अमरेंद्र किशोर
कद्दावर उत्साही बाघ, शांत-से दिखने वाले मगरमच्छ और इधर-उधर बिखरे दलदली टापुओं का ताना-बाना। बाघों के रंग से मेल खाते इन टापुओं के घने मैंग्रोव जंगल। इन सब रहस्य और आतंक के बीच नुकीली नावों से जिंदगी को रफ्तार देता सहमा-सहमा इंसान और सैकड़ों बस्तियां- यही है सुंदरवन। गंगा-ब्रह्मपुत्र-पद्मा और मेघना नदियों के आगमन से बने सैकड़ों द्वीपों के इस समूह के नाम के साथ भले ‘सुंदर’ पदबंध जुड़ा है, लेकिन यहां की जिंदगी इतनी सपाट, नीरस और भयानक होती है- कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। पानी और हरियाली के बीच दलदल का अछोर विस्तार और उसी विस्तार पर पलती बस्तियां दिन के उजाले में भी हर पल दुस्वप्न जैसा महसूस करती हैं। दो देशों के बीच बंटा सुंदरवन- गंगा के डेल्टा पर फैला दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल, जिसे ‘अठारो भाटिर देश’ के नाम से जाना जाता है। यानी वह जगह जहां अठारह बार ज्वार आता है, जमीन और समंदर की रोज आंख-मिचौली चलती है। वहां के जंगलों में शहद जुटाने और मछली-केकड़ा पकड़ने गए दो-चार-दस इंसानों को घात लगाए बाघ अपना शिकार बना ही लेते हैं- यही यहां की जिंदगी की हकीकत है। इससे भी बड़ा सच यह है कि बाघ से बच निकले उन अभागे मछुआरों और ग्रामीणों को दलदल में छिपा मगरमच्छ दबोच लेता है। लिहाजा, इस जंगल की प्राचीन पहचान है आदमखोर बाघ।
मौत के इस सिलसिले से इस इलाके में विधवाओं की एक बड़ी आबादी तैयार हो चुकी है, जो किसी सरकारी राहत-पुनर्वास की उम्मीद लगाए रहती हैं, क्योंकि उन्हें सरकार पर पूरा भरोसा है। ये विधवाएं आज अपने साथ पूरे परिवार की जिंदगी जैसे-तैसे खींच रही हैं। पर दुख का विषय है कि विकास की कोई नीति, कार्यक्रम या पैकेज की कसौटी में ए विधवाएं समंजित नहीं हो पातीं। ऐसे में जिंदगी यहीं निढाल-सी हो जाती है।
कुलताली गांव की बबीता मंडल (35), कालीताला गांव की सोनामोनी (43) और लाहिरीपुर की ताप्ती मंडल (38) की कहानी सुंदरवन में सांसें लेती कमजोर जिंदगी की दुखद बानगी है। बबीता के मुताबिक, उसके पति अपने पांच साथियों के साथ जंगलों में शहद जुटाने गए थे और शाम को लौटने की तैयारी में थे, तभी बाघ ने इस कदर तेजी से उन पर झपट्टा मारा कि साथी समझ ही नहीं पाए कि क्या करें और उनके पति की लाश भी नहीं मिल पाई। सोनामोनी बताती हैं कि केकड़ा पकड़ने गए उनके पति पर बाघ ने गर्दन पर हमला किया। हमला इतना जबर्दस्त था कि पति ने वहीं दम तोड़ दिया और बाघ उन्हें सरेआम घसीटते हुए जंगलों में ले गया। ताप्ती बाघ के हमले में अभी तक अपने परिवार के तीन सदस्यों को गंवा चुकी है। इसके बावजूद आजीविका का कोई अन्य विकल्प सुंदरवन में न होने की वजह से जंगलों में जाना उसके घर के मर्दों की मजबूरी है। यानी कोई औरत अपना बेटा गंवा रही है और कोई पति और पुत्र दोनों की मौत सुन चुकी है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
बांग्लादेश और भारत के बीच फैले सुंदरवन दुनिया में सबसे ज्यादा बाघों की आबादी वाला इलाका है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा कटाव इंसानी आबादी को लगातार बाघों के जबड़े में धकेल रहा है। फिलहाल, जंगलात विभाग के मुताबिक वहां बाघों की कुल आबादी एक सौ छह है जो 2002 में चार सौ चालीस आंकी गई थी। लेकिन ‘इंसानी आबादी के बढ़ते बोझ, जंगलों की अवैध कटाई और अवैध शिकार के कारण बाघों की आबादी में तेजी से गिरावट आई है’, गोसाबा के प्रखंड विकास अधिकारी रुणित सेन स्वीकार करते हैं। गैर-सरकारी संस्था सुंदरवन फाउंडेशन के अनिर्बान हाजरा कहते हैं कि ‘लाखों की संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों के गोसाबा में बसने से बाघों की प्राकृतिक रिहाइश पर बुरा असर पड़ा है।’ इस तरह बाघ का निवाला बन जाने के बाद किसी बांग्लादेशी की विधवा भी समाज और सरकार की हमदर्दी का हिस्सा बन जाती है।
गोसाबा द्वीप के रजतजुबिली स्थित सुंदरवन रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (एसआरडीएस) के अर्जुन मंडल विधवाओं की बदहाली के बारे में बताते हैं, ‘समाज के दुत्कार और बहिष्कार के भय से ये महिलाएं अपने दर्द का कड़वा घूंट पीकर रह जाती हैं, मगर अपनी जिंदगी ऐसे जीती हैं, जैसे सब कुछ ठीक-ठाक है… कुछ हुआ ही नहीं है।’ उनकी संस्था ने मछुआरों और उनके परिवारों की मदद से 2006 से 2016 के बीच एक सर्वे कराया, जिसके मुताबिक सिर्फ लाहिरीपुर नाम की जगह पर दो सौ साठ परिवारों ने घर की रोजी-रोटी कमाने वाले शख्स को खोया है।’ सुंदरवन में मनरेगा है, प्रधानमंत्री आवास योजना है, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ भी है और भोजन का अधिकार भी है। पर इन योजनाओं पर दलाली का नाग कुंडली मार कर बैठा है। नतीजतन, आजीविका का संकट सुंदरवन के द्वीपों का बुनियादी दर्द बन चुका है। हिम्मत जुटा कर उन जंगलों में जाना यहां के रहबासियों की मजबूरी है, जहां बाघों का एकछत्र राज है। बेनीपहेली गांव के पालेन नैया को याद है कि कैसे उनकी पत्नी को बाघ उठा ले गया उनकी आंखों के सामने। ‘उसने एक और केकड़ा पकड़ने का लालच किया था। मछली और केकड़ा पकड़ने के लिए द्वीप से द्वीप नाव लेकर घूमने के अलावा जीविका की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।’ पालेन नैया कहते हैं।
अपने पति को पांच साल पहले खो चुकी ललिता विश्वास को आज भी यकीन नहीं होता कि उसके पति शेखर विश्वास अब इस दुनिया में नहीं हैं। उस मनहूस शाम को याद करते हुए ललिता सिसकने लगतीं हैं, जब उनके पति की लाश लाई गई तो जैसे जिंदगी में सब कुछ लुट चुका था। ‘लाश को जल्दी-जल्दी दफनाया गया। लोगों ने कहा कि समय रहते लाश को ठिकाने नहीं लगाया गया, तो संवादी के आते ही पुलिस केस बन जाएगा।’ वह एक ही सांस में बताती है। उस गोधूलि बेला में उसने अपने पति का चेहरा भी आखिरी बार नहीं देखा। सत्यनारायणपुर की बिमला मंडल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कुमीरमारी द्वीप (कुमीर का मतलब मगरमच्छ) की अड़तीस वर्षीय लक्ष्मी दोलुइ भी उन्हीं हजारों विधवाओं की तरह हैं। आज से कोई दो साल पहले मछली पकड़ने गए उसके पति पुतीबर को बाघ ने अपना शिकार बनाया। पति की मौत के बाद गरीबी की मार में लक्ष्मी के सोलह साल के बेटे रतन ने पढ़ाई छोड़ कर दिहाड़ी मजदूरी से परिवार का पेट पालना शुरू किया। लक्ष्मी उन पलों को याद करतीं हैं, ‘याद है वह तारीख 3 दिसंबर, 2016 जब मेरे पति को बाघ ने मारा। उनके पास जंगलात विभाग का परमिट नहीं था… तो हमने कहीं कोई रिपोर्ट नहीं लिखवाई, नहीं तो पुलिस हमें तंग करती… तो हमें मुआवजा नहीं मिला।’
जीवन की दुश्वारियां
कोलकाता स्थित सुंदरवन सोशल डेवलपमेंट सेंटर की सचिव दिपन्विता सरकार बताती हैं कि ‘मैंग्रोव जंगलों का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश में है और सुंदरवन में रहने वाले बाघों की साठ फीसद आबादी बांग्लादेश के जंगलों में है। चूंकि बांग्लादेश में जंगलों की जम कर कटाई हुई और वहां बड़ी संख्या में बाघों का शिकार किया गया है, बाघों को भारत का सुंदरवन महफूज ठिकाना लगता है। लिहाजा, सीमा से लगे हिंगलगंज, हसनाबाद, संदेसखाली के अलावा गोसाबा, कुल्टी, पाथर प्रतिमा और बसंती ब्लॉक के जंगलों में मौजूद बाघ उन ग्रामीणों के लिए खतरा बन चुके हैं, जो अपनी दैनिक जरूरतों और आजीविका के लिए जंगलों पर आश्रित हैं। ‘यह पूरा ब्लॉक सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान (और बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्र) के नजदीक है, जिसमें लगभग सत्रह सौ वर्ग किलोमीटर का कोर क्षेत्र और लगभग नौ सौ वर्ग किलोमीटर का बफर क्षेत्र शामिल है, जहां आजीविका से संबंधित कुछ गतिविधियों की अनुमति है। आमतौर पर देखा गया है कि करीब के गांवों के पुरुष यहां के जंगलों में मछली और केकड़ा पकड़ने या फिर शहद और लकड़ी इकट्ठा करने के लिए घूमते रहते हैं।’ दिपन्विता सरकार कहती हैं।
‘सुंदरवन सरकार की ओर से बरती गई लापरवाही का जीवंत मिसाल है, यह प्रथम दृष्टया निष्कर्ष है। मगर सरकार की अपनी विवशताएं हैं। जिस इलाके को इस कारण से प्रतिबंधित किया गया कि वहां बाघों का कुदरती आवास है, वहां जाने का मतलब है जान से हाथ धोना।’ सुंदरवन में बाघों के संरक्षण के लिए सक्रीय अनिल मिस्त्री कहते हैं। आवागमन वहां बहुत मुश्किल है और सरकार की योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करवा पाने में सरकारें विफल रहीं हैं। ‘गांव के स्तर पर कार्यक्रमों का तरीके से निष्पादन नहीं किया जा सका है। इस कारण लोग जंगल में बाघों का शिकार बनते हैं। यह मानवीय लाचारी की हद है।’ टाइगर सोसाइटी ऐंड रूरल डेवलपमेंट के दीपांकर सरकार भावुक हो जाते हैं- ‘बाघ के साथ लड़ाई अक्सर मर्दों की ही होती है और ऐसी लड़ाई में कोई शायद ही बाघ की मर्दाना जकड़ से कोई बच कर निकलता है। जिन सुहागिनों की दुनिया बाघों और मगरमच्छों से उजड़ी है, उनमें से किसी एक विधवा को भी मुआवजा नहीं मिला है।’ बाली द्वीप की आरती विश्वास भी उन वंचित विधवाओं में एक हैं, जिनके पति सुगल विश्वास भी मछली पकड़ने गए थे, लौट कर नहीं आए। मगर आरती को कोई मुआवजा नहीं मिला। जैसे-तैसे दिन गुजार कर इन्होंने अपने बेटे को बड़ा किया, जो खेतों में काम कर लेता है, लेकिन जंगलों का मुंह आज तक नहीं देखा।
मुआवजे की आस
मुआवजे को लेकर सुंदरवन के लोगों में गहरी निराशा है। गोसाबा ब्लॉक के जहर कॉलोनी गांव की निवासी शिखा मंडल ने पति असित मंडल को नवंबर 2015 में खो दिया था। वह दो साथियों के साथ बगानबाड़ी जंगल में, गराल नदी से केकड़े पकड़ने गए थे। ‘अन्य दोनों लौट आए और बताया कि एक बाघ मेरे पति को लेकर दूर चला गया।’ वे कहती हैं। वे परिवार में एकमात्र कमाने वाले थे और स्कूल जाने वाले दो बेटों के पिता। शिखा ने मुआवजे का दावा करने का मन बनाया और अपनी मदद के लिए एक वकील को दस हजार रुपए दिए। इसके लिए कई कागजात और दस्तावेज इकट्ठा करने थे; जैसे पुलिस और वन विभाग से ‘नो आॅब्जेक्शन सर्टिफिकेट’, बीमा कार्ड, गांव के प्रधान से एक पत्र, और मृत्यु प्रमाण-पत्र…’ शिखा कहतीं हैं। पर वन विभाग ने शिखा को एनओसी देने से मना कर दिया, क्योंकि उनके पति की मृत्यु मुख्य क्षेत्र में हुई थी। बीमा कंपनी ने एक लाख की रकम का भुगतान किया है लेकिन अभी तक उनके दस्तावेज नहीं लौटाए हैं। शिखा अब केकड़े और झींगे पकड़ती हैं, छोटा-मोटा काम और खेतिहर मजदूरी करती हैं, और किसी तरह से अपने बेटों को स्कूल भेजती हैं। खुद अपना घर चला पाने में असमर्थ होने की वजह से, वह और उनके बच्चे चाचा के घर में रहते हैं।
शिखा मंडल की तरह अपने पतियों की मौत के बाद ऐसी विधवाएं झींगों की पैदावार और छोटी-मोटी खेतीबाड़ी के जरिए अपना गुजारा चला लेती हैं। पर सालों-साल समुद्र के बढ़े जलस्तर और ऊपर से बढ़ती जनसंख्या की वजह से इस डेल्टा के इकोसिस्टम पर दबाव बढ़ रहा है। एक और बड़ी समस्या है सुंदरवन की जमीन पर खारे पानी के बढ़ते आतंक की। दस साल पहले बाघ के हमले में अपने पति को खोने वाली अलापी मंडल कहती हैं, ‘एक बार खारा पानी आपकी जमीन में घुसने लगता है तो वह जमीन को हमेशा के लिए बंजर हो जाती है।’
फिलहाल सुंदरवन में तकरीबन पैंतालीस लाख लोग रहते हैं, लेकिन यहां की ऊपजाऊ जमीन को समंदर लील रही है। मैंग्रोव सिमट रहे हैं और तट का लगातार कटाव हो रहा है। ऐसे में इन विधवाओं के सामने रोटी कमाने का एक ही जरिया बचता है कि वे भी जंगल के उस पानी में मछली पकड़ने जाएं जहां उनके पति मारे गए थे।
मुआवजे की पेचीदगी को अर्जुन मंडल विस्तार से बताते हैं। अर्जुन सुंदरवन ग्रामीण विकास सोसायटी नामक एनजीओ चलाते हैं, जो बाघ के हमले में मारे गए लोगों की विधवाओं के कल्याण के लिए काम करता है। ‘ये विधवाएं पश्चिम बंगाल सरकार के जंगलात विभाग, मछली पालन विभाग और राज्य की दुर्घटना बीमा योजना, तीनों की हकदार हैं। यानी कुल मिलाकर लगभग तीन से पांच लाख रुपए मुआवजे की रकम उन्हें मिल सकती है।’ वे कहते हैं। अर्जुन मंडल उलझावों से जड़ी शर्तों का जिक्र करते हैं, ‘मौत मुख्य क्षेत्र में नहीं होनी चाहिए। मृतक के पास नाव का लाइसेंस (बीएलसी) के साथ-साथ वन विभाग का परमिट होना चाहिए।’ इसके अलावा, मुआवजा पाने के लिए पत्नी को विभिन्न विभागों में कई दस्तावेज भी जमा कराने पड़ते हैं।’
अर्जुन खुद एक मछुआरा हैं, लेकिन अपनी लाचारी वे बयान करते हैं, ‘हमें यह पता ही नहीं चलता कि बफर जोन कहां समाप्त हो रहा है और कहां से मुख्य क्षेत्र शुरू होता है। सरकार बहुत कम बीएलसी जारी करती है, और हर कोई इतना खर्च भी नहीं कर सकता। दिक्कत की बात है कि परमिट जारी करना भी जंगलात विभाग की इच्छा पर निर्भर है।’ इसलिए, उन मृतकों की विधवाएं संकटों और बाधाओं में घिर कर मुआवजे को भूल जाना बेहतर समझतीं हैं। खासकर जिनके पास बीएलसी या परमिट नहीं होता, उनके लिए तो सब कुछ मुश्किल हो जाता है। अर्जुन के शब्दों में, ‘स्थिति तब और खराब हो जाती है जब पुरुषों की मृत्यु मुख्य क्षेत्र में हो जाए, जहां ग्रामीणों को प्रवेश की बिल्कुल अनुमति नहीं है, चाहे उनके पास परमिट हो या न हो।’
जिंदगी इतनी मुश्किल हो सकती है, यह सुंदरवन में आकर पता चलता है। गरीबी इस कदर निर्मोही होकर इंसान के साथ छल कर सकती है, ऐसा तब महसूस होता है जब हम लक्ष्मी, बिमला और ललिता जैसी जिंदा बुतों से मिलते हैं। इन बुतों की कहानियां हमें उस भारत के उस नंगे सच से वाकिफ कराती हैं, जहां लोकतंत्र और मानवाधिकार के तमाम रंग फीके नजर आते हैं। सुंदरवन में कड़ी मेहनत कर जीने वाले लोग यहां जीवन-यापन के लिए वही कुछ कर रहे हैं जो सैकड़ों साल से उनके पूर्वज करते आए हैं- मछली पकड़ना, कुछ बो-उगा लेना, जंगल में शिकार और शहद की तलाश और जरूरत पड़े तो स्थानीय सूदखोरों से कर्ज लेना। बाघ से बचने और समुद्र और लड़ने का जुगाड़ सोचने में कैसे इन अभागों के दिन गुजर जाते हैं। कल्पना कीजिए कि कैसे इन तमाम प्रहारों से बची-खुची तकदीर पर हर साल आने वाला चक्रवाती तूफान कैसे पानी फेर जाता है। इतना सोचने और महसूस करने के बाद तो इसे वहां के लोग क्या मानें- पिछले जन्म का पाप या इस जन्म में किसी लोकतांत्रिक देश में पैदा होने का शोकाकुल खमियाजा?
