शिखर चंद जैन
सारंगपुर के एक छोटे से गांव में रहता था कल्लू लोहार। उसके हाथों में मानो जादू था। वह जो कुछ बनाता, पूरे मन से बनाता। उसकी बनाई चीजें लोगों को खूब पसंद आतीं चाहे वह रसोई में काम आने वाला कोई बरतन हो या हथियार। लोग बातों-बातों में कहते थे कि कल्लू की बनाई चीजें तो मुंह से बोलती हैं। उसकी कलाकारी की प्रशंसा इतनी फैली कि राजा तक बात पहुंच गई। राजा जरा सनकी और मूर्ख था। साथ ही वह क्रोधी बहुत था। उसने जब सुना कि कल्लू की बनाई चीजें मुंह से बोलती हैं, तो अपने सिपाहियों को उसे महल में पेश करने को कहा। कल्लू राजमहल में पहुंचा, तो राजा ने उसका खूब स्वागत सत्कार किया। उसके लिए तरह-तरह के व्यंजनों और नए वस्त्रों का प्रबंध किया। कल्लू बड़ा खुश हुआ।
राजा ने कहा, ‘तुम्हारा बड़ा नाम सुना है। लोग कहते हैं कि तुम्हारी बनाई हुई चीजें मुंह बोलती हैं।’ कल्लू ने हाथ जोड़ कर विनम्रतापूर्वक कहा, ‘जी महाराज, मेरे गांव में लोग मुझे चाहते हैं, इसलिए ऐसा कहते हैं।’
राजा ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि तुम हमारे लिए लोहे के सैनिकों की एक ऐसी टुकड़ी बनाओ, जो इंसानों की तरह चल-फिर सकें, हंस सकें और बातें कर सकें। हम उन्हें अपना अंगरक्षक बनाएंगे, ताकि मुश्किल से मुश्किल घड़ी में हर दुश्मन से मुकाबला कर सकें। हमारी सुरक्षा कर सकें।’ राजा की बात सुन कर कल्लू का चेहरा उतर गया। उसे पता था कि राजा सनकी और मूर्ख होने के साथ-साथ क्रोधी भी है। कल्लू ने विनम्रता से कहा, ‘महाराज इस कार्य के लिए मुझे योजना बनानी पड़ेगी। कृपया दो दिन का वक्त दें।’ राजा ने खुशी-खुशी उसे दो दिन का वक्त दे दिया और अपने अतिथि भवन में ठहराया। कल्लू सोच में डूब गया। उसने ईश्वर को याद किया। आखिर उसे दूसरे दिन रात तक उसे राजा के चंगुल से निकलने का उपाय सूझ ही गया। कल्लू सुबह सवेरे नहा-धोकर राजा के दरबार में पहुंच गया। उसने कहा, ‘महाराज की जय हो! महाराज! दो दिनों के सोच-विचार के बाद आखिर मैंने लौह मानव बनाने का ठोस और कामयाब तरीका खोज लिया है। बस, मुझे कुछ खास चीजों की जरूरत होगी, जिसका इंतजाम करना आपके लिए शायद मुश्किल हो… लेकिन जीवित लौह मानव तैयार करने के लिए ये चीजें बहुत जरूरी हैं।’
राजा बेहद खुश हो गया। उसने बीच में ही कल्लू की बात काटते हुए कहा, ‘अरे! हमारे लिए भला दुनिया की कौन-सी चीज का इंतजाम मुश्किल होगा? राजकोष भरा है, सैंकड़ों सेवक और सैनिक हैं, तुम तो जल्दी से उन चीजों का नाम बताओ। मैं एक-दो दिनों में सब मंगवा दूंगा।’ कल्लू बोला, ‘महाराज, हम एक अद्भुत चीज बनाने जा रहे हैं, जो आज तक किसी ने न बनाई और न इसके बारे में सोचा। लेकिन इसे बनाने के लिए मुझे खास किस्म का लोहा चाहिए, जो बेहद लचीला होता है। लेकिन यह लोहा यहां से दो हजार किलोमीटर दूर सांगावन की पहाड़ियों की गहराइयों में मिलेगा। इसके लिए हमें पहाड़ियों को कम से कम डेढ़ सौ फीट गहरा खोदना होगा। इसके अलावा बतख की चोंच से होकर निकला हुआ पानी कम से कम छह सौ घड़े और लौह मानव के हाथ-पैर और शरीर के अंगों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए यहां से पांच सौ मील दूर चैलवन में स्थित पेड़ों से निकला गोंद चाहिए। यह गोंद बिल्कुल ताजा होना चाहिए। सूखने के बाद उससे लोहा तो क्या, कागज भी नहीं चिपकेगा।
कल्लू की बात सुन कर राजा का चेहरा उतर गया। उसने कहा, ‘कल्लू! क्या इन चीजों के बिना तुम हमारे राज्य में मौजूद लोहे और अन्य सामग्री से लौह मानव नहीं बना सकते? तुम तो जानते कि सांगावन जाने और आने में ही पांच साल लग जाएंगे और फिर हमारी पूरी सेना मिल कर भी पहाड़ियों को इतनी गहराई तक नहीं काट पाएगी। फिर तुम जो गोंद मंगवा रहे हो, वह भी तो यहां तक आते-आते ताजा नहीं रह पाएगा। तुम्हें जो तीसरी चीज चाहिए, उसका इंतजाम तो बिल्कुल असंभव है। हमारे राज्य में बमुश्किल सौ बत्तखें होंगी। वे अपनी चोंच से पानी डाल-डाल कर आखिर छह सौ घड़े कैसे भर पाएंगी? क्या कोई और उपाय नहीं है?’ कल्लू ने उदास होने का नाटक करते हुए कहा, ‘नहीं महाराज! मुझे खुद ही दुख हो रहा है कि मैं आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा। लेकिन मैं मजबूर हूं। बिना समुचित सामग्री के लौह मानव का निर्माण संभव नहीं। हां, मैं आपकी सेना के लिए ऐसी नायाब तलवारें और ढालें जरूर बना दूंगा, जो शत्रु सेना के छक्के छुड़ाने में मददगार होंगी… और आपके लिए एक ऐसा विशाल और मजबूत रथ बना कर दूंगा जो दूर-दूर तक किसी राजा के पास नहीं है।’
कल्लू की बात सुन कर राजा के चेहरे पर फिर से मुस्कान आ गई। उसने कल्लू को अपने गांव में ही रह कर रथ, तलवारें और ढाल बनाने का आदेश देते हुए ढेर सारे उपहार दिए और उसे सम्मानपूर्वक उसके गांव तक छुड़वा दिया।
