जहीर कुरेशी
ई का यह पहला ठिया था। मेरे बाबा के साथ मेरी मां पूरे चौदह साल रही। बाबा के गुजर जाने के बाद माई के सामने सबसे पहली कठिनाई बारह साल की बेटी के साथ अकेले लंबा जीवन काटने की थी। बाबा के शांत होते समय माई की उम्र यही कोई अड़तीस से चालीस साल के बीच रही होगी। उस समय एक प्रकार से माई जवान भी थी और सुंदर भी। ऐसी विधवा को भला चैन से कौन रहने देता? छह महीनों के अंदर ही माई के पास कुटनियों के माध्यम से तरह-तरह के शादी के प्रस्ताव आने लगे। माई ने फैसला अपनी तर्क-बुद्धि से लिया और फिर हमारे घर निखिल अंकल रहने आ गए। निखिल अंकल को मैं जानती थी, मेरे बाबा के अंडर में क्लर्क थे। कभी-कभी इतवार या किसी छुट्टी वाले दिन फाइलें लेकर बाबा के सामने पेश होते थे, लेकिन, बहुत अदब से।
माई ने ही मुझे बताया- निखिल अंकल भी अब हमारी तरह दुनिया में बिल्कुल अकेले हैं। बच्चा जनते समय आंटी जी की मृत्यु हो गई। उनको भी किसी का साथ चाहिए, हमको भी। इसलिए मैं और निखिल दोनों कल विवाह के बंधन में बंध रहे हैं। संजना, यह सब मैं तुम्हारी वजह से कर रही हूं, ताकि तुम्हें पिता का प्यार भी मिलता रहे।
माई की शादी हो गई, जो मेरी नजर में बेमेल थी। निखिल अंकल माई से उम्र में दस साल छोटे थे। माई के सामने छोटे लगते भी थे। कहां कद्दावर औरत अंजना गहलोत यानी माई और कहां उम्र और कद-काठी में उन्नीस निखिल अंकल। यह मुझे पति-पत्नी की कम, देवर-भाभी की जोड़ी अधिक लगती थी। निखिल अंकल से शादी की एक वजह तो संभवत: यह थी कि हम दोनों उन्हें जानते थे। दूसरे, बाबा के नीचे काम करने वालों में निखिल सबसे मधुरभाषी थे, शायद माई उन्हें पसंद भी करती थी।
निखिल अंकल के साथ मां द्वारा पहले कोर्ट मैरिज और फिर उसके बाद लिए गए सात फेरों के साथ ही घर में कुटनियों का आना-जाना बंद हो गया। धीरे-धीरे घर की उदासी और तनाव छंट गया और मेरा फिर से पढ़ाई में मन लगने लगा। उस समय, मैं सेंट जोजफ स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। पढ़ाई-लिखाई में तो मैं औसत ही थी, लेकिन, स्कूल की खेल गतिविधियों में अव्वल। बैडमिंटन मेरा पसंदीदा खेल था, मेरी खेल अध्यापक मुझे प्रोत्साहित भी बहुत करती रहती थीं। उनके जोर देने पर ही मैंने शहर की स्पोर्ट्स अकादमी में बैडमिंटन के लिए प्रतिस्पर्धा की और डे-स्कॉलर के तौर पर चुन ली गई। अब शाम को रोज पांच बजे से सात बजे तक मुझे नियमित बैडमिंटन खेलने अकादमी जाना होता था।
स्पोर्ट्स अकादमी में यों तो बहुत-से दोस्त और सहेलियां बनीं। लेकिन, मिस संतोष रंधावा मेरी बेस्ट फ्रेंड बन गई। उम्र में मुझसे वह दो-तीन साल बड़ी थी, लेकिन अनुभव में दस साल बड़ी लगती थी। स्पोर्ट्स अकादमी का कौन-सा कोच कैसा है, साथी लड़कों को फ्लर्ट करते हुए क्या फायदा उठाना है, बैडमिंटन में हम दोनों को किस मुकाम तक पहुंचना है जैसी बहुत-सी बातें मैंने संतोष से ही सीखीं।
धीरे-धीरे माई उसी शैली में घर की मालकिन बन गई, जैसी बाबा के समय थी। निखिल अंकल भी पूरी तरह माई पर निर्भर होते जा रहे थे। माई उनके खानपान से लेकर ड्रेस-अप तक सब कुछ तय करती थी। निखिल अंकल माई की प्रशंसा और ‘ओके’, ‘राइट’ के अलावा और कुछ नहीं बोल पाते थे। हां, एक दिन जरूर दबे स्वर में निखिल अंकल ने माई से कहा- ‘अंजना, घर के खर्च पर अंकुश लगाओ। मेरा मासिक वेतन सर (तुम्हारे पहले पति) की तुलना में आधा है। मुझे ऊपर से भी कुछ नहीं मिलता!’ इस मुद्दे पर पति-पत्नी में दो-चार दिन ठनी रही, अनबोला भी रहा। एक दिन मैंने माई से कहा भी, ‘निखिल अंकल अपनी आय की चादर की सीमा बता रहे हैं, इसमें गलत क्या है!’
इस समय तक मैं उम्र की चार सीढ़ियां और चढ़ चुकी थी, अब मैं सोलह साल की थी। मेरी बात पर माई ने शायद कुछ सोचा-विचारा होगा। अगले दिन से पति-पत्नी उसी प्रेम भाव के साथ एक-दूसरे से बतिया रहे थे।
अकादमी में डे स्कॉलर चुन लिए जाने के बाद बैडमिंटन की किट, ड्रेस, ब्रेक-फास्ट सब कुछ मुझे अकादमी की ओर से मिल रहा था। एक हजार रुपए मासिक मुझे अलग से दिए जाते थे- ताकि मैं घर पर अच्छे खानपान द्वारा अपना स्टैमिना बढ़ा सकूं। अपने बेहतरीन परफॉर्मेंस के कारण, अकादमी में मेरी और संतोष की पूछ-परख बढ़ने लगी। साथ ही हमें स्पर्धा की जगह, ईर्ष्या करने वाले साथियों की चालों से भी खुद को बचाना पड़ रहा था। उधर एक बैडमिंटन-कोच मेरी सुंदर सहेली संतोष के पीछे पड़ गया था।
निखिल अंकल के साथ रहते हुए हम लोगों को पांच साल पूरे हो चुके थे। शादी की पांचवीं वर्षगांठ माई ने घर पर ही मनाई। माई की दो-तीन सहेलियों और निखिल के पांच-छह दोस्तों के अलावा मेरी सखी संतोष ने भी जश्न में शिरकत की। घरेलू शानदार डिनर के बाद बधाइयों का आदान-प्रदान करते हुए सब लोग एक-दूसरे से विदा हुए।
अगली सुबह के साथ, सब लोग अपनी रूटीन जिंदगी में व्यस्त हो गए।
लगभग तीन महीने बाद, एक दिन सुबह नाश्ता करते हुए, डायनिंग टेबिल पर सन्नाटा पसरा रहा। तीनों जन एक-दूसरे से कुछ भी नहीं बोले। मुझे महसूस हुआ- यह सन्नाटा घर में किसी तूफान के आने का संकेत है। मैं इस सन्नाटे को हल करना चाहती थी, फोन करके मैंने निखिल अंकल को अकादमी बुला लिया। संतोष से विदा लेकर हम लोग अपने घर की ओर चले। बीच रास्ते में मैंने अंकल से कहा, ‘इंडियन कॉफी हाऊस में हम लोग कॉफी लेंगे, आपसे कुछ बात करनी है।’
अंकल ने मना नहीं किया। कॉफी हाऊस के पहले तल की सभी कुर्सियां ठसाठस भरी हुई थीं, इसलिए हम दूसरे तल पर पहुंचे, जहां आठ-दस जोड़े ही बैठे दीख रहे थे। हम लोगों ने दूर की सबसे कोने वाली टेबिल पकड़ी। बात मैंने ही शुरू की, ‘अंकल, घर में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, माई भी बुझी-बुझी-सी रहती है।’
‘सचमुच!’ कहते हुए निखिल अंकल ने बात को आगे बढ़ाया, ‘संजना, मैंने तुम्हारी माई से इसलिए दूसरी शादी की थी, क्योंकि वे मुझे सर के जमाने से ही अच्छी लगती थीं। तुम्हें भी पिता की जरूरत थी। यह जानते हुए कि अंजना मुझसे दस साल बड़ी हैं, मैंने उनसे शादी की। लेकिन, वे तो पत्नी की जगह मेरी मां बन बैठीं। देह के रिश्ते को माइनस कर दिया जाए तो आज की तारीख में अंजना मेरी मां हैं। उनके सामने जब तक मैं बेटा बन कर रहता हूं, रिश्ता ठीक-ठीक चलता है। जैसे ही मैं पति बनने की कोशिश करता हूं, खींचतान शुरू हो जाती है!’
इस बीच कब मिक्स्ड कॉफी आई, कब हम लोगों ने पीकर खत्म की, कुछ पता नहीं।
उठते-उठते मैंने निखिल अंकल को आश्वस्त किया, ‘मैं माई से भी बात करूंगी। मैं आप दोनों की सहायता करना चाहती हूं, चाहती हूं कि घर की पहले जैसी सुख-शांति लौट आए।’
घर लौट कर मैंने पहले थोड़ा आराम किया, फिर स्कूल का रूटीन होमवर्क। तभी माई ने डिनर के लिए आवाज लगाई, तीनों डाइनिंग टेबिल पर जा बैठे। माई टेबल पर भोजन सजा रही थी। तभी निखिल अंकल ने मेरी बैडमिंटन की प्रोग्रेस और भविष्य की योजना के विषय में पूछा। मैं उनको अपनी खेल-योजनाओं के विषय में बताने लगी, तभी मैंने देखा- माई मुस्कुरा रही है। मैंने अपनी बात बीच में रोकते हुए मां से कहा- ‘मुस्कुराते हुए, माई, तू कितनी दिलकश लगती है!’ उस रात, डिनर के बीच, मेरे अलावा पति-पत्नी ने भी एक-दूसरे से संवाद किया। तनाव के स्तर में काफी गिरावट महसूस की गई।
धीरे-धीरे एक महीना और बीत गया।
उस दिन मेरी स्कूल की छुट्टी थी, अंकल आॅफिस चले गए थे। दिसंबर की कड़कड़ाती सर्दी। माई बालकनी में धूप में बैठी इत्मीनान से दाल से कंकर चुन रही थी। एक मूढ़ा डाल कर मैं भी माई के सामने बैठ गई। माई ने व्यंग्य किया, ‘आज कैसे संजना जी को अपनी मां के पास बैठने की फुरसत मिल गई?’
‘बेटी अठारह साल की हो गई है। एक मां को अपनी बेटी की न सही, लेकिन, बेटी को तो अपनी मां की चिंता होती है!’ मैंने भी उसी लहजे में मां को शॉट लौटाया।
माई ने थोड़ा चकित होते हुए पूछा- ‘मुझे क्या हुआ है?’
मैंने बहुत शांत और संयत स्वर में उत्तर दिया, ‘माई, अठारह साल से मैं तुझे लगातार देख रही हूं। क्या तेरी पीड़ा मुझसे छुपी रह सकती है!’
मैंने सिर उठा कर माई की ओर देखा, उसकी बड़ी-बड़ी सुंदर आंखों से टप-टप आंसू टपक रहे थे। माई- ‘उठ, भीतर चल कर बात करते हैं।’
मां उठ कर मेरे बेडरूम में आ गई। मैं पलंग पर बैठ गई, वह मेरी गोद में सिर रख कर रोती रही। मैंने कहा, ‘मां, निखिल अंकल से भला आदमी तुझे मिल नहीं सकता था। अंकल ने हमेशा मुझे अपनी बेटी समझा। इक्कीसवीं सदी के सौतेले पिताओं की तरह कभी मुझ पर गलत निगाह नहीं डाली।’
माई ने मेरी बात की पुष्टि करते हुए कहा, ‘रिश्ते के मामले में निखिल बहुत ईमानदार है। मेरे साथ भी वह भरपूर संबंध निभाना चाहता है, लेकिन, निभा नहीं पाता।’
मैंने प्रतिवाद करते हुए कहा, ‘निखिल अंकल से तू जो दस साल बड़ी है, वह उम्र ही दोनों के रिश्ते के बीच बाधा बन रही है।’
मेरी बात सुन कर मां उठ कर बैठ गई। पूछने लगी, ‘उम्र रिश्ते में बाधा कैसे बन सकती है!’
मैंने अधिक समझदार बनते हुए कहा, ‘औरत-मर्द सिर्फ शरीर नहीं होते, मां! उम्र के हिसाब से ही नर-मादा की भावनाएं निर्धारित होती हैं। शायद इसीलिए वर-वधू की उम्र में एक-दो साल का अंतर रखा जाता है- ताकि दोनों एक ही स्तर पर सोचें-विचारें।’
मेरी बात सुन कर मां चकित थी। उसे लगा, संजना अपनी उम्र से ऊंची बातें कर रही है। मेरी बातें उसे सच्ची भी लग रही थीं। लेकिन, सच कहूं तो मुझे यह ज्ञान इंडियन कॉफी हाऊस में निखिल अंकल से बात करके प्राप्त हुआ था। मैं बातों के इसी तारतम्य द्वारा परोक्ष रूप से मां तक निखिल अंकल की पीड़ा भी पहुंचा देना चाहती थी। उसके लिए शायद ये सबसे उपयुक्त क्षण थे। मैंने माई से कहा, ‘दस साल बड़ी होने के कारण, तू निखिल अंकल से शायद बड़ी भाभी की शैली में पेश आती है- अधिकार-पूर्वक। इस शैली में तू भूल जाती है कि पति का भी कुछ मन होता है। वह भी मर्दाना अधिकार के साथ पत्नी से बहुत कुछ चाहता है। माई, तुम दोनों के संबंधों में कठिनाई शायद इसी बिंदु पर हो रही है।’ माई मुझे टुकुर-टुकुर ताक रही थी, लेकिन, मैं अपनी बात पूरी कर लेना चाहती थी, ‘माई, बाबा से भी तो तुम्हारे संबंध रहे होंगे। क्या बाबा से भी तुम ऐसे ही पेश आती थीं!’
माई ने सोचते हुए थोड़ा रुक-रुक कर उत्तर दिया, ‘नहीं! तुम्हारे बाबा मुझसे पांच साल बड़े थे।’
उस दिन, पहली बार माई के साथ मैंने ऐसी-ऐसी बातें कीं, जैसी कभी नहीं की थीं। मुझे भी लगा- उम्र के साथ, एक संवेदनशील और परिपक्व लड़की मन ही मन बहुत-सी बातों का विश्लेषण कर सकती है। बस, कहीं से उसे थोड़ा-सा संकेत मिलना चाहिए।
साथ-साथ लंच लेकर, माई और मैं अपने-अपने कमरों में आराम करने चले गए। शाम पांच बजे मुझे अकादमी पहुंचना था। मैच जीत कर, मैं संतोष के साथ बहुत उत्फुल्ल-सी अपने घर लौटी।
निखिल अंकल आॅफिस से घर आ चुके थे, अपने रीडिंग रूप में कंप्यूटर पर किसी काम में व्यस्त थे।
अप्रत्याशित रूप से माई ने मुझे बैठक में आने के लिए बोला, फिर जबरन अंकल को रीडिंग रूम से उठा कर ड्राइंग रूप में बिठा दिया। माई खुद हम दोनों के सामने बैठ गर्इं। बोलीं, ‘आज, निखिल और संजना, केवल मैं बोलूंगी- आप दोनों सिर्फ सुनेंगे। सुनो संजना, आज की बैठक की तुम आॅनरेबल जज हो।’
निखिल अंकल और मैं मौन थे। वातावरण गंभीर हो रहा था। माई ने ही आगे बात शुरू की, ‘संजना, तुम्हारे सामने, सबसे पहले तो मैं माई स्वीट हार्ट निखिल से इस बात के लिए माफी मांगना चाहती हूं कि मैं उन्हें संतान-सुख नहीं दे सकी। कम से कम इस घर में एक बच्चा निखिल से भी होना चाहिए था। मेरे स्वार्थ के कारण यह सब नहीं हो पाया। दस साल उम्र में बड़ी होने के कारण, मैं जल्दी ही मोनोपॉज की स्थिति में आ गई। अब मेरा मां बन पाना मुश्किल है।’ निखिल ने आहत होते हुए प्रतिवाद किया, ‘कौन कहता है कि तुमने मुझे संतान-सुख नहीं दिया! संजना क्या सिर्फ तुम्हारी बेटी है! शी इज माई ओनली फीमेल चाइल्ड। वह हम दोनों का बड़ा नाम करने वाली है, अंजना! तुम अपने मन से इस ‘गिल्ट’ को पूरी तरह निकाल दो।’
माई ने अंकल की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘अभी मेरी बात खत्म नहीं हुई है। निखिल, मैं तुमसे और भी बहुत कुछ शेयर करना चाहती हूं।…. बहुत सोच-विचार के बाद, अब मुझे समझ आ गया है कि उम्र हर जगह अपना काम करती है। पति-पत्नी के रिश्ते में भी मुई इस उम्र के कारण बहुत कुछ बदल जाता है। मैं चाहती हूं कि आज के बाद मैं निखिल से उम्र में दो साल छोटी अंजना हो जाऊं। मैं अब निखिल से भाभी की शैली में नहीं, कम उम्र पत्नी या प्रेमिका की शैली में प्यार पाना चाहती हूं। जज साहब, आज भी मुझे मालूम नहीं है कि देह के स्तर पर निखिल मुझे किस तरह पाना चाहते हैं।’
माई की बातें सुन कर निखिल अंकल ने पहली बार मेरी ओर अर्थ-पूर्ण नजरों से देखा। मुझे लगा- गुत्थी सुलझ चुकी है! १

