महेंद्र राजा जैन
हमारी भाषा में ऐसे कई शब्द हैं, जिनका अर्थ बिल्कुल बदल गया है, लेकिन उनमें जो पुराना अर्थ था उसकी शक्ति और प्रभविष्णुता अभी खोई नहीं है। आज शब्दों का निरंतर नया उपयोग एक ऐसी संकेत भाषा के रूप में किया जाता है, जिसके संकेतों की कुंजी दूसरे किसी के पास न हो। ऐसे बहुत से शब्द हैं और प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं, जिनका हम धड़ाधड़ इस्तेमाल करते हैं और उनके अर्थ की कोई जानकारी हमें नहीं है।
आजकल हर चीज हक्का-बक्का करने वाली जान पड़ती है। तकनीक प्रत्येक चीज में दखल दे रही है और राजनीति में नाटक के ‘प्लाट’ इतनी तेजी से बदलते हैं कि उन पर नियंत्रण रखना मुश्किल होता है। भ्रष्टाचार और घोटाला को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी के ‘गेट’ शब्द से ही कितने नए शब्द निकले हैं- वाटरगेट, फांटगेट, कोलगेट, मोनिकागेट, कैमिल्लागेट आदि। जो हो, यह बिलकुल संभव नहीं कि दिन-प्रतिदिन इस बदलते हुए विश्व में, नित नई घटनाओं के साथ भाषा भी तालमेल बिठाए रखे और बराबर नए शब्द देती रहे। अब भी बहुत-सी स्थितियां, गोचर विषय हैं, जिनको व्यक्त करने के लिए हिंदी और अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं हैं।
आपकी कॉफी पीने की आदत आपको कैंसर से छुटकारा दिला कर क्या आपको जीवन का आनंद लंबे समय तक लेने में सहायता करेगी या आपको अपने समाधि स्थल पर जल्दी भेजेगी? कुछ भी कहना मुश्किल है, क्योंकि विज्ञान इतनी तेजी से प्रगति कर रहा है कि आप उसका ओर-छोर नहीं पकड़ सकते। अगर आप भ्रमित हों तो एक शोध के अनुसार, जो लोग प्रति दिन तीन से चार कप तक कॉफी पीते हैं उनकी कॉफी न पीने वालों की अपेक्षा अकाल मृत्यु के शिकार होने की संभावना कम है। मगर चिंता की बात नहीं, आप एक सप्ताह तक इंतजार कीजिए। हो सकता है कि जल्दी ही कोई नया शोध सामने आए, जिससे इसके विपरीत स्थिति की पुष्टि हो। पर क्या इस प्रकार की स्थिति के लिए हिंदी में कोई शब्द है? एक व्यक्ति ने इसके लिए अंग्रेजी में ‘कॉफयूज्ड’ शब्द सुझाया है।
आज शब्दों को उनके सामान्य अर्थ से इतना भिन्न अर्थ दिया जाता है, लेकिन ऐसे ढंग से, जिससे एक नई रीति या परिपाटी भी बनती जाती है, जिसका लक्ष्य है एक आक्रामक भाव को बनाए रखना या संकट की स्थिति में ‘हिस्टीरिया’ की-सी स्थिति बनाए रखना। आप सरल से सरल शब्दों का प्रयोग करके भी एक अत्यंत क्लिष्ट वाक्य या पूरा का पूरा अनुच्छेद जटिल बना सकते हैं। आज जब शब्द को जन तक पहुंचने के साधन इतने विकसित हो गए हैं, शब्द को दूर-दूर तक पहुंचाया जा सकता है- यानी जब शब्द के उपयोग की संभावनाएं बहुत बढ़ गई हैं, तब उसके दुरुपयोग की संभावनाएं भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं- इस खतरे को देखना और इसके प्रति सतर्क होना आवश्यक है। कई शब्द एक से अधिक अर्थ में इस्तेमाल होते हैं, बिना यह स्पष्ट किए कि कहां पर कौन-सा अर्थ आपके सामने है।
मध्य पूर्व यानी खाड़ी देशों का क्षेत्र अब भी एक अंधकारपूर्ण प्रदेश कहा जा सकता है। अमेरिका और ब्रिटेन न चाहते हुए भी उसे सभ्य, सुसंस्कृत बनाने की कोशिश में हैं। लेकिन वहां के तानाशाहों, धार्मिक कट्टरपंथियों और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं के बावजूद एक अपवाद भी है- सऊदी अरब। हज की भूमि और मरुस्थल में जनतंत्र का आकाश दीप। जब लोगों द्वारा नहीं चुना गया कोई नेता अपने दुश्मनों का सफाया करता है, तो उसे निरंकुश शासन कहा जाता है, पर हमारा कोई संपन्न मित्र यही करता है तो हम उसे ‘सुधार’ कहते हैं। जब कोई भयंकर युद्ध करता है, तो दुनिया भर के देश ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ मान कर उसकी भर्त्सना करते हैं, लेकिन सभी उसे शस्त्रास्त्र बेचने की होड़ में आगे बढ़ते नजर आते हैं और जब वह देश सैनिक शस्त्रास्त्र खरीदने पर धन लुटाता है, तो यह अलग बात है। जैसे कि ब्रिटेन ने पिछले वर्ष के पहले छह माह में एक अरब पौंड से भी अधिक के शस्त्रास्त्र सऊदी अरब को बेचे। इस स्थिति को आप किस शब्द से व्यक्त करेंगे?
अब आप उस स्थिति की कल्पना करें कि कोई व्यक्ति आपकी दृष्टि में कुछ ऐसा कर रहा है, जिससे आपको बड़ी घबराहट हो रही है और उसे इसका ज्ञान नहीं है, पर आप कुछ कह नहीं पाते। इसे आप क्या कहेंगे? इसी प्रकार की और भी स्थितियां होती हैं, जिन्हें आप शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि उसके लिए आपको कोई उपयुक्त शब्द नहीं सूझता। क्या कोई शोध कर ऐसे शब्दों की सूची बनाएगा?
दूसरी भाषाओं से हम जो शब्द ग्रहण करते हैं, वे घिस-पिट कर कोई ऐसा रूप ले लेते हैं जो हमारे हो जाते हैं और हमारे हो जाने के बाद अगर हमें कोई बताता है कि हमने विदेशी भाषा से ये शब्द लिए हैं तो हमें आश्चर्य होता है, जैसे अंग्रेजी के ‘लेंटर्न’ के लिए हिंदी में ‘लालटेन’। अज्ञेय ने ‘रेस्तरां’ शब्द के संबंध में रोचक टिप्पणी की है- रेस्तोरां, रेस्तरां, रेस्टारेंट।… इटली में चलता है रिस्तोरान्ते, ईरान में हो गया है रिस्तूरान- यहां क्या दिक्कत है अगर हम कहें ‘रसतुरंत’?’ ‘रेस्त्रां’ से तो कम ही अपभ्रष्ट है और है भी तो एक नई सार्थकता पा गया है।
कालिन्स डिक्शनरी के नए संस्करण में जो नए शब्द शामिल किए गए हैं उनमें ‘ब्रेग्जिट’ को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। पिछले चालीस वर्षों में इसे राजनीतिक भाषा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शब्द माना गया है। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 2013 में किया गया था, पर जून 2016 में ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने/ न रहने के प्रश्न पर किए गए जनमत के बाद इसके प्रयोग में अप्रत्याशित रूप से चौंतीस सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई। जिस प्रकार अमेरिकी राजनीति में ‘वाटरगेट स्कैंडल’ ने किसी भी प्रकार की बड़ी दुर्घटना के अंत में ‘गेट’ उपसर्ग लगाने की शुरुआत की, उसी प्रकार ‘ब्रेग्जिट’ ने ‘एग्जिट’ की शुरुआत की है। ‘ट्रंपिज्म’ भी एक ऐसा ही शब्द है, पर ट्रंप ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिनके नाम पर राजनीति में किसी नए शब्द का जन्म हुआ। ब्रिटेन में प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के नाम पर ‘थैचरिज्म’ (थैचरवाद) और अमेरिका में राष्ट्रपति रीगन के नाम पर चला ‘रीगोनोमिक्स’ भी ऐसे ही शब्द हैं।
लोग किसी शब्द को क्यों पसंद या नापसंद करते हैं। इसके हमेशा दो कारण होते हैं। एक तो है उसका अर्थ और दूसरा है उसकी ध्वनि। इन दोनों को अलग-अलग करना आसान नहीं है। ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करते हुए किसी शब्द के अर्थ को आप अगर निकाल कर उसके किसी पर्यायवाची शब्द को रखना चाहें तो इससे आपकी पसंद-नापसंद का पता चलेगा। जो शब्द आप नापसंद करते हैं, उसे दूसरे वर्ग के लोग पसंद कर सकते हैं। नापसंद किए जाने वाले शब्दों में अधिकतर प्राय: छोटे- दो, तीन या चार अक्षरों वाले- होते हैं। इसके विपरीत जिन शब्दों का अर्थ रुचिकर या कम से कम तटस्थ होता है, भले ही उनकी ध्वनि कर्णप्रिय न हो, उन्हें भी लोग पसंद करते हैं।
