डॉ. वरुण वीर
ईश्वर की बनाई हर जड़ और चेतन वस्तु अपने आप में परिपूर्ण है, और सभी कृतियों में मनुष्य उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। एक सीमा के भीतर सभी पशु-पक्षी, जीव-जंतुओं के पास सोचने-समझने की सीमित बुद्धि है। केवल मनुष्य है, जो बुद्धि का धनी है। संसार में जितना भी भौतिक तथा आध्यात्मिक विकासक्रम है, मनुष्य के कारण है। लेकिन जितना भी संसार में ह्रास दिखाई दे रहा है, वह भी मनुष्य के कारण ही है। तामसिक विचार उन्हीं विचारों से संस्कार तथा उसके अनुसार कर्म ही मनुष्य के जीवन में तनाव को बढ़ावा दे रहा है। आज छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, ग्रहलक्ष्मी से लेकर कामकाजी महिलाओं तक को तनाव ने घेर रखा है। समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है, जो इस भयंकर बीमारी के चंगुल में न फंसा हो। आज की भागदौड़ भरी दिनचर्या में व्यक्ति केवल भौतिक लक्ष्य को प्राप्त करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है।
संसार में यह नितांत सत्य है कि किसी भी व्यक्ति की सभी इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं होती। और जब कुछ इच्छाएं अपूर्ण रह जाती हैं, तो मन विचलित हो जाता है। अनेक प्रकार के नकारात्मक भाव मन में आकर बुद्धि, प्राण तथा शरीर को दबोच लेते हैं। मन जितना अव्यवस्थित तथा अनियंत्रित होगा, उतना ही चंचल भी होगा। मन की चंचलता और संवेदनहीनता शीघ्र ही व्यक्ति को तनावग्रस्त बना देती है। तनाव के वैसे और भी कई कारण हो सकते हैं, पर असंतोषी स्वभाव मुख्य रूप से तनाव को जीवन में गहरा स्थान देता है। आसन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से तनाव मुक्त जीवन पाना बहुत सरल है। तनाव का मुख्य स्थान मन है, लेकिन दुष्प्रभाव प्राण और शरीर पर भी पड़ता है। तनाव के कारण अनेक रोगों का जन्म होता है, जो एक समय के बाद असाध्य हो जाते हैं। जीवन में तनाव न हो, इसलिए प्रतिदिन योग को अपनी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बनाए।
तनाव से छुटकारा पाने के शारीरिक उपाय
आसन विशेष रूप से तनाव कम करने में सहायक सिद्ध होते हैं। अगर व्यक्ति एक घंटा प्रतिदिन योगासन करे, तो तनाव से सदा दूर रह सकता है। फिर भी कुछ विशेष आसन तनाव को दूर करने में अत्यधिक सहायक हैं। जैसे शीर्षासन, हलासन, पश्चिमोत्तानासन, जानुशिरासन तथा रीढ़ संचालन की सभी क्रियाएं। जो व्यक्ति उच्च रक्तचाप से पीड़ित हो, उसे शीर्षासन नहीं करना चाहिए। अगर व्यक्ति सामान्य रक्तचाप का है तो प्रत्येक आसन तीस सेकंड से आरंभ करके पांच मिनट तक कर सकता है तथा ध्यान पूर्वक योग शिक्षक के निर्देशन में यह आसन करना चाहिए। शीर्षासन स्मृति, बुद्धि तथा मस्तिष्क के लिए अत्यंत लाभकारी है। इस आसन से मस्तिष्क, हृदय तथा फेफड़ों को रक्त पर्याप्त मात्रा में मिलता है। रक्त का सीधा संचार मस्तिष्क तक होने के कारण दूषित ऊर्जा तुरंत शरीर से निकलती है तथा प्राणवायु स्नायुतंत्र को प्रभावित कर मानसिक तनाव को दूर करती है।
इसी प्रकार हलासन मानसिक तनाव को दूर कर कंधों, गर्दन को मजबूती तथा लचीलापन देता है। पश्चिमोत्तानासन के अभ्यास से शारीरिक तनाव और दूषित ऊर्जा पैरों से खींच कर मस्तिष्क से बाहर निकल जाती है, जो तुरंत शारीरिक और मानसिक तनाव में राहत देती है। यही लाभ जानुशिरासन से दोनों पैरों को एक-एक बारी करने से मिलता है। रीढ़ संचालन एक ऐसा आसन है, जो तुरंत स्नायुतंत्र के माध्यम से मन को शांत कर देता है। इन आसनों को करने से शरीर का लचीलापन भी शरीर और मन के तनाव को अधिक बढ़ने नहीं देता है।
तनाव से छुटकारा पाने के लिए प्राणायाम का विषेश महत्त्व है। प्राणायाम इस रोग को दूर भगाने में रामबाण औषधि है। अगर मानसिक तनाव के साथ उच्च रक्तचाप हो, तो शीतली, शीतकारी, चंद्रभेदी तथा उज्जाई प्राणायाम करें, जिससे कि उच्च रक्तचाप सामान्य रहे और शरीर तथा प्राण में जो भी सूक्ष्म वेगों के कारण तनाव है वह निकल जाए। अगर तनाव के साथ निम्न रक्तचाप है, तो सूर्यभेदी, भस्त्रिका एवं कुंभक प्राणायाम लाभकारी है। अगर व्यक्ति का रक्तचाप सामान्य हो और तनाव से पीड़ित हो तो ये सभी प्राणायाम लाभकारी हैं। मन का सीधा संबंध प्राण से होता है, लेकिन मन को सीधा नियंत्रित केवल उच्च श्रेणी के साधक कर सकते हैं, अन्यथा आम व्यक्ति को प्राण के माध्यम से मन को नियंत्रित करना चाहिए। मन के स्तर पर कम सोचना एवं अच्छा सोचना व्यक्ति कर सकता है, लेकिन विचारों के प्रभाव को रोकना सरल नहीं है। वह केवल प्राणायाम के माध्यम से संभव है।
प्राण को नियंत्रित करने के लिए बाह्य कुंभक प्राणायाम का अभ्यास तनावग्रस्त रोगी को करना चाहिए। शांत एकांत स्थान में रीढ़ की हड्डी को सीधा कर बैठना चाहिए। श्वास को गहरा भीतर भर कर पंद्रह सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे अपनी क्षमता एक मिनट तक रुकने की बनाएं, इस प्रकार कम से कम तीन राउंड और अधिक से अधिक सात राउंड कुंभक प्राणायाम के करें तथा इसके बाद अभ्यांतर कुंभक करें। श्वास को पूरी तरह बाहर निकाल कर दस सेकंड तक रुकें। बिना प्राणवायु के इस अभ्यास को तीस सेकंड तक ले जाएं। इस प्राणायाम के भी कम से कम तीन और अधिक से अधिक सात राउंड करें। अच्छा अभ्यास होने पर दोनों प्राणायाम को एक साथ मिला कर करें जैसे गहरी लंबी श्वास भीतर भरें और जितना सरलता से रोक सकें उसे रोकें और न रुकने की स्थिति में श्वास को बाहर निकाल दें। ऐसे तीन से सात राउंड तक करने से मानसिक तनाव से छुटकारा पाया जा सकता है।
आसन प्राणायाम के साथ-साथ ईश्वर की सत्ता में विश्वास तथा अपनी असीमित इच्छाओं को भी लगाम लगाने की जरूरत होगी। अष्टांग योग के दूसरे नियम का दूसरा अंग ‘संतोष’ जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। असंतोषी व्यक्ति सदा दुखी रहता है। केवल अर्थ और काम की सिद्धि में मनुष्य अपने जीवन को खपा देता है और उसके बाद भी तृष्णाएं अंत तक पूरी नहीं होती हैं।
संतोषादनुतमसुखलाभ:॥ (साधनपाद-42 योगदर्शन)
पूर्ण संतोष का पालन करने वाले व्यक्ति की समस्त सांसारिक सुखों से उत्तम सुख की प्राप्ति होती है।
चाह गई चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह।
जिसे कछु ना चाहिए वे शाहन के शाह॥
जीवन में जितनी कम इच्छाए होंगी, मन उतना ही स्थिर, शांत होगा। वह अपने को राजाओं का भी राजा अनुभव करेगा। आधुनिक युग की कुछ उपलब्धियां हैं तो दूसरी ओर भयंकर मानसिक बीमारियां भी हैं।
अनैतिकता, टूटते परिवारों के कारण एकांगी जीवन और कृत्रिम जीवन ने आज के मनुष्य को तनाव उपहार के रूप में प्रदान किया है। केवल योगाभ्यास से जीवन को तनाव मुक्त बनाया जा सकता है। योगिक सिद्धांत पूर्ण रूप से विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते हैं। आसन प्राणायाम तथा मंत्रों का उच्चारण जीवन में उत्साह, उमंग और मानसिक शक्ति प्रदान करता है। ईश्वर में विश्वास तथा बुद्धि पूर्वक कर्म मनुष्य में अद्भुत शक्ति का संचार करता है और व्यक्ति तनाव से मुक्त रहता है।
