रभावी भाषण का अंत इन पंक्तियों से हुआ- ‘मिथ्या प्रचार और लोभ ने पिशाचों और राक्षसों की एक अलग दुनिया बना दी है। हमारा काम जनता को इन पिशाचों से मुक्त कराना है। उन्होंने मनुष्य को जीवन से अलग कर उसे नष्ट कर दिया है, समाजवाद टुकड़े-टुकड़े की गई दुनिया को जोड़ कर एक महान रूप देता है और यह होकर रहेगा।’
इस खुली बगावत का फैसला अदालत ने एक शब्द में किया- ‘निर्वासन’।इसके बाद, जेल जाकर बेटे के साथियों से मिलने के साथ मां पेलेगेवा न केवल क्रांतिकारी इश्तिहार बांटने लगी, बल्कि खुद भी क्रांतिकारी विचारों का प्रचार करने लगी। यहां तक कि जब भ्रष्ट सत्ता पक्ष के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया तो वह लोगों से चिल्ला-चिल्ला कर सच्ची बात बताने से नहीं डरी और लोगों को आगे बढ़ कर संघर्ष करने के लिए कहा। अंतिम बार जब वह गिरफ्तार हुई तो उसने अपराजेय साहस और वीरता का परिचय दिया। पहले वाले भय का अब उसके मन में नामोनिशान तक नहीं रहा।पावेल की मां अब सबकी मां थी और अब उसका एक ही ध्येय था कि कैसे वह इस उद्देश्य में सफल होगी। पुलिसवालों के धक्के और घूंसे खाकर भी वह कहती रही- ‘सच्चाई को तो खून की नदियों में भी नहीं डुबोया जा सकता।’ जब उसके हाथ पर प्रहार करते हुए एक पुलिस वाला उसका गला घोंटने लगा तो वह अंतिम बार इतना ही कह पाई- ‘अरे बेवकूफो, तुम जितना अत्याचार करोगे, हमारी नफरत उतनी ही बढ़ेगी। और एक दिन यह सब तुम्हारे सिर पर पहाड़ बन कर टूट पड़ेगा… कम्बख़्तो!’
