शोभा सिंह

क्या नाम है?’ ‘रानी।’ संक्षिप्त-सा जवाब था। कॉलोनी का गार्ड उसे लेकर आया था। थोड़ी-सी आवश्यक बातचीत करके उसे काम पर रख लिया। सड़क के दूसरे छोर पर बने घर में वह काम करती थी, इसलिए सहज ही विश्वास कर लिया। रानी काम ठीक-ठाक ही करती थी। काम में लापरवाही नहीं थी। एक बार जैसा बता दूं, चुपचाप कर देती थी। रोज पीछे-पीछे लगना नहीं पड़ता था। मैं आराम से अपना लिखना-पढ़ना कर लेती थी।

गोल चेहरा, गाल पर काला मस्सा। आंखें चमकती रहती थीं। कुछ दिनों काम के बाद जब उसे कुछ भरोसा हो गया। घर के लोगों के स्वभाव के उतार-चढ़ाव समझने लगी। उसे लगा हिंदू-मुसलिम से इन्हें कुछ ज्यादा लेना-देना नहीं। उसके व्यवहार में एक स्निग्ध आत्मीयता आ गई थी।
‘जानती हैं आंटी, रानी मेरा पूरा नाम थोड़े ही है। असली नाम मेहरून्निशा है। रानी तो मां प्यार से कहती थी। मैं काहे की रानी, चार घर बर्तन मांजती हूं तब घर की रोटी चलती है।’
‘तो, तुम मुसलमान हो!’
‘हाय अल्ला, ये तो मैं किसी को बताना नहीं चाहती। जानती हैं सारे काम छूट जाएंगे। कोई हिंदुआनी अपने घर घुसने न देगी।’
‘अच्छा? यह तो धोखा है।’
‘जानती हैं आंटी, गरीब की कोई जाति नहीं होती। हाड़ तोड़ो तभी घर चलता है।’
‘क्यों, तुम्हारा आदमी?’
‘हां आदमी है। मर्द घर में हो, तो बड़ा सहारा रहता है। काम करता था फैक्ट्री में। मंदी में छंटनी हुई और काम बंद। तबसे बहुत जगह हाथ-पैर मारे ढंग का काम नहीं मिला। बेरोजगारी में पीने की आदत पड़ गई। अब तो रिक्शा चलाता है। मेरी एक ननद है। पिछले साल से हमारे पास है। उसके दो छोटे बच्चे हैं। देखने-सुनने में अच्छी हुनरमंद है। उसके खाविंद ने बस तीन बार तलाक तलाक तलाक बोल दिया। बेचारी सड़क पर आ गई। उसके मरद ने अपनी पसंद का दूसरा निकाह कर लिया। उसका भी गम है मेरे आदमी को।… ननद को खिलौना बनाने वाली फैक्ट्री में लगवा दिया। कुछ पैसा खर्च करना पड़ा। अरे पैसा तो मुझे भी खर्च करना पड़ता है। आपके गार्ड को भी तो सौ रुपए दिए थे तब…’
‘अच्छा?’
एक दिन फिर अपनी ननद के बारे में बताने लगी- ‘रजिया सुबह जाती है और देर शाम को लौटती है। बीच में बस पंद्रह मिनट की खाने की छुट्टी। फैक्ट्री क्या है, तीन कमरों में सिमटा है तामझाम। बताती है, गुड़िया के हाथ-पैर जोड़ते, कपड़े तैयार करते गर्दन ऐंठ जाती है। हाथ बराबर चलते रहने चाहिए।’
‘अच्छा तो पैसे अच्छे मिल जाते होंगे।’
‘अरे कहां आंटी, कुल डेढ़ हजार रुपल्ली। पैसा बढ़ाने को कहो, तो धमकी देता है मालिक। एक छोड़ चार मिलेंगी। काम छोड़ दे।… मैं शाम से पहले घर पहुंच जाती हूं तो घर देख लेती हूं। ये घर भी तो बड़ी मुश्किल से मिला। घर क्या दड़बा है। पानी बिजली की भी किल्लत। सुबह जल्दी उठ कर पानी भर कर रख लेती हूं। एक दिन की भी गफलत हो तो प्यासे ही रह जाओ। दिल में हुड़क उठती है। पुराना घर अच्छा था। बड़ा-सा सहन। नीम का पेड़। घोड़ा-तांगा आराम से रख सकते थे। बाहर भी खड़ा कर दो तो कोई टोकने वाला नहीं। अब तो वहां ऊंची बिल्डिंग मॉल बन गया। कितने ही बेघर-बार हुए। पुश्तैनी धंधा छिन गया।’ रानी काम करती जाती और बात करती जाती।
उसके लिए अखबार और हकीकत के फर्क का झरोख खोलती। ‘सुनो रानी, सुना वहां का मुआवजा भी मिला था।’
‘हां थोड़ा बहुत- जिसके कागज पक्के थे। बाकी तो अदालत के चक्कर काटने का न्योता। किसके पास इतना पैसा है कि साल-दर-साल मुकदमा लड़े। फिर पैसे वालों के पच्छ में ही तो फैसले होते देखा। बहुतों ने गंवाया और हमने भी।’ शायद बहुत दिन बाद बेखौफ होकर वह अपने बारे में बात कर पा रही थी। उसे एक उत्सुक धैर्यवान श्रोता भी मिला था, जिससे अपनी बात कह कर वह हल्की हो जाती।
‘जानती हैं आंटी। पहले मुझे भी काम नहीं मिलता था। मेरा नाम सुन कर सब भड़क जाते थे। फिर रानी का सहारा लिया। रानी तो सब धर्म में हैं। सो, चल निकला काम। अपनी अल्लाह को याद करने वाली आदत को जरूर लगाम लगाई। कई घरों में काम करने पर पैसे ठीक-ठाक ही मिल जाते हैं। और बच्चे पल जाते हैं।’
‘अरे रानी, आज तुमने अपना राज मुझे कैसे बता दिया। मैं किसी से कह दूं तो?’
‘नहीं, इतने उतार-चढ़ाव जिंदगी में देखे हैं। अब आदमी को पहचानने की कूबत तो है ही।’
एक दिन रानी नहीं आई। फोन किया। उसकी भर्राई आवाज थी- ‘ससुर को फालिज मार गया है। अस्पताल में हैं।’
मैंने सोचा, चलो, दो-तीन दिन की अपनी मशक्कत। देह की चर्बी कुछ घटेगी। वर्ना खाने का लुत्फ उठा नहीं पाती थी। कैलोरी बढ़ने का खतरा मंडराता रहता। खैर, चौथे दिन रानी धूल खाए चेहरे के साथ नमूदार हुई। थकी थी। मैंने कहा चाय नाश्ता कर लो, फिर काम करना। वह बोली, ‘सब घरों में तीन दिन का काम जमा करके रखा था। ऊपर से डांट-डपट अलग। सामने वाली मैडम तो पैसा काट लेने की धमकी दे रही थी। आपका ही दिल दरिया है।’
‘अरे छोड़ो, दुख-सुख इंसान के साथ जुड़ा है। अब बताओ तुम्हारे ससुर कैसे हैं?’
‘क्या कहूं, पहले से बेहतर हैं ऐसा नहीं कह सकती। काम के लिहाज से घर में एक और बच्चा। मेरा आदमी परेशान है अस्पताल के चक्कर में। कर्ज भी लेना पड़ा।’ वह और उदास हो गई।
‘तुम्हारी सास नहीं है?’
‘सास गुजर गई। सच कहूं, अच्छा हुआ। बेचारी बहुत सीधी थी। ससुर को भी अपने किए की सजा जैसे मिली है।’ वह अपने अतीत में खो गई। ‘खुदा सब देखता है। मैं जब ब्याह कर आई थी। कुछ दिन तक तो बेटी बहू कहता रहा। फिर कहता, तू कैसी भरी पूरी है। तेरी सास सूखी ककड़ी। कोई सुख नहीं देती। मैं सुन कर बेवकूफी से हंस पड़ी। बोलती कम ही थी। उसने न जाने क्या समझा। बस आगे-पीछे। जलेबी के दोने लाने लगा। मैंने अपने शौहर से कहा तो वे बोले- भोली, वो तुझे कितना चाहते हैं। मैं भी उनके चाय-पानी का खयाल रखती। मेरा मियां फैक्ट्री चला जाता। ससुर अपना घोड़ा तांगा लेकर। घर में मेरी सास कहती इस बेवक्त में घर कैसे आ गए। कहते, चल तुझे दरगाह ले चलूं। उस दिन मैं बेफिक्री में सब काम निपटा, पर्दा खींच कर नहाने बैठी थी कि मुआ आ गया। पीछे से पकड़ लिया। मैं सकते में आ गई। फिर गुस्से की आग जैसे भक्क से जली। हाथ का लोटा उसके माथे पर दे मारा और भागी कमरे की ओर। घंटों बंद रही कमरे में और रोती रही। या खुदा कैसा गुनाह! खैर इसके बाद उसकी हिम्मत न पड़ी। लेकिन तबसे आज तक उसे मेरे हर काम में ऐब ही दिखती। मैं सबसे बुरी औरत। मैं भी अब्बा की इज्जत न दे पाई। लेकिन वक्त के साथ बुरे लम्हों की स्लेट साफ होती गई। मेरे तीन बच्चे हुए। पैसे की तंगी होने लगी। मैंने भी काम करने का फैसला किया। उन्हीं दिनों अपनी बस्ती छोड़ नई जगह आना पड़ा। तंग दिलों जैसे छोटे घर। उस दौरान कितनी परेशानियां हुर्इं। खुदा खैर। जिस घर में खाना बनाती, उन्हें मेरा बनाया खाना पसंद था। कहते बड़ा जायका है इसके बनाए कबाब-बिरयानी में। दोष उस दिन का था- सालन चलाते, पता नहीं कैसे पल्लू में आग लग गई। मुंह से बेसाख्ता निकला- हाय अल्लाह ये क्या हो गया। बस मालकिन ने पकड़ लिया। खड़े-खड़े कान पकड़ कर घर से बाहर किया। महीने के पैसे भी न दिए। उस पर तोहमत कि उनका धर्म भ्रष्ट कर दिया।’
‘क्या सच कान पकड़ कर निकाला?’
‘अरे नहीं आंटी, बेइज्जती बहुत हुई। खरी-खोटी सुन कान जलने लगे थे। जैसे कोई गुनाह किया हो। जले हाथ पर मरहम कौन लगाए… अछूतों से भी बदतर हैं हम। चलूं, बातें बहुत हुर्इं। काम भी तो करना है। आपके यहां तो गप्प और काम साथ-साथ चल जाता है।’
एक दिन बोली, ‘अपनी दोनों बेटियों को पढ़ाना चाहती हूं। उस दिन टीवी पर देखा था सबके लिए शिक्षा। आप कुछ मदद करो आंटी। मैं गई थी स्कूल। फीस, ड्रेस सबके पैसे। फिर पहचान-पत्र चाहिए। अब कहां से लांऊ पहचान-पत्र। राशन कार्ड। पिछले साल देवर को घर से उठा ले गए थे पुलिस वाले। पूरे घर की तलाशी में घर का जो भी कागज उन्हें जरूरी लगा, उठा ले गए। देवर का तो कुछ पता ही नहीं चला। जब भी थाने जाओ। कहते हैं आतंकवादी था।… मेरा देवर तो गऊ की तरह सीधा था। और क्या होता है ये देशद्रोही। नाम जरूर उसका अब्दुल अली रज्जाक था। नाम कुछ छोटा होना चाहिए था न।’ एक काल विषाद की छाया उसके चेहरे पर झुक आई। लम्हे भर को जैसे वह अपने में ही खो गई। कितने धंधे किए। किसी के साथ साझे में। किसी के यहां कारीगर। ताला, छाता से लेकर कपड़े की सिलाई तक। दर्जी की दुकान का नंबर वन कारीगर। न जाने कितने कपड़े सिले। वहां तो हिंदू-मुसलमान का भेद न था। न कपड़े की कोई जात। जिसके तन पर सज गए बस उसके। सुबह से देर रात तक मसरूफ रहता। खाने-पीने के लिए मैं डांटती थी। सच, गरीबी ही सबसे बड़ा ऐब है। गरीब को अमीर होते न देखा मैंने।’
‘अच्छा चल, भाषण न झाड़।’ वह कुछ शर्मिंदा होकर काम करने लगी।
‘बेटियां बड़ी हो रही हैं, जल्दी से ब्याह कर दूंगी।’
‘यह तो गलत है ऐसा हरगिज न करना।’
‘क्या करूं आंटी। इनमें समझदारी जरा भी नहीं। कोई छेड़ दे तो बस घर आकर घंटों रोती हैं। शादी कर दूंगी, इज्जत तो बची रहेगी। गरीब की इज्जत लुटते देर लगती है? मुझे दस घर काम करना रहता है। पीछे से उन्हें कौन देखे। काम भी तो जरूरी है। घर की भट्ठी जितना झोंको उतना की कम। बस आग जलती रहे। वैसे सच कहूं, दोनों सीधी हैं। जैसा कहती हूं वैसा ही करती हैं। ब्याह करना भी आसान नहीं। दहेज चाहिए। अब तो हम लोगों में भी दहेज हो गया है। उन दोनों को भी काम में लगाए रखती हूं। दर्जी के यहां से थोड़ा-बहुत काम लाके दे देती हूं। बटन काज बनाना, तुरपाई करना, साड़ी फाल लगाना। अब कढ़ाई का काम पड़ोसन रज्जो से सीख रही हैं। अगल-बगल में अपने जैसे लोग हैं। एक दूसरे का सहारा रहता है।’
ये बातें एक दिन की नहीं थीं। जब भी उसे फुरसत मिलती, बातों का सिलसिला चल निकलता। मैंने उसे सलाह दी कि लड़कियों को आगे पढ़ाओ। पढ़ाई क्यों रोक दी। पढ़ना बहुत जरूरी है। इस बार वह चुपचाप सुनती रही। कुछ बोली नहीं।
एक दिन अच्छे मूड में थी। बोली- ‘आपके पास ही एक दो घंटे के लिए छोड़ दूं। कुछ सिखा दीजिएगा। दोपहर को तो बच्चे स्कूल से आते हैं। खा-पीकर थोड़े आराम का समय रहता है। हां, शाम को ठीक रहेगा।’ फिर वह चुप हो गई।
वैसे रानी छुट्टी बहुत कम करती थी। उस दिन अचानक नहीं आई। दूसरे दिन जरा देर से आई। शक्ल पर बारह बजे रहे थे। अजब उजाड़ थी। पूछा, क्या हुआ। रूआंसी-सी हो गई। भरे गले से बताया- ‘कॉलेज के लड़कों ने पति की खूब पिटाई कर दी। रिक्शा भी तोड़ दिया।’ ‘क्यों?’ ‘बाईक पर सवार तीन जन भिड़ गए रिक्शे से। देखने वालों ने कहा गलती उन लड़कों की थी। वे गलत साइड से आए थे। लेकिन कौन सुनता है। सारा गुस्सा रिक्शेवाले पर। जमीन पर पटक कर मारा। पसली पर गहरी चोट आई है। हाथ भी सूज गया। खबर पाते ही वहां मैं भागती हुई पहुंची। सरकारी अस्पताल ले गई। वहां भरती है। ऊपर से पुलिस केस। क्या करूं। कहां जाऊं।’ आंसुओं से भींग गया उसका चेहरा।
‘हिम्मत रख। मैं चलती हूं अस्पताल। पुलिस थाने पर भी साहब से फोन करवा दूंगी। परेशान नहीं करेंगे।’ आश्वासन पाकर वह अपना काम निपटाने लगी।
मैं जिंदगी की नई कड़वी सच्चाइयों से यों रूबरू होऊंगी, कभी सोचा न था। १