राकेश भारतीय

मेंरा और राणा का तो रोज का ही कार्यक्रम था, सुबह लगभग एक घंटे की सैर करने के बाद फल-सब्जी की उस दुकान पर रुकना। हम टहलने का समय सेट ही ऐसे करते कि लौटते हुए सब्जी-फल-दूध की दैनिक खरीदारी निपट जाए। पर आज दुकान तक पहुंचने से पहले ही राणा रुक गया और मुझे भी रोककर फुसफुसाया-  ‘दुष्यंत, देख तो! अपने पुराने…..’ और उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही मैं पहचान गया। वही दाहिना पैर थोड़ा घसीटते हुए चलना, वही आसपास से बेपरवाह दिखते हुए भी अपनी छोटी-छोटी आंखों से सब देखते चलना…..  वे सामने से शायद उसी दुकान की दिशा में बढ़ रहे थे, कभी हम दोनों के बॉस रहे महाजन साहब। एक वक्त था जब हमारे बड़े से दफ्तर के बरामदों में इनके निकलते ही अच्छे-अच्छों की पीठ बरामदे की दीवार से सट जाया करती थी। ऐसे कड़क अफसर हुआ करते थे महाजन।

‘मॉर्निंग सर!’, ‘मॉर्निंग सर!’ हम दोनों के अभिवादन से क्षणांश को अचकचाकर वे बोले- ‘यहां भी दोनों साथ-साथ!’
‘हां सर! पहले दुष्यंत रिटायर होकर यहां आया, उसके अगले साल मैं। साथ-साथ ही फ्लैट बुक करवाया था।’ राणा बोला।
‘खुशी हुई तुम दोनों को देखकर।’ अब वे ‘बॉस’ की पुरानी ठसक से बोले। जैसे कह रहे हों, ‘माबदौलत तुम दोनों जूनियरों को देखकर खुश हुए।’
हमने भी पूरी विनम्रता और अदब से बात की, आखिरकार ‘बॉस’ के रूप में उन्होंने हमारे साथ कोई अन्याय तो किया नहीं था। जबकि अलग-अलग कारणों से उनसे ‘औसत’ गोपनीय रिपोर्ट पा चुके कई मातहत उनके ‘अन्यायी’ होने का पानी पी-पीकर बयान करते नहीं थकते थे।
बातों-बातों में एक ही गंतव्य जानकर सब्जी-दूध खरीदना शुरू हुआ। मैंने नोट किया कि वे कुछ सतर्क होकर खरीदारी कर रहे हैं, शायद हम दोनों की उपस्थिति से उपजी असहजता को जाहिर न होने देने के प्रयास में। वैसे सारे ही रिटायर्ड बंदे थे, अफसरी-वफसरी के जो भी सीनियर-जूनियर वाले अवशेष थे वे आदत के वशीभूत ही सलामत थे वर्ना हमारे एक विनोदी बैचमेट की हमारे बीच बेहद लोकप्रिय शब्दावली में- ‘रिटायर होने के बाद रिटायर्ड सेके्रटरी और रिटायर्ड चपरासी की दुनियावी हैसियत बराबर हो जाती है; इसे जितनी जल्दी समझ लो, उतने ही सुखी रहोगे।’
हम अपनी-अपनी टोकरी लिए हुए आदर के भाव से आगे खड़े महाजन साहब का सौदा निपट जाने का इंतजार कर रहे थे कि वे अचानक गर्दन घुमाकर हमसे बोले- ‘ये मेरे कैडर का आदमी है, इसीलिए मैं हमेशा इसी दुकान पर आता हूं।’ और इसके बाद पंजाबी मूल के एक व्यक्ति के हिसाब से ठीक ही भोजपुरी लहजे में उन्होंने काउंटर पर मौजूद लड़के से भोजपुरी में कुछ कहा भी।

काउंटर के लड़के ने उनकी भोजपुरी का कोई भी नोटिस न लेते हुए सारी सब्जी तौल लेने के बाद आराम से कहा- ‘एक सौ छप्पन रुपए, छुट्टा दीजिएगा।’
चुपचाप एक सौ छप्पन रुपए उसे पकड़ाकर महाजन साहब जाने को हुए तो हमने एक साथ ही कहा- ‘गुड डे, सर!’ बेहद हल्की सी मुस्कान से ‘गुड डे’ निपटाकर वे चल दिए। राणा कुछ मिनटों तक उन्हें जाते हुए देखता रहा। फिर हमारी भी सब्जी तुल गई तो भुगतान करने के बाद लौटते हुए वह बोल ही पड़ा- ‘वाह! सब्जी खरीदने में भी कैडर के हिसाब से खरीदेंगे!’
‘कुछ तो चाहिए न अपना शानदार जमाना याद करने को।’
मेरे मुंह से इतना निकलना था कि राणा मखौल की हंसी हंसते हुए बोलता गया-
‘खाक शानदार! इनकी वाली पीढ़ी में बिहार कैडर का बुरा हाल था। मुख्यमंत्री भी ऐसा बदमाश कि सबके सामने मुख्य सचिव से खैनी बनवाता था…..’
‘और वे बनाते थे’ मेरे आश्चर्य पर फिर मखौल की हंसी हंसते हुए राणा बोला- ‘तुम तो बड़ी आसान-आसान जगहों पर नौकरी करते हुए जिंदगी गुजार दिए, तुम क्या जानो….. इनके कैडर में तो कलक्टर को पॉलिटिकल गुंडों द्वारा घेर-घेरकर मारा तक गया था उस जमाने में। अब तो बिहार बहुत सुधर गया…..’
बात को बीच में ही छोड़कर राणा अपने ब्लॉक की तरफ मुड़ गया और मैं अपने ब्लॉक की तरफ बढ़ते हुए सोचता रहा कि अब तो महाजन साहब के दर्शन होते रहेंगे। दर्शन हुआ करीब तीन हफ्ते बाद। इस बार राणा की बीवी के अस्पताल में भर्ती होने के कारण मैं अकेला ही सब्जी की दुकान पर था और भिंडी की ढेरी में से अपेक्षाकृत छोटी-छोटी भिंडियां छांटे जा रहा था। छांटने के बीच में ही महाजन साहब का आगमन हुआ और अभिवादन करने के बाद मैंने सब्जी की ढेरियों की तरफ उनके बढ़ने के लिए थोड़ा किनारे हटते हुए जगह दी। वे सब्जी के ढेर-दर-ढेर का अवलोकन करने में लग गए, मेरी उपस्थिति को जैसे कोई तवज्जो न दी। सैंतीस साल तक नौकरशाही की लगभग इंसानियत-विरोधी ‘तहजीब’ के नस-नस में रचे-बसे होने के बावजूद मुझे महसूस हुआ कि अब ‘सीनियर’ होने की अकड़ का परोक्ष रूप से प्रदर्शन बेतुका है। बहरहाल, मैंने अपनी जरूरत की भिंडियां चुन लीं, उन्होंने अपनी टोकरी में टिंडे चुनकर रख लिए।

काउंटर पर वही लड़का हर दिन ही रहता था, कम भीड़ होने पर गर्मजोशी से मुझे और राणा को नमस्कार भी ठोक देता था।
पर आज भीड़ कुछ ज्यादा ही थी, उसका हाथ तेज-तेज चल रहा था और तमाम तरह के ग्राहकों को निपटाने में उसकी चाय ठंडी हुई जा रही थी।
उस लड़के को सस्ते प्लास्टिक के बदसूरत कप में, सब्जी बेचते-बेचते, चाय पीते हुए मैंने कई बार देखा था। कई बार तो वह मौज में हमें भी चाय पीने का न्योता दे देता था। मैं अपनी टोकरी लेकर आगे बढ़ा और इतना खयाल रखा कि महाजन साहब लाइन में मेरे आगे ही रहें। पर वे पता नहीं किस झोंक में बढ़े और पहले से लगे तीन और ग्राहकों के भी आगे अपने टिंडों की टोकरी रख दी। ‘अरे अंकल जी! लाइन से आइए।’ लड़के ने झुंझलाकर इतना कहा तो महाजन का चेहरा तन गया, टोकरी हटाए भी नहीं। पर लड़का शायद चाय न पी पाने और ज्यादा ग्राहकों को सूखे गले से झेलने की वजह से ज्यादा ही झुंझला रखा था। टेढ़ी नजर से उन्हें देखते हुए बड़बड़ाया-
‘धरे रहिए टोकरी आगे। तौलूंगा मैं लाइन से ही।’
उन असहज क्षणों में मैं महाजन साहब की ओर देखने से बच रहा था, देखता तो देखकर भी न बोलना असहज क्षणों का कोई और ही आयाम खोल देता।
लड़के से सब्जी ‘लाइन से ही’ तुलवाकर और चुपचाप भुगतान कर महाजन साहब आगे बढ़ गए। अपनी सब्जी तुलवाते-तुलवाते मेरी नजरें जा रहे महाजन साहब की दिशा में घूम ही गर्इं।
उनका दाहिना पैर कुछ ज्यादा ही घिसटता हुआ चल रहा था।
मुझे तभी याद आया कि उस कुख्यात मुख्यमंत्री के काल में तो ये अपना कैडर बिहार छोड़कर प्रतिनियुक्ति पर केंद्र सरकार में आ गए थे। क्या पता, अपने कैडर बिहार के आदमी द्वारा संचालित इस सब्जी की दुकान को छोड़कर वे अगली बार सब्जी खरीदने के लिए कोई और दुकान पकड़ लें।
जितना मैं उन्हें जान पाया था सरकारी सेवा के दिनों में, करेंगे वे यही।