पेंच लड़ाने की अपनी मौलिकता है। यह एक कला भी है। लोग पतंग लड़ाते-लड़ाते नैन लड़ाते हैं, तो इस कला के सूक्ष्म सौंदर्य का पता चलता है। इस मामले में हमने बड़े-बड़ों को उलझते देखा है। पतंग आसमान पर है, पर मन बगल की छत पर गिरवी रखा रहता है। भारतीय पतंगबाजी का यह सबसे सुखद पहलू है कि लोग इसके कलात्मक सौंदर्य की भावभूमि को नहीं भूल पाते और निरंतर नैनन की पेंचबाजी करते रहते हैं। वैसे मैंने भी इस तरह की पतंगबाजी की है, पर अब क्या है कि बच्चे छतों पर जा जमे हैं और वहां मेरा जाना लगभग बंद हो गया है। कई बार इच्छा होती है कि छत पर जाकर हालात का जायजा लिया जाए, पर पत्नी के डर से नहीं जा पाता। पत्नी मेरी आदतों से अपरिचित नहीं हैं, वे जानती हैं कि मैं छत पर गया और दो-चार पतंगें काटने के बाद ही नीचे उतरूंगा। वैसे भी मेरे जमाने की नायिकाएं अब प्रौढ़ाएं हो गई हैं और उनकी आंखों में मोतियाबिंद पकने लगा है, इसलिए नैनन के पेंच की संभावना वैसे भी कम हो गई है। हालात देखता हूं तो हृदय चीत्कार कर उठता है कि यह दिन देखने भी नसीब में लिखे थे।
वैसे पतंगबाजी पूरे अनुभव का खेल है। पतंग काटने के लिए केवल मांझा अच्छा हो, पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पेंच लड़ाने का चातुर्य अनिवार्य है। शुरू में पतंगें कटती रहती हैं, पर अगर महारत हासिल कर लो तो फिर पतंगें कटती नहीं, बल्कि काटी जाती हैं। मसलन, नीचे के पेंच में ढील देनी है या खींच के साथ पतंग को काट देना है। धर्मसंकट तो तब खड़ा होता है, जब दूसरे पतंगबाज का पेंच नीचे का हो और आपकी पतंग की डोर ऊपर आ जाए। ऐसे हालात में ढील देते रहने के अलावा कोई चारा नहीं रहता, क्योंकि सामने वाला आपकी पतंग काटने को उतारू रहता है। अब बताइए ऐसे हालात में शर्मिंदा होने के अलावा और क्या चारा रह जाता है?
इसलिए पतंगबाजी का कला-पक्ष अपने आप बड़ा हो जाता है। आजकल क्या हो गया है कि एक ही छत पर अनेक पतंगबाज हो जाते हैं, इससे भी पतंगबाजी के सुखद भविष्य पर अंधेरा छाया है। कुछ पता ही नहीं चल पाता कि कौन किससे पतंग लड़ा रहा है या लड़ाना चाह रहा है। पहले ऐसा नहीं था। पहले पतंगबाज कम थे। दूर तक पतंग उड़ाने वाले नहीं दिखते थे, इसलिए पतंगबाजी आसानी से हो जाती थी, पर जनसंख्या वृद्धि ने इसके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सबसे बड़ी परेशानी लूटने वालों से है। मेरा मतलब यह कि पतंग तो काटो आप और लूट ले जाएंगे लूटने वाले। इसे मैं ब्लेकमेल की श्रेणी में मानता हूं। यानी स्थितियों का फायदा उठाने वालों की कमी नहीं है। झाड़ उठाए पतंग उलझाने के दांव-पेंच करते रहते हैं। इससे मूल पतंगबाजों को बड़ी परेशानी होती है। काटी तो पतंग आपने और पतंग लूटने वाले की होकर रह गई, भला बताइए ऐसी पतंगबाजी से क्या फायदा? लूटने वालों पर अगर नगरपालिकाएं प्रतिबंध लगा दें तो शायद पतंगबाजी का इतिहास ही सबसे अलग हो। मैंने लूटने वालों को कभी पतंग उड़ाते नहीं देखा, वे सदा लूटने में विश्वास करते हैं। ऐसे अनेक पतंग लुटेरे मिल जाएंगे, जिनके पास सभी प्रकार की पतंगें मिल जाएंगी। मसलन, छोटी-बड़ी और रंग-बिरंगी, उस समय सिर पीटने के अलावा क्या चारा रह जाता है। ऐसे भी पतंगबाज हैं, जो पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से पतंग उड़ा रहे हैं, पसीने से नहा रहे हैं और चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, पर पतंगें कट ही नहीं पा रहीं।
अनेक मामलों में लुटेरों से दुखी होकर छत से कूदने की घटनाएं भी प्रकाश में आई हैं। इसलिए यह समय है लुटेरों पर पाबंदी लगाने का। पतंगबाजी के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की भी आवश्यकता है। कहने का तात्पर्य है कि एक छत से केवल एक आदमी पतंग उड़ाए। अब हो यह गया है कि पतंग एक है और उस पर हमला करने वाले पचास हैं। बताइए कि ऐसी स्थिति में पतंगबाजी का क्या आनंद रह जाता है! पर आजकल हो ही ऐसी पतंगबाजी रही है। अनुशासनहीनता की भी हद होती है, कोई गरिमा ही नहीं रही। सारा पतंगबाजी का ‘डेकोरम’ बिगड़ गया है: छोटे-बड़े की लोक-लाज कुछ भी नहीं रही है। कोई किसी भी पतंग पर हाथ दे मारता है। इसलिए इससे ठीक तो यह है कि पतंगबाजी की ही न जाए। छतों के चारों ओर मुंडेरें थोड़ी ऊंची बनाई जाएं तो पतंगबाज आसानी से पूरे उत्साह के साथ पेंच लड़ा सकता है, इसलिए दीवारें ऊंची बनाई जानी चाहिए। वह जिसकी देखना चाहेगा, उसे देख लेगा पर उसे कोई नहीं देख पाएगा।
इसलिए पतंगबाजी में दिलेरी का तो महत्त्व कतई नहीं है। दिलेरी में तो पतंगबाज बहुत जल्दी ‘एक्सपोज’ हो जाता है, इसमें तो बस दिल धड़कता रहे और हर समय यह बना रहे कि नायिका का बाप आ रहा है, तो इससे पतंगबाजी में जान आ जाती है और यह एकदम जीवंत हो जाती है। अगर पतंगबाजी में यथार्थ लाना है तो पतंगबाज को सदा डरे रहना पड़ेगा। भारतीय पतंगबाजों की यह कमजोरी ही कहिए कि वे ज्यादा समय तक धैर्य नहीं रख पाते और लक्ष्य पर पहुंचने से पहले ही हांफ जाते हैं, इसीलिए हमारे पतंगबाज इस खेल में पदक प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए इसके प्रशिक्षण होने चाहिए और उन चतुराइयों से उसे अवगत कराया जाना चाहिए, जो लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जरूरी हैं।
पतंगबाजी में हवा का महात्म्य भी सदैव माना जाता रहा है, यानी जैसी हवा चले, वैसी ही पतंग उड़ाओ। कई बार हालात उल्टे हो जाते हैं। वह ऐसे कि आपका घर नायिका के पीछे है और हवा ऐसी चल रही है कि नायिका आपको पीठ दिखा रही है। प्रेम में पीठ का प्रदर्शन बहुत ही अशुभ माना गया है। अगर आपकी प्रियतमा ने पीठ दिखा दी है, तो समझिए कि लक्षण ठीक नहीं है और पूरी सावधानी रखनी है।
कई मामलों में देखा गया है कि लोग पीठ का अर्थ नहीं समझ पाते और वे अपना ‘पेंच लड़ाओ अभियान’ जारी रखते हैं, तो अंत में उनका भौतिक सत्यापन हो जाता है। उसके परिजन आएंगे और चेहरे का भूगोल बदल जाएंगे। इसलिए कलात्मक सौंदर्य की भावभूमि को सदाबहार बनाए रखने के लिए हमें इस कला चातुर्य को भली-भांति पहले ही समझ लेना चाहिए। आप पतंग उड़ाना जानते हैं, यही पर्याप्त नहीं है। पतंगबाजी में भी सिद्धहस्त होना सदैव स्वीकार किया गया है। पतंग उड़ाने से पहले और पतंग उड़ाने के बाद स्थितियों का सूक्ष्म विवेचन कर लेना आपके हित में है। बाद में ऐसा न हो कि पतंग काटने की एवज आपको ही काटने के लिए लोग खड़े हो जाएं। वैसे तो ‘करत-करत अभ्यास के’ वाली बात है। आप धीरे-धीरे थपेड़े खाकर भी सीख जाएंगे, पर ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ वाली बात को जन्म देने से क्या फायदा? (पूरन शर्मा)
