ट्रैफिक जाम जबरर्दस्त था। वाहन हिल तक नहीं रहे थे। सामने बोर्ड लगा था- ‘कार्य प्रगति पर है’। कैसी विडंबना है, कार्य प्रगति पर है, इसलिए हिल तक नहीं पा रहा है। जहां है, वहीं जड़ पड़ा है। बस में लोग अंदाजा लगा रहे थे- सड़क की मरम्मत चल रही है; खुदाई चल रही है; केबल डाला जा रहा है; कोलतार बिछ रहा है- वगैरह। कोई भी नहीं बोला कि कार्य प्रगति पर है। चूंकि यह बोर्ड अंगरेजी में है- वर्क इन प्रोग्रेस, राजभाषा के अनुवादीलालजी के लिए यह वेद-वाक्य ठहरा। शब्द-दर-शब्द फंसाना ठहरा। इसलिए- कार्य प्रगति पर है- वर्क इन प्रोग्रेस। एकदम- ‘कील-कांटा दुरुस्त’ अनुवाद।
आजादी आने तक राज-काज, प्रशासन, कचहरी-कानून का काम अंगरेजी में होता था। अंगरेज शासन-तंत्र ने कुछ शब्द अपने आने के पहले से प्रचलित फारसी और थोड़े संस्कृत के भी ले लिए थे- अर्जीनवीस, मुंसिफ, स्त्रीधन वगैरह। स्वतंत्र देश ने सामाजिक न्याय और अपनी अस्मिता जैसे वाजिब कारणों से हिंदी को राजभाषा बनाया। जाहिर है, हमें खासकर तीन क्षेत्रों में, निश्चित एकरूप शब्दावली अवश्य चाहिए थी- प्रशासन, न्यायपालिका और शिक्षा। इन क्षेत्रों में शब्दों की एकरूपता और स्पष्टता नहीं होगी, तो प्रशासन के आदेशों के अर्थ बदल सकते हैं, कानूनी फैसलों की गलत व्याख्या हो सकती है और हिंदी माध्यम से विभिन्न विषय पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए भ्रम की स्थिति हो सकती है। हिंदी की विभिन्न पाठ्य-पुस्तकों में इंटेलिजेंट कोशेंट (आईक्यू) के लिए बुद्धि गुणांक, बुद्धि भजनफल, बुद्धिबल, बुद्धि लब्धांक जैसे कई प्रतिभाशाली प्रयोग हैं। अंगरेजी में एक आईक्यू और हिंदी में इतने भ्रम!
कानून में शब्दावली एकदम स्पष्ट और भ्रम से परे होनी चाहिए। किसी भी आदेश का केवल एक अर्थ होना चाहिए। जैसे जज साहब ने आदेश लिखा- टु बी हैंग्ड टिल डैथ। यानी मुजरिम को मौत होने तक फंदे पर लटकाया जाए। चाक-चौबंद इंतजाम कि फांसी के तख्ते का अगर कोई कांटा-कब्जा खराब हो और फंदा कसे ही नहीं, तो वकील साहब इस तर्क पर मुजरिम को बचा न ले जाएं कि ‘हैंगिंग’ तो हो गई, हुक्म की तामील हो गई। अब मुजरिम बच गया तो उसकी किस्मत! इसीलिए इंतजाम किया गया और ‘टिल डैथ’ आदेश में चस्पां कर दिया गया।
लेकिन भाई अनुवादीलालजी, इस अभागे बोर्ड पर लिखी इस उपयोगी सूचना को कौन-सी फांसी लग रही थी कि आपने अंगरेजी का पल्लू नहीं छोड़ा। आप भी तो आंख-कान खोल कर लिख सकते थे कि सड़क की मरम्मत हो रही है, खुदाई चल रही है या फिर जो भी वजह रही हो, वह लिख सकते थे। यह न तो प्रशासन का मामला था, न कानून का, न पाठ्य-पुस्तक का। लेकिन आप तो अनुवाद धर्म का ऐसा पालन करते हैं कि दुर्घटना से बचाने के लिए बोर्ड होता है- एक्सीडेंट-प्रोन एरिया; और आप उस इलाके को ही ‘दुर्घटना-ग्रस्त’ कर देते हैं। अनुवादीलालजी आखिर ऐसा क्यों करते हैं! कहते हैं, लाल किले के दीवान-ए-खास की छत के बेल-बूटों के खांचों में कभी जवाहरात भरे थे। उन्हें नादिरशाह लूट ले गया और अंगरेजों ने उनकी जगह रंगीन कांच भर दिए। अनुवादीलाल कभी ऐसे ही कांच भरने वाले कारीगर रहे होंगे; जितनी जगह (अंगरेजी शब्दों के) जवाहरात, उतनी जगह पर (हिंदी शब्दों के) कांच के टुकड़े। ‘एक्सीडेंट-प्रोन जोन’ का अगर ‘दुर्घटना की आशंका वाला क्षेत्र’ करेंगे तो कांच ज्यादा हो जाएंगे, खांचा कैसे भरेगा, इसलिए उन्होंने किया ‘दुघर्टना-ग्रस्त क्षेत्र’। तीन शब्द, एक हाइफन- उधर भी, इधर भी। बासी बचे न कुत्ता खाय। हिसाब बराबर।
दूसरे, अनुवादीलालजी का भारत का इतिहास पांचवी-छठी शताब्दी पर समाप्त हो जाता है- और साथ में हिंदी का भी। इसलिए उनकी अनुवादी हिंदी में अरबी-फारसी मूल से आए शब्दों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि अपनी हिंदी इतनी उदार है कि सभी भारतीय भाषाओं और अरबी-फारसी तो क्या, उसने पुर्तगाली (कनस्तर, गमला, कमरा, गोदाम), तुर्की (तोप, लाश, चाकू, कैंची), फें्रच (कारतूस, कूपन, काजू), जापानी (रिक्शा), चीनी (चाय, लीची) और डच (तुरुप, बम) के शब्द भी आत्मसात कर लिए हैं। अंगरेजी के बेशुमार शब्द तो हिंदी ले ही चुकी है। और अब बॉलीबुड गांधीगिरी, खलास, टशन जैसे शब्दों के साथ हिंदी शब्दकोशों का दरवाजा खटखटा रहा है। हर पनपने वाली, समझदार भाषा उदार होनी चाहिए। अनुवादीलाल को हिंदी का दरवाजा नहीं बंद करना चाहिए, न ही शब्दों की ‘गेट क्रैशिंग’ होने देनी चाहिए कि भाषा में अराजकता फैल जाए। उन्हें एक ‘रजिस्ट्रेशन काउंटर’- यानी हिंदी का आॅक्सफर्ड डिक्शनरी जैसा वैज्ञानिक, मानक शब्दकोश बनाने की कोशिश करनी चाहिए। शब्द आए, नाम-गांव, उम्र (यानी मूल भाषा, अन्य स्रोत, हिंदी में शामिल होने का वर्ष आदि, शब्द की धातु- ‘रूट’ वगैरह) दर्ज कराए और हिंदी का हो जाए। थोड़ी घिसाई-छंटाई के बाद वह हिंदी के व्याकरण के अनुरूप हो जाए। यह व्यवस्था- आॅक्सफर्ड डिक्शनरी की ही तरह एक स्थायी संस्था- स्टैंडिंग इंस्टीट्यूशन- बन जाए, जिसमें नए शब्द लेने, उन्हें व्यवस्थित करने, मानक घोषित करने के निश्चित कायदे हों।
लेकिन अनुवादीलाल ऐसा नहीं करते। मूल पाठ के मकसद और संदर्भ को समझना उनके धर्म के खिलाफ है। वे शब्दावली उठाते हैं, अंगरेजी का शब्द हटाते हैं, हिंदी का पिरो देते हैं। आप उन्हें किसी की ‘निगरानी’ यानी ‘मॉनिटर’ करने को कहेंगे तो वह मोबाइल का इयर प्लग कान पर लगा कर ‘अनुश्रवण’ करने लगेंगे। ‘इन व्यू आॅफ’ होगा तो ‘इसे देखते हुए’ वह काम नहीं करेंगे, ‘दृष्टिगत’ करेंगे। अगर ‘इन दि लाइट आॅफ’ होगा तो वे ‘इसके अनुसार’, ‘इस बात को देखते हुए’, ‘इसके मद्देनजर’, ‘इस सिलसिले में’ नहीं कहेंगे, ‘लाइट’ है तो वे टॉर्च चमका कर एक घेरा आलोकित करेंगे और ‘इस कथन के आलोक में’ ही आपकी चिट्ठी का जवाब देंगे- यानी अनुवाद की राजभाषा में।
अनुवादीलाल भूल जाते हैं कि एक होती है- राष्ट्रभाषा यानी जन-जन की भाषा, आम लोगों की, बाजार की, चौपाल की, प्यार की, गालियों की और दुलार की भाषा। राष्ट्रभाषा में समाज की संस्कृति, इतिहास, परंपरा, रीति-रिवाज, यानी समाज की हर धड़कन बोलती है। दूसरी है- राजभाषा, जिसकी सीमित शब्दावली प्रशासन, कानून, पाठ्य-पुस्तकों की मजबूरी की वजह से है। आदर्श स्थिति यह है कि धीरे-धीरे राजभाषा राष्ट्रभाषा के करीब आती जाए। उसके गढ़े हुए शब्द राष्ट्रभाषा में घुल-मिल जाएं, उसका फलक विस्तृत करें। जैसे संसद, सदन, विधेयक, लोकसभा, विधानसभा, भौतिक विज्ञान जैसे शब्द अब हमें पराए नहीं लगते। राजभाषा, राष्ट्रभाषा के करीब आएगी तो जन-जन के करीब आएगी। राजभाषा का काम प्रशासन, कानून और शिक्षा से जुड़ा है, तो इसके करीब आने से हाकिम जनता के करीब आएगा। यही राष्ट्रभाषा लाने वालों, कानून बनाने वालों का सपना भी था। पर हुआ उल्टा। राजभाषा किसी दूसरे ग्रह की भाषा जैसी कृत्रिम और बेजान हो गई और अंगरेजी की छड़ी घुमाता ‘पब्लिक सर्वेंट’ (जन सेवक) ‘पब्लिक’ का हाकिम बन गया।
कुछ जोड़ने के बजाय, इस बेजान राजभाषा ने राष्ट्रभाषा का काफी नुकसान कर दिया है। सरकारी आदेशों, घोषणाओं, विज्ञापनों के जरिए अंगरेजी की यह बेजान पिछलग्गू भाषा हमारे दिमाग की ‘कंडीशनिंग’ करने लगी है। एक तरफ बचपन से लेकर उच्च शिक्षा अंगरेजी माध्यम में, ऊपर से राजभाषा! असर यह हुआ है कि हम जाने-अनजाने अपनी विशाल शब्दावली, बड़े ही सार्थक देशज शब्द और मुहावरे भूलते जा रहे हैं। उनका प्रयोग गायब होता जा रहा है। अनुवादीलालजी, हमारे पास बहुत शब्द हैं, भाव हैं, अर्थछटाएं हैं। हिंदी समर्थ भाषा है। आप अंगरेजी जितना ही शब्द या वाक्यांश पेश न करें। शब्द के आगे वाक्य भी तो है, जिसका हिंदी का अपना अंदाज है। कोशिश करें कि जैसा बोलें, वैसा लिखें।
परिवहन की भीषण स्थिति को दृष्टिगत करते हुए, आप ‘उपरिगामी सेतु’ पर चढ़ रहे हैं भाई, अंगरेज की जुबान पर ‘ओवर ब्रिज’ चढ़ा है, लेकिन यह क्या रामसेतु है कि आप भारी-भरकम शब्द नहीं बोलेंगे तो रामजी नाराज हो जाएंगे? ध्यान से देखिए- यह तो आपके गांव जैसा ही ‘पुल’ है- ज्यादा से ज्यादा ‘पैदल सड़क पार करने का पुल’, लेकिन बोलचाल में ‘पुल’ से काम चलेगा। मुझे-आपको मालूम ही है कि यह हमारे जैसे ‘पैदलों’ के लिए ही है। ‘उपरिगामी’ तो चाहिए ही नहीं, हिंदी में ‘पुल’ ऊपर ही होता है। जमीन के नीचे तो ‘सुरंग’ होती है!
भाषा भी ‘पुल’ ही है। एक की बात दूसरे तक पहुंचाने का, संपर्क का साधन; एक दिल की बात दूसरे दिल तक पहुंचाने का साधन। आप ऐसे भारी बेजान शब्दों की बमबारी करेंगे तो जुड़ेंगे क्या, दिल तो बेचारे चकनाचूर हो जाएंगे!
