राजकुमार कुम्भज
जरूरी है टकराना
धीरे-धीरे चलता हूं तो भी, तो भी
फिर भी टकराता हूं तो अपनी ही चौखट से
अपनी ही चौखट से टकराना
संभवत: नवीनतम पुनर्जन्म है मेरा
बेदाग नहीं हूं मैं
हजारों, लाखों आरोप हैं मुझ पर
जैसे कि मैं ही हूं अपराधी जनम-जनम का
नदियों की सूख का, विचारों की डूब का
जैसे कि मैं ही हूं अपराधी
सूर्ख की सूख का, विचारों की डूब का
और-और फिर-फिर
फिर भी टकराता हूं अपनी ही चौखट से
धीरे-धीरे चलता हूं धीरे-धीरे ही, तो भी, तो भी
और टकराता हूं धीरे-धीरे ही, तो भी, तो भी
जरूरी है टकराना।
नहीं, मेरे काम की नहीं है
नहीं है मेरे काम की नहीं है
जरा भी काम की नहीं है वह आकाशगंगा
जो बह रही है पृथ्वी को छोड़ आकाश में
मुझे शराब चाहिए देगी क्या वह?
मुझे गुलाब चाहिए देगी क्या वह?
मुझे जवाब चाहिए देगी क्या वह?
आकाशगंगा का आतंक आकाशगंगा
जानती है और जानती है बेहतर
कि आकाशगंगा का आतंक क्या?
मैं नग्न-भूख के आतंक की तरफ गया
वहां चहल-कदमी कर रहे थे चूहे
मैं, हर किसी तिलिस्मी चादर के विरुद्ध
नापता रहता हूं चादर अपनी
जरा भी काम की नहीं है वह आकाशगंगा
नहीं है मेरे काम की नहीं है।
जो भीतर है
जो भीतर है
वह बाहर भी होता
तो क्या होता?
भूखों की वापसी का
पता होता
कबूतर या तोता
नहीं होता
दुख होता, सुख होता
अंतहीन कुर्बान होता
फिर बीत जाती शताब्दियां
जो कि बीत ही गई हैं
फिर भी कुर्बान होता दुख होता
शुष्कता में प्रेम होता
प्रेम में प्रेम भरा प्रेम-पत्र होता
होता कि नहीं होता
किसे पता होता
जो भीतर है।
मेरा सपना
मेरा सपना
सब में हो सब अपना-सा
सब को सब मिले अपना-सा
मिलें जुलें, गले मिलें अपना-सा
सब को सब मिले सपना-सा
सब में हो सब अपना-सा मेरा सपना।

