कथा बुद्ध के जीवन से जुड़ी है। बुद्ध प्रवचन कर रहे थे। सामने एक व्यक्ति बैठा उनकी बातें बहुत ध्यान से सुन रहा था। बुद्ध की नजर उस पर गई। देखा कि वह व्यक्ति अपने पैर का अंगूठा लगातार हिला रहा है। बुद्ध ने उसे टोका। पूछा, ऐसा क्यों कर रहे हो। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि उसे पता ही नहीं कि उसका अंगूठा हिल रहा है। वह जानबूझ कर अपना अंगूठा नहीं हिला रहा था। अनजाने में ही उसका अंगूठा हिल रहा था। यह उसकी आदत बन गई थी।
बुद्ध ने कहा, जब तुम्हें अपने शरीर की गतिविधियों के बारे में ही होश नहीं तो फिर चित्त की गति को कैसे समझ सकते हो। चित्त तो सबसे अधिक चंचल है। उस पर काबू पाना सबसे बड़ी चुनौती है। अगर होश में नहीं होंगे, हर वक्त बेखयाली में रहेंगे, तो जीवन को भला कैसे ठीक से जी सकेंगे।
ऐसा सबके जीवन में होता है। बहुत सारी अपनी गतिविधियों के बारे में हमें पता ही नहीं। शरीर में कब क्या हरकत हुई, ध्यान ही नहीं।
शरीर के किसी अंग में जब तक पीड़ा न हो, तब तक उसके बारे में सोचते तक नहीं। जीवन में बहुत सारे काम हम बिना सोचे-समझे किए जा रहे हैं। कभी गंभीरता से सोचते ही नहीं कि जो कर रहे हैं, उसका जीवन पर आखिर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसीलिए गलत और सही के बारे में फैसला नहीं कर पाते।
बाल्मीकि के जीवन का वह प्रसंग तो सबको पता है कि वे पहले एक डाकू थे। जब उन्हें महात्मा ने कहा कि जो काम तुम अपने परिवार की सुख-सुविधाओं के लिए कर रहे हो, उसके पाप के भागी क्या परिवार के लोग बनेंगे। बाल्मीकि ने जाकर घर वालों से पूछा। सबने इनकार कर दिया। उसके बाद बाल्मीकि के जीवन में परिवर्तन आ गया। जब हम कोई भी काम सोच-समझ कर करते हैं, उसके सही या गलत होने की जानकारी के साथ, पूरे होशो-हवाश में करते हैं, तो उसका परिणाम सदा अच्छा ही होता है। बेखयाली में किया कोई भी काम अच्छा हो ही नहीं सकता।
