डॉ. वरुण वीर

योग का मूल स्रोत वेद है। वेद की अन्य शाखाओं में विस्तृत रूप से फैला हुआ योग आज भारतीय संस्कृति और जीवन शैली की सुगंधि को संपूर्ण विश्व में शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर स्थापित कर चुका है। विश्व में जहां भी योग पहुंचा, वहां योग दर्शन पहुंच गया और योग दर्शन का प्रत्यक्ष संबंध वैदिक संहिताओं से है। विश्व के सभी देशों ने योग को अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से अपनाने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं की। कुछ वर्ष पहले यह सवाल बार-बार सामने आया कि योग का उद्गम कहां से है? योग कितना पुराना है? विश्व ने योग को अपना तो लिया, लेकिन हम भारतीय उसकी उत्पत्ति और समय को लेकर दूसरों को बताने से सदा ही सकुचाते रहे कि क्या विश्व को यह बता कर कि योग का मूल स्रोत वेद है, कहीं योग के विस्तार में बाधक तो नहीं होगा? क्या विश्व योग की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न तो नहीं लगा देगा? अनेक प्रश्न हो सकते हैं अगर योग को वैदिक धर्म से जोड़ कर विश्व के सामने प्रस्तुत किया जाए।

प्रत्यक्ष या परोक्ष योग के प्रचार-प्रसार तथा शिक्षण से जुड़े भारतीय बुद्धिजीवियों ने योग को वेद से न जोड़ कर केवल अधिक से अधिक योग दर्शन, घेरंड संहिता, गोरक्ष संहिता से जोड़ कर लगभग तीन से पांच हजार वर्ष पुराना ही माना है। भारतीय बुद्धिजीवियों या फिर योग से जुड़े हुए आचार्यों में कहीं न कहीं दूरदर्शिता का अभाव था या फिर हीन भावना से ग्रस्त होने के कारण योग का संबंध वेद से स्थापित करने में हिचकिचाते रहे या इसे यों भी कह सकते हैं कि नवीन भारतीय योग आचार्यों का स्वाध्याय योग दर्शन, घेरंड संहिता, गोरक्ष संहिता और गीता से दूर या उसके मूल तक नहीं पहुंच पाया था।

अष्टांग योग के आठ अंग और पहले दो अंग यम और नियम के पांच-पांच अंगों का विस्तृत वर्णन वेद में और वैदिक संहिताओं में उपलब्ध है। विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा योग आज आधुनिक युग में मानव समाज को सुखी और स्वस्थ बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। संपूर्ण विश्व में योग अपनी उपस्थिति बनाए हुए है। विश्व का कोई भी देश योग से अछूता नहीं है। वेद भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान का मूल स्रोत है।

‘वेदोऽखिलो : धर्म मूलम्’ अर्थात वेदों में सभी विद्याओं के सूत्र विद्यमान हैं, जैसे देव विद्या, निधि विद्या, ब्रह्मविद्या, राशि विद्या, नक्षत्र विद्या, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, आयुर्वेद, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, वाणिज्य, दर्शन एवं योग संसार की कोई भी ऐसी विद्या नहीं है, जिसका वर्णन ऋग्वेद में न हुआ हो। इन सभी विद्याओं में योग विद्या दुख निवृत्ति का हेतु है। योग मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करता है। योग कई प्रकार का है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा से परमात्मा का मिलन ही योग है।

महर्षि पतंजलि के अनुसार ‘योगाशचित्त वृत्ति निरोध:’ यानी अपनी चित्त की वृत्तियों को जब रोक दिया जाए, तब ‘तदाद्रष्टुस्वरूपेवस्थानं’ यानी आत्मा का अपने सही स्वरूप में स्थापित हो जाना ही योग है। ‘यस्मादृते न सिद्धयति यज्ञो विपश्चितश्चन स धीनां योगमिन्वति।’ (ऋग.) यानी जिन देवताओं के बिना प्रकाश पूर्ण ज्ञानी का जीवन भी सफल नहीं होता, उसी में ज्ञानियों को अपनी बुद्धि एवं कर्मों का योग करना चाहिए। ऐसा करने से ज्ञानियों की बुद्धि देवों की बुद्धि के साथ मिल कर सत्य को प्रकट कर लेती है। योग केवल साधन न होकर साध्य भी है। अथर्ववेद का कहना है कि योगाभ्यास अर्थात ध्यान के लिए उग्र श्रद्धा, लगन, अभ्यास एवं उग्र वैराग्य आदि साधनों की जरूरत होती है।

‘यथा-यतपुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतनवत॥’ (अथर्व.) स्पष्ट है जिस मानस ज्ञान को वितरित करते हुए ध्यानी या विद्वान अभ्यासी सर्व दृष्टा परमात्मा को हृदय से बांधते हैं वह फिर इंद्रियों की धारणा योग के नाम से जानी जाती है। योग्यजन आत्माओं का अर्थ गति हुआ करती है तो सांसारिक जन की अधोगति हुआ करती है अर्थात उन्हें नीचे की ओर पृथ्वी पर आना पड़ता है। ‘यथा नाकसय पृष्ठात दिवमुत पतिषयन॥’ (अथर्व.) योग की सिद्धि में ईश्वर अनुकंपा आवश्यक है।
‘स धा नो योग आभूवत् सराये स पुरध्याम।
गमद् वाजेभिरा स न:।’ (ऋग. 2/5/3, साम.1/10/2/3, अथर्व 20/59/1)
तथा
‘युंजते मन उत युंजते धियो विप्रा विप्रस्यबृहतो विपश्चित:।
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितु: परितुष्टि:।’ (ऋग. 5/81/1)

योग का संबंध मनुष्य के साथ अनंत काल से है। योग के बिना परम आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता है। मनुष्य जितना भौतिक जगत में उलझा हुआ रहेगा, उतना ही दुखी रहेगा इसलिए परम सुख की प्राप्ति तो योगाभ्यास द्वारा ही संभव है। शरीर के तल पर भोगे जाने वाले सुखों की सीमा होती है। मन के तल पर भोगे जाने वाले सुखों की सीमा शरीर के सुखों से लंबी होती है, लेकिन फिर भी सीमा होती है। लेकिन जो सुख आत्मा के तल पर भोगा जाता है उसकी कोई सीमा नहीं होती, उसका आनंद अनंत होता है, क्योंकि परमात्मा सुख के साधन में आत्मा का आधार होता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने परमात्मा की प्राप्ति का साधन ध्यान और योगाभ्यास बताया है। परम सुख की प्राप्ति परमात्मा की गोद में बैठ कर ही अनुभव की जा सकती है। जन्म मरण के बंधन से छूट कर योगाभ्यास द्वारा परमात्मा का दर्शन ही आत्मा का लक्ष्य है।

वैदिक साहित्य से लेकर उपनिषद काल तक और उपनिषद काल से लेकर आधुनिक काल तक जहां कहीं भी हम योग शब्द सुनते हैं, उसका आधार वैदिक वांग्मय ही है। वेदों में योग पूर्णता निहित है। वेदांत दर्शन और उपनिषद आदि वेद को सरलता पूर्वक जानने के साधन हैं। वेद में योग मंत्रों का विस्तार से विवेचन है। वेदांत दर्शन एवं उपनिषदों के माध्यम से साधक जन तक पहुंचाने में हमारे ऋषियों की अहम भूमिका रही है। महर्षि पतंजलि ने योग की बहुत ही सरल विधि योग साधकों तक पहुंचाई है। उत्तर उत्तरोत्तर काल में जब वेद का पढ़ना-पढ़ाना कम होता गया तब वेद के ज्ञान को सरल तरीके से समझाने के लिए वेदांग का सहारा लिया जाने लगा। आज समूचे विश्व में योग की धूम मची हुई है। विश्व का कोई भी समाज तथा राष्ट्र योग से अछूता नहीं है तथा इसके महत्त्व एवं लाभ को देखते हुए यूएनओ ने और अधिक जन-जन तक पहुंचाने के लिए योग दिवस मनाने का निर्णय किया।

योग से संबंधित भारत में अनेक ग्रंथ विद्यमान हैं, जो प्रामाणिक हैं। इन सभी ग्रंथों में योग दर्शन सर्वमान्य एवं सबसे प्राचीन माना जाता है। ऋषि पतंजलि का योग दर्शन योग के आठ अंग में विभाजित किया यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन सभी अंगों का वर्णन अलग-अलग स्थान पर वेदों में उपलब्ध है। इस कारण वेद ही योग का मूल है और वेद ही सत्य सनातन धर्म का मूल है।