रूपा
मन का स्वभाव है चंचलता। छिन-छिन यहां से वहां फुदकते रहना। एक जगह ठहरता ही नहीं। बावला है। इसके वैज्ञानिक कारण भी तलाश लिए गए हैं। मस्तिष्क में जिसके जितनी सूचनाएं जमा हैं, जितने अनुभव जमा हैं, उसका मन भी उतना ही डोलता है। मस्तिष्क में करोड़ों न्यूरान होते हैं। एक न्यूरान में करोड़ों सूचनाएं दर्ज करने की क्षमता होती है। वह हर गंध, हर स्पर्श, हर स्वाद को दर्ज करता चलता है। जैसे कंप्यूटर की मेमोरी में सूचनाएं दर्ज होती हैं, उसी तरह। कंप्यूटर की मेमोरी से तो सूचनाओं को मिटाने की व्यवस्था है, मगर मस्तिष्क के न्यूरान से सूचनाओं को मिटाना कठिन है। वे अनुकूल स्थितियां-परिस्थितियां पाकर मन पर दस्तक देनी शुरू कर देती हैं। इस दस्तक से कभी सुख का अनुभव होता है, तो कभी दुख का, पीड़ा का।

मन बेशक सुख की तलाश में भटकता रहता है, पर सच्चाई यह भी है कि उसे सुख पीड़ा से भी मिलता है। पीड़ा से मिलने वाले सुखों की लंबी फेहरिस्त है। मनुष्य न केवल दूसरों से मिली पीड़ा से सुख का रस खींचता है, बल्कि वह खुद भी खुद को पीड़ा देकर सुख पाता रहता है। मनोवैज्ञानिकों ने इस तरह दुख से सुख प्राप्त करने वालों को दो श्रेणियों में विभक्त कर रखा है। एक वे, जो दूसरों को पीड़ा देकर सुख पाते हैं और दूसरे वे जो खुद को पीड़ा देकर सुख पाते हैं।

सुख की भी कई कोटियां हैं। बहुत सारे लोगों को सुस्वादु भोजन या नशीले पदार्थों का सेवन करके सुख प्राप्त होता है। बहुत सारे कहीं पहाड़, नदी, बाग, सिनेमा देख कर सुख प्राप्त कर लेते हैं। बहुत सारे लोग, बल्कि कहें ज्यादातर लोगों को स्त्री या पुरुष के साहचर्य में सुख मिलता है। मगर ज्यादातर लोगों का अंतिम निष्कर्ष यही होता है कि जिसे आमतौर पर सुख मान लिया जाता है, वह वास्तव में सुख है ही नहीं, वह दुख का कारण बनता है। ऐसे सुखों को क्षणिक कहा गया है। अंग्रेजी में इसे एनजायमेंट कहा गया है।

पूरी दुनिया इसी सुख के लिए मारामारी करती फिर रही है। उनका मन इसी सुख की तलाश में भटक रहा है। इसी सुख के लिए सारे सरंजाम जुटाए जा रहे हैं। ठगी, धोखाधड़ी, हत्या, बलात्कार सब इसी सुख के लिए हो रहे हैं। इसी में बहुत सारे लोग ‘एनजाय’ कर रहे हैं। मजे ले रहे हैं।

इसी सुख को स्थायित्व प्रदान करना बहुत सारे लोगों ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। अक्सर ऐसे लोग आदर्श बघारते मिल जाते हैं कि जिंदगी क्या है, चार दिनों का मेला है। चार दिन खा-पी कर मौज में जी लो, यही जिंदगी का सुख है। कुछ गंभीर ज्ञान की मुद्रा में उतरते हैं, तो बड़े गर्व के साथ चार्वाक का कथन उद्धृत कर देते हैं- यावत् जिवेत, सुखम् जिवेत… जब तक जियो सुख से जियो, बेशक कर्ज लेकर ही घी क्यों न पीना पड़े, पर पियो। कुछ तो अज्ञानी भौतिकतावादियों ने और बहुत ज्यादा आस्तिकों ने चार्वाक के इस कथन को ऐसे छिछले और निहायत सामान्य अर्थों में समेट दिया। कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं कि सुख से जीने का अर्थ वास्तव में है क्या।

कई लोग दूसरों की मदद करके सुख पाते हैं। कोई बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर सुख प्राप्त करता है, तो कोई दीन-दुखियों की सेवा करके। यह कुछ टिकाऊ प्रकृति का सुख है। देर तक ठहरता है। इस रास्ते भी असल आनंद प्राप्ति का मार्ग खुलता है। मगर इसे भी बहुत सारे लोगों ने क्षणिक सुख में समेट दिया है। बस यह दिखाने के लिए कि वे दूसरों की मदद कर रहे हैं, सेवा कर रहे हैं, ऐसे काम करते रहते हैं। दान-पुण्य, देवालयों के लिए चंदा, साधु-संतों के लिए भोजन-वसन, गरीबों के लिए भंडारा वगैरह लगा कर अपना नाम चमकाने का प्रयास करते और सुख पाते हैं। अब तो लाखों की संख्या में स्वयंसेवी और धर्मादा संस्थाएं पंजीकृत हैं ऐसे कामों के लिए। इसलिए यह सुख भी बहुत टिकाऊ नहीं रह गया।

मगर इससे भी आगे का एक सुख है, आनंद है, जिसे परम आनंद कहा गया। अंग्रेजी में डिलाइटमेंट। इस आनंद की अनुभूति के बाद मन का डगमग स्वभाव, चंचल स्वभाव काबू में हो जाता है। इस अवस्था में पहुंच कर न्यूरान में दर्ज स्मृतियों को मिटाया भी जा सकता है। बल्कि कहें, वे स्वत: मिट जाती हैं। यह स्थिति साधना से प्राप्त होती है। मगर साधना का अर्थ कर्मकांड नहीं। बहुत सारे लोग मन को शांत करने, अपने चित्त को अपने स्व-भाव में लाने के लिए पूजा-पाठ, कर्मकांड, ज्योतिष, तंत्र आदि विद्याओं का सहारा लेते हैं। उनसे कुछ देर को मन काबू में आया जरूर जान पड़ता है, मगर वह स्थायी उपाय साबित नहीं होता।

मन की चंचलता का एक कारण विकल्पों की बहुलता भी है। आज के समय में सूचनाओं की इस कदर बहुलता है कि चाहे-अनचाहे वे लोगों को अपनी गिरफ्त में ले ही लेती हैं। हर हाथ में आ गया स्मार्ट फोन उपभोक्ता के न चाहते हुए भी बहुत सारी सूचनाएं उसके पास हर पल उंड़ेलता रहता है। अब हर किसी के पास एक चीज के बहुत सारे विकल्प हैं। मन डगमग डोलता रहता है कि उनमें से आखिर किसका चुनाव करे। इस तरह बहुत सारी गैरजरूरी चीजें जमा होती रहती हैं- घर में भी दिमाग में भी। यह एक तरह का प्रदूषण है। मन का प्रदूषण। यह प्रदूषण उसी तरह हमारे जीवन को नष्ट कर रहा है, जैसे दूसरे प्रदूषण कर रहे हैं। हमारी संवेदना को क्षरित कर रहा है। इससे मुक्ति तभी संभव है, जब मन का बावलापन समाप्त हो। वह तर्क से संचालित हो। यह बावलापन कैसे समाप्त होगा, इसका रास्ता तलाशना व्यक्ति का काम है।