नाज खान

इक्कीसवीं सदी में झूठ भी एक चुनौती बन कर उभर रहा है। यह चुनौती है सोशल साइटों पर फर्जी खबरों यानी ‘फेक न्यूज’ के रूप में उभरते झूठ से निपटने की। क्योंकि आज भारत फर्जी खबरों की गिरफ्त में इस तरह जकड़ा हुआ है कि कोई भी झूठा संदेश फैला कर उन्मादी भीड़ को किसी पर भी हमलावर कराया जा सकता है, सच को झूठ बनाया जा रहा है। यहां तक कि झूठ की ही परतें इतिहास तक पर चढ़ाई जा रही हैं। हाल में वाट्स-एप ने फर्जी खबर साझा करने वाले बीस लाख से अधिक खातों को यह कहते हुए बंद कर दिया कि उसके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल फर्जी खबर फैलाने के लिए नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन पचीस करोड़ से अधिक सोशल साइट उपभोक्ताओं वाले भारत में झूठ के इस जाल को भेदना आसान नहीं है।

एक ओर सोशल साइटों के जरिए फर्जी विडियो, तस्वीरों और मनगढ़ंत लेखों को फैलाया जा रहा है, तो ऐसी फर्जी न्यूज वेबसाइटों, पोर्टलों की भी कमी नहीं है, जो फर्जी खबर फैलाने में आगे हैं। इनके जरिए फर्जी संदेश और तस्वीरें भेज कर हिंदू-मुसलिम, दलित-सवर्ण, जाति, धर्म जैसे भावनात्मक मुद्दों की आड़ में लोगों को भड़काया जा रहा है। नतीजा, भीड़ उपद्रवियों का रूप ले रही है, समुदायों में आपसी तनाव बढ़ रहा है और ऐसी कितनी ही घटनाएं सामने हैं, जो इन्हीं फर्जी खबरों से फैली अफवाहों के कारण हुर्इं। ऐसे में सोशल मीडिया पर लड़खड़ाते सच और तेजी से दौड़ते झूठ का फायदा कुछ लोग अपने निजी हितों के लिए उठा रहे हैं।

स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया जन-जन तक पहुंचने से राजनीतिक पार्टियों को भी एक औजार मिल गया है, जिसका इस्तेमाल वे अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के साथ-साथ अपने मतलब पूरे करने के लिए भी कर रही हैं। मगर हर बार फर्जी खबर से उठे बवंडर का खमियाजा जनता को भुगतना पड़ा है। फिर चाहे रोहिंग्या शरणार्थियों के हिंदू लोगों के मांस खाने की झूठी खबर हो, बच्चा अगवा करने वाले गैंग या नपुंसक करने वाले टीके मुसलिम बच्चों को लगाने के मामले हों, इन सबके पीछे फर्जी खबरों के जरिए फैलाई गई अफवाहें ही थीं, जिन्हें कुछ विदेशी दुर्घटनाओं के पुराने वीडियो, फेक तस्वीरों के जरिए सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया। दरअसल, फर्जी खबर फैलाने के पीछे मंशा लोगों पर उसका ज्यादा से ज्यादा प्रभाव डालने की होती है। इसके लिए ऐसे मुद्दे चुने जाते हैं, जो सीधे लोगों की भावनाओं से जुड़े हों। बीते दो वर्षों में ऐसी कई फर्जी खबरें, विडियो या तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैलाई गर्इं, जिनसे भीड़ ने हमलावर का रूप लेकर कानून को अपने हाथ में ले लिया। यहां तक कि पिछले वर्ष हुर्इं चौबीस हत्याएं भी इसी का नतीजा थीं।

इन फर्जी खबरों के अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि लोग राष्ट्र निर्माण की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाली फर्जी खबरों को साझा कर रहे हैं। दरअसल, इस तरह की फर्जी खबरों के जरिए लोगों की सोच को नियंत्रित किया जा रहा है। फर्जी खबरें साझा करने में भावनात्मक पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि फर्जी संदेश, विडियो, तस्वीरें भेजने वालों को महसूस होता है कि वे भारत की प्रगति और उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए राष्ट्र निर्माण का काम कर रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने बाईस देशों में कराए गए एक सर्वे के आधार पर दावा किया कि फर्जी खबरों के मामले में भारत पहले नंबर पर है। मगर फर्जी खबर आज भारत ही नहीं, विश्व की समस्या बन चुकी है और इस फर्जी तंत्र से वर्तमान तो क्या, इतिहास भी झूठ की इस छाया से बच नहीं पाया है। यहां तक कि गांधी और नेहरू जैसी शख्सियतों के निजी जीवन पर सवाल खड़े करती कितनी ही तस्वीरें, मनगढंÞत लेख, फर्जी समाचार सोशल साइटों पर मिल जाएंगे।

झूठ का यह तंत्र तब और मजबूत हो जाता है जब चुनावों का समय नजदीक आता है और कई पार्टियों, विचारधाराओं के समर्थन में उनसे संबंधित पेजों और समूहों के जरिए संदेश फैलाए जाने लगते हैं। कई बार कुछ राजनेता और अन्य प्रसिद्ध लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट से भी फर्जी समाचार वेबसाइटों की तरह कुछ वीडियो, तस्वीरें और जानकारियां वायरल हो जाती हैं। यही कारण है कि गृह मंत्रालय की एक वार्षिक रिपोर्ट में स्पेन-मोरक्को की सीमा को भारत-बांग्लादेश की सीमा बताया गया था, वहीं केंद्र सरकार की सड़क परियोजना से संबंधित इंफोग्राफिक तस्वीर में पोलैंड की सड़क की तस्वीर लगाई गई। यहां तक कि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता को भी फर्जी खबर के कारण माफी मांगनी पड़ी थी, जब उन्होंने पाकिस्तान के एक पुल की तस्वीर को भोपाल के एक पुल की फोटो के तौर पर पोस्ट कर दिया था। वहीं हाल में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री भी फर्जी खबर का शिकार हो गए, जब उन्होंने पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कोबैंक आॅफ इंग्लैंड के गवर्नर नियुक्त होने की फर्जी खबर पर बधाई दी। देखा जाए तो इससे आम लोग तो क्या, बुद्धिजीवी वर्ग और खुद राजनेता भी बच नहीं पाए हैं।

आर्थिक और सैद्धांतिक कारण
दरअसल, कुछ आर्थिक कारण और सैद्धांतिक विचारधारा भी लोगों को फर्जी खबर फैलाने के लिए प्रेरित करती है। इन्हें फैलाने वाले भी डिजिटल न्यूजरूम में काम करने वाले पेशेवरों की तरह लोगों और माहौल के मुताबिक फेसबुक पोस्ट, न्यूज तैयार करते हैं। भारत ही नहीं, विश्व के कितने ही देश इस समस्या से जूझ रहे हैं। यहां तक कि पिछले अमेरिकी चुनाव पर भी इनकी छाया रही है। यही कारण है कि कुछ समय पहले अमेरिका में तो फर्जी खबर पुरस्कार तक दिए जाने की चर्चा ने खूब सुर्खियां बटोरी। ऐसा नहीं कि इस पर रोक लगाने के लिए कुछ प्रयास नहीं हो रहे। मगर झूठ तंत्र की तुलना में इन्हें नाकाफी जरूर कहा जा सकता है।

सोशल मीडिया की हमारी भावनाओं, एकाग्रता और निर्णय को प्रभावित करने में अहम भूमिका है। वहीं गांव, देहात तक इंटरनेट और स्मार्टफोन पहुंच जाने से इस तंत्र को मजबूती ही मिली है, क्योंकि अक्सर लोग बिना सोचे-समझे किसी भी खबर, विडियो को शेयर करते हैं। कुछ अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि फर्जी खबरें सच्ची खबरों की तुलना में छह गुना तेजी से फैलती हैं। झूठ के पांव भले न हों, मगर सोशल मीडिया पर झूठ पंख लगा कर जरूर उड़ रहा है। यही वजह है कि फिल्मों से जुड़े कई व्यक्तियों को बार-बार मृत बताया गया। इनमें सुपर स्टार अमिताभ बच्चन, रजनीकांत से लेकर आयुष्मान खुराना, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्य राय बच्चन, कैटरीना कैफ और सुर सम्र्राज्ञी लता मंगेशकर तक के नाम शामिल हैं। यह सोशल साइटों पर फैले झूठ का कुप्रभाव है कि इन फिल्मी हस्तियों को कई बार आधारहीन फर्जी खबर का शिकार होना पड़ा।

फर्जी खबर से बचने की तजवीज
इस तरह की खबरों से बचने का उपाय यही है कि लोग सजग हों और इस ओर निगरानी बढ़ाई जाए। आज ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जो बिना सोचे-समझे खबरों को फैलाते हैं। वहीं किसी एक धारणा से बंधे लोग भी उन खबरों को अधिक फैलाते हैं, जो उनके विचारों से मेल न खाती हो। मगर अब ऐसे टूल भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके जरिए किसी भी खबर की सत्यता का पता लगाया जा सकता है। गूगल सर्च और रिवर्स इमेज सर्च से किसी फोटो की सत्यता का पता किया जा सकता है। आॅनलाइन रिसर्च और फैक्ट चैकिंग करके फर्जी खबर का पता लगा सकते हैं। वहीं सरकार की ओर से भी इस ओर प्रयास जारी हैं।

वेबसाइट या ऐप के जरिए फैलने वाली फर्जी खबर को रोकने के लिए आइटी एक्ट-2011 की धारा 79 में संशोधन करने की तैयारी की जा रही है। वहीं सोशल साइट प्लेटफॉर्म भी लगातार फर्जी खातों के खिलाफ प्रभावी कदम उठा रहे हैं। इसी क्रम में सबसे लोकप्रिय वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब ने कहा कि वह फर्जी खबरों को रोकने और हटाने के लिए ढाई करोड़ डॉलर खर्च करेगा। बीते वर्ष फेसबुक ने भी 58.3 करोड़ फर्जी अकाउंट यह कहते हुए बंद कर दिए गए थे कि भड़काऊ चित्र, आतंकवादी दुष्प्रचार और नफरत फैलाने वाले अकाउंट सामुदायिक मानकों के खिलाफ हैं। साथ ही फेक अकाउंट के जरिए झूठी और सनसनीखेज खबरें फैलाने के कारण ट्विटर ने भी करीब सात करोड़ से अधिक फर्जी खाते बंद कर दिए। दिलचस्प यह कि इससे ट्विटर पर राजनेताओं को फॉलो कर रहे उनके फर्जी अकाउंट फॉलोअर्स में भी कमी आ गई।

सोशल साइट पर फर्जी खबर का जाल
लोगों को भी चाहिए कि वे फर्जी खबर के स्रोत को पहचानें कि वह कहां से वायरल हुई है। किसकी खबर है और उसका लेखक कौन है। वहीं सोशल साइट पर ऐसे लोगों को अनफॉलो कर दीजिए जो सिर्फ किसी अन्य के मैसेज और आपत्तिजनक पोस्ट को शेयर करते हैं। वहीं फेसबुक के टेक ए सर्वे को क्लिक कर सकते हैं। इससे सर्वे के जवाब पढ़ कर फेसबुक आपको समझ जाएगा। होम पेज के न्यूज फीड प्रीफ्रेंरस ऑप्शन के जरिए आप यह तय कर सकते हैं कि आपको क्या नहीं देखना है। इसके साथ ही फेसबुक अपनी नापसंद पोस्ट को बंद करने का विकल्प भी दे रहा है।

फर्जी खबरों पर एशियाई देशों में नियम
पाकिस्तान में 2016 में प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक साइबर क्राइम्स एक्ट के तहत आतंकवाद समर्थित और नफरत फैलाने वाले भाषण, इस्लाम के विरुद्ध या महिलाओं के सम्मान पर हमला करने वाली सामग्री पर रोक लगाई गई है और जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया। मलेशिया में फर्जी खबर छापने पर दस वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। वहीं थाइलैंड में भी गलत सूचना फैलाने पर सात वर्ष तक की सजा हो सकती है। फिलीपींस में गलत जानकारी फैलाने वाले को बीस वर्ष तक की सजा दी जा सकती है।

फर्जी खबर के खिलाफ मुहिम
कुछ समय पहले वॉशिंगटन पोस्ट ने अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों की पड़ताल करने वाली एजेंसी फैक्ट चेकर के हवाले से बताया था कि ट्रंप के अधिकतर दावे भ्रामक हैं और उन्होंने 466 दिनों के अपने कार्यकाल में करीब 3001 झूठे या गलत दावे किए हैं। भारत में इस तरह की चुस्ती किसी मीडिया संस्थान की ओर से दिखाई गई हो, ऐसा कम हुआ है। मगर अब भी कुछ टीवी चैनल, वेबसाइट और पत्रकार हैं जो फर्जी खबरों के इस जाल को बेनकाब कर रहे हैं। हर पार्टी की अपनी आईटी सेल है, मगर अक्सर किसी पार्टी समर्थित वेबसाइट, पेज को संचालित कर रहे लोगों का यही कहना होता है कि उन्हें किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष से कोई फंडिंग नहीं मिल रही, वेबसाइट से होने वाले लाभ से ही उनका काम चल रहा है और वे विचारधारा वश उससे जुड़े हुए हैं।

फर्जी खबरों का बढ़ता प्रभाव ही है कि ये फर्जी वेबसाइटें फर्जी सर्वे भी प्रकाशित कर रही हैं। बीबीसी न्यूज हब ऐसी ही एक फर्जी वेबसाइट है, जिसने 2017 में अपने एक लेख में भारत के प्रधानमंत्री को दुनिया के भ्रष्ट प्रधानमंत्रियों में से एक बताया था। वहीं 2018 की इसकी एक रिपोर्ट में इंडियन नेशनल कांग्रेस को दुनिया की दस सबसे भ्रष्ट पार्टियों में से एक कहा गया। पोस्टकार्ड न्यूज के फेसबुक पेज को बीते वर्ष सोशल मीडिया साइट से हटा दिया गया। कुछ समय पहले कर्नाटक पुलिस ने इसके सह-संस्थापक को समाज में फर्जी खबर के जरिए सांप्रदायिक नफरत फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

एलेक्साडॉटकॉम के मुताबिक फर्जी खबर परोसने वाली कुछ फर्जी वेबसाइटों की रैकिंग में 2017 में गिरावट दर्ज की गई। इसे लोगों की जागरूकता के संदर्भ में एक अच्छा संकेत माना जा सकता है। वहीं अब मुख्यधारा के कई मीडिया संस्थान फर्जी खबरों के खिलाफ ऐसे कई कार्यक्रम चला रहे हैं, जिनमें किसी खबर की सत्यता की जांच कर उसके सही या गलत होने की पुष्टि की जाती है।