एक कथा बहुत बार सुनाई जाती है। एक व्यक्ति था, चलने-फिरने में अक्षम। एक ही जगह बैठा रहता। उसे दूसरे ही चला-फिरा देते, तो चल लेता। खुद नहीं चल पाता। ऐसा वह जन्म से नहीं था। जैसे-जैसे आयु बढ़ती गई, वह ऐसा होता गया था। कुछ कहते कि उसके पैरों को किसी रोग ने ग्रस लिया है।
कुछ कहते मन की किसी बीमारी ने उसके पांवों को जड़ कर दिया है। जो हो, पर वह लाचार हो चुका था। बस, एक जगह बैठा रहता। दूसरों का मुखापेक्षी कि कोई उसे सहारा देकर नित्यक्रिया करा दे। जैसा कि होता है, घर वालों ने भी उसे अक्षम समझ कर एक कोने में पड़ा छोड़ दिया था। वह दिन भर वहीं पड़ा रहता।
मगर एक दिन चमत्कार हुआ। वह व्यक्ति, जो खुद उठ-बैठ नहीं सकता था, चल ही नहीं पड़ा, दौड़ पड़ा। हुआ यों कि घर में आग लग गई। परिवार के सारे जन जान बचा कर बाहर भाग गए। आग बुझाने के लिए कोई पानी फेंक रहा था तो कोई रेत फेंक रहा था। तभी कोई चिल्लाया कि अरे, वह लाचार आदमी तो घर के भीतर ही रह गया।
जल कर मर जाएगा। कोई भीतर जाकर उसे बचाने की कोशिश करता, उससे पहले ही लोग देख कर हैरान हुए कि वह लाचार आदमी खुद भागता हुआ घर के भीतर से चला आ रहा है। जब वह बाहर आया और उसने लोगों को हैरान होकर अपनी तरफ देखता देखा, तो वह भी हैरान हुआ कि वह तो खुद अपने दोनों पैरों पर खड़ा होकर भागता हुआ आया है। फिर उसी दम से उसकी लाचारी जाती रही।
ऐसी ही बीमारियां कई बार हमारे भीतर जड़ता भर देती हैं, हमें जकड़ कर जड़ बना देती हैं। यह जड़ता कहीं और से नहीं, हमारे मन से पैदा होती है। मन की ताकत कमजोर होती जाती है, तो हम लाचार होते जाते हैं, खुद से हारते जाते हैं। फिर हम मान लेते हैं कि उठ-बैठ ही नहीं सकते, चल-फिर नहीं सकते।
इसलिए कि हम कभी यह पहचान ही नहीं पाते कि मन ने हमें पंगु बनाना शुरू कर दिया है। जिस दिन मन की यह साजिश पता चल जाती है और मन को धकिया कर परे धकेल देते हैं, उसी दम साहस से भर उठते हैं, उसी दम हममें नया करने का संकल्प जाग जाता है। वही संकल्प सच्चा होता है।
