अवध नारायण मुद्गल

वह महसूस करता है कि वह कुछ है लेकिन क्या है, अभी तक निश्चय नहीं कर सका। उसे लगता है, शायद वह कभी-कभी आदमी होता है, लेकिन हमेशा आदमी नहीं है। फिर हमेशा क्या है? बस यहीं वह उलझ कर रह जाता है और तब उसे ‘कभी-कभी’ पर भी शक होने लगता है। उसे इस बात का दुख नहीं कि साहब उसे गधा समझते हैं और न इस बात का कि दोस्त उसे जोंक या कोई छूत की बीमारी… आखिर वे कुछ समझते तो हैं। उसे सबसे अधिक दुख इस बात का है कि उसकी अपनी बीवी उसे कुछ भी नहीं समझती। हालांकि उसने कई बार समझाने की कोशिश की है कि वह पंडित फलां है, लेकिन वह हर बार या तो हंस पड़ी है या राशन, भाजी आदि बीस किलो वजन बाजार से लाद कर लाने की ‘मोस्ट अर्जेंट’ फाइल थमा कर कुड़कुड़ाती हुई पड़ोस में चली जाती है। और बच्चे? जी हां, चार हैं। कभी-कभी उसके सामने आकर उसे यह एहसास करा जाते हैं कि वे उसी के हैं। जब भी आते हैं- सिमटे, सिकुड़े, कांपते हुए-से, जैसे अभी वह उन्हें खा जाएगा। सच पूछिए तो वह हमेशा बच्चों से स्वयं डरता रहा है। पता नहीं वे उसे क्या कह दें, समझने लगें, क्या समझते हैं, यह जानने की उसने कभी कोशिश नहीं की। बस, इतना विश्वास है कि वे उसे मां की तरह कुछ नहीं समझते और यही उसे संतोष और गर्व का अनुभव कराने के लिए काफी है। वह अपने सामने खड़े ‘सज्जन’ के कंधे पर झुक कर धीरे से पूछा है- ‘क्या आप बता सकते हैं कि आप मुझे क्या समझते हैं?’

वह उन व्यक्तियों को, जो उसे ‘कुछ’ समझते हैं, चुपचाप सज्जन मान लेता है और उसने सामने वाले व्यक्ति को भी ‘सज्जन’ स्वीकार लिया है, क्योंकि सज्जन ने गर्दन को जरा-सा टेढ़ा करके कहा है- ‘अहमक।’ वह जोर से हंस पड़ता है- लाइन में खड़े सभी ‘सज्जन’ उसे आश्चर्य से देखने लगते हैं। वह महसूस करता है- सभी उसे ‘कुछ’ समझ रहे हैं। उसकी अट्ठाईस इंची छाती साढ़े अट्ठाईस इंची हो जाती है। वह और जोर से हंसने लगता है। बस आ गई है। पीछे से धक्का लगता है और आवाजें भी- ‘दिखाई नहीं देता, चढ़िए या हटिए!’ यह धक्कों के सहारे ही बस पर चढ़ा होता है। धक्कों से उसकी रीढ़ दोहरी हो गई है। चेहरा गायब हो गया है। लोग हंसने लगे हैं और उसने सीधे होकर संतोष की सांस ली है। उसका स्टाप आ जाता है। वह उतरता है। स्टाप के सामने ही उसका आफिस है। वह एक गहरी नजर आफिस के गेट पर डालता है। दरबान कहीं चला गया है। वह सोचता है, आज दिन अच्छा गुजरेगा। उसे महसूस होता है, उसका चेहरा जो बस में गायब हो गया था, फिर अपनी जगह पर वापस आ गया है। उसे इतना डर साहब से नहीं लगता, जितना दरबान से लगता है। दरबान रोज सवेरे उससे अपने तीस रुपए का तकाजा करता है, जो उसने दो महीने पहले छह रुपए सैकड़ा के ब्याज पर लिए थे। वह सीधा तन कर अंदर चला जाता है। उसे लगता है, महीनों बाद आज वह सीधा हो पाया है। ‘तुम अक्ल के नाम लट्ठ हो!’ साहब कह रहे हैं कि वह खामोश खड़ा थूक घुटक रहा है। ‘तुम गधे हो!’ और उसे लग रहा है कि वह अभी रेंकने लगेगा, लेकिन आवाज अंदर ही घुमड़ कर रह जाती। ‘न तुम खुद ही कुछ सोच सकते हो और न समझाने पर समझते हो।’ और वह खड़ा सोच रहा है, पता नहीं क्या? अक्सर ऐसा होता है कि वह कुछ सोचता रहता है, लेकिन उसे कभी पता नहीं चलता कि वह क्या सोच रहा है और तब उसे लगता है कि वह कुछ सोच ही नहीं सकता।
उसका ध्यान तब टूटता है, जब फाइल मुंह पर लगती है। उसने सुना ही नहीं कि साहब किस भाषा में दहाड़े हैं। वह दहाड़ का आदी हो गया है, इसलिए किसी तरह की दहाड़ उसे सुनाई नहीं पड़ती। वह फाइल उठाता है और चुपचाप बाहर आ जाता है। बाहर उसके साथी देखते हैं कि उसका चेहरा फिर गायब हो गया है। सभी जानते हैं कि जब भी वह साहब की केबिन से निकलता है, उसका चेहरा गायब रहता है। ऐसे समय खास तौर से कोई उससे बात नहीं करता।

वह चुपचाप अपनी कुर्सी पर जाता है। अनजाने ही कागज की शीट और कार्बन मशीन पर चढ़ जाता है और उसकी अंगुलियां की-बोर्ड पर चलने लगती हैं। उसे पीठ पर हंसी होती है। हाथ रुख जाते हैं। वह गर्दन घुमाता है। दो-तीन साथी उसे कंधे पर हंस रहे हैं। वह धीरे-धीरे पूछता है- ‘आप लोग मुझे क्या समझते हैं?’ उसे अफसोस है कि वह कोई बात जोर से नहीं पूछ पाता। ‘जो तुम टाइप कर रहे हो।’ साथी भी धीरे से ही कहते हैं। वह खुश होता है कि उसके साथ भी जोर से कुछ नहीं कह पाते। फिर वह अपना ‘टाइप’ देखता है- ‘कि मैं अहमक हूं… कि मुझे दिखाई नहीं देता… कि मैं गधा हूं… मैं सोच नहीं सकता… कि समझ नहीं सकता.. कि अक्ल के नाम लट्ठ हूं… मैं आदमी नहीं हूं… आदमी हूं… नहीं हूं… हूं… कुछ नहीं हूं… कुछ हूं… पता नहीं क्या हूं…’ वह हंस पड़ता है और शीट निकाल कर फाड़ देता है। ‘यार, आज खाने का डिब्बा नहीं ला पाया।’ ‘हम भी नहीं लाए।’ ‘… पैसे घर ही भूल आया।’ ‘अपने पास तो हैं ही नहीं… और उम्मीद है, तुम्हारी पत्नी बीमार नहीं होगी।’ ‘ही ही ही ….’ अपनी बीवी को बीमार बना कर वह कई से कुछ न कुछ ले चुका है। ‘लंच’ में वह अक्सर किसी न किसी के साथ ‘शेयर’ करता है। अब कोई किसी भी मन:स्थिति में नहीं है। सभी किसी न किसी जरूरी काम के बहाने खिसकने लगते हैं। सब जानते हैं कि साथ चलने पर कुछ नहीं तो पान ही गले लग जाएगा। वह खड़ा देखता रहा है। कुछ लड़कियां कैंटीन की तरफ जा रही हैं। उसका हाथ कब पेट पर होता हुआ टांगों तक पहुंच जाता है, उसे पता नहीं चलता। वह मन ही मन कोई भद्दी-सी गाली दे डालता है- लड़कियों को, साथियों को अथवा स्वयं को या पता नहीं किसको। फिर अंगड़ाई लेकर बाहर की ओर चल देता है। ‘गेट’ पर दरबान बैठा है। वह दूर से ही लौट आता है और सोचता है, धूप में बाहर घूमना सेहत के लिए बुरी चीज है। लौट कर वह फिर स्वयं को कुर्सी के हवाले कर देता है। उसे लगता है कि कुर्सी कुछ तंग हो गई है। यदि वह बाहर चला जाता, तो शायद यह स्थिति न होती। वह सोचने लगा है कि सेहत के लिए कौन-कौन-सी चीजें बुरी हैं? शायद यह जानने की कोशिश करना कि वह क्या है या लोग उसे क्या समझते हैं।

‘अब तो आप सुनते भी नहीं।’ गेट के बाहर दरबान उसे पकड़ लेता है। उसका चेहरा फिर गायब हो जाता है। उसे महसूस होता है कि उसकी रीढ़ अभी टूट जाएगी, लेकिन वह झुक कर एक खास कोण पर ठहर जाती है। वह देखने की कोशिश करता है, लेकिन कुछ भी देख नहीं पाता। उसे महसूस होता है कि दरबान उसे अपना बेटा समझ रहा है। वह याद करने की कोशिश करता है कि मां ने उसे कुछ नहीं बताया। यदि वह जिंदा होती, तो पूछता। उसके मन में आता है कि कह दे- ‘तुम भी सीधे मां के पास जाओ।’ लेकिन जबान नहीं खुलती। दरबान उसे अल्टीमेटम देकर छोड़ देता है- अगर कल मय ब्याज पैसे नहीं दिए तो वह कपड़े उतरवा लेगा, और तभी याद आता है कि उसकी बीमारी की छुट्टियां बहुत बेकार जा रही हैं… कि उसके पास यही कपड़े हैं और ये इतने खराब हो रहे हैं कि कल नहीं पहने जा सकते- कि किसी से एक दिन के लिए उधार मांग लेता। वह चुपचाप रेंगने लगता है और मुड़-मुड़ कर पीछे देखता जाता है- दरबान को या अपने किसी साथी को, समझ नहीं पाता। वह नुक्कड़ वाले रेस्तरां पर रुक जाता है। कुछ क्षण चारों ओर नजर डालता है और अंदर जाकर एक कोने की कुर्सी पर बर्फ बन जाता है। ‘चालू चाय!’ वह बैरे को सिर पर देख कर बुदबुदाता है और फिर चारों ओर देखने लगता है। इस रेस्तरां में आकर उसे महसूस होता है, इस समय वह आदमी है या आदमी से भी आगे कुछ और… कि उनकी छाती इंचों में नहीं, फुटों में और मीटरों में बढ़ जाती है। बैरा बात-बात में ‘सा’ब’ बोलता है और चलते समय पांच या दस पैसे का सलूट देता है। बैरे के व्यवहार की अच्छाई में रेस्तरां का घटियापन छिप जाता है। देर हो चुकी होती है। अब उसे घर कम और डर ज्यादा सताता है। वह लगभग भागता है। उसे किसी से टकरा जाने की चिंता नहीं रहती, क्योंकि वह देखता नहीं, क्रासिंग पर पुलिस से टोके जाने की चिंता नहीं, क्योंकि वह सुनता नहीं। अचानक मिले रिश्तेदार, परिचित या साथी की चिंता नहीं- कि वह बोलता नहीं। उसे चिंता सिर्फ बीवी का सामना कर पाने की, बच्चों को डर कर कांपता देख पाने की, पेट की, टांगों की या कभी-कभी हाथों पर सधे बोझ की रहती है।

वह भाग रहा है। रेस्तरां की देर में, बस की लाइन की देर नहीं जोड़ना चाहता। हालांकि उसका गणित कभी अच्छा नहीं रहा, फिर भी इतना तो जानता ही है कि किसी चीज में कोई चीज जुड़ने से ज्यादा हो जाती है। उसने विषयों को जातियों से जोड़ कर देखा है- इतिहास- क्षत्रियों के लिए, गणित- बनियों के लिए और लिखाई पंडितों के लिए। चूंकि वह पंडित फलां है इसलिए उसने लिखाई पर अधिक ध्यान दिया है- यह और बात है कि वह हाथों से अपना कुछ नहीं लिखता, मशीन से साहब का कुछ लिखता है। जैसे-जैसे घर नजदीक आता जाता है, उसे महसूस होता है, अब गिरा तब गिरा और चाल धीमी हो जाती है। वह बार-बार सोचता है कि जाते ही बीवी पर दहाड़ेगा। लेकिन जानता है, ऐसा नहीं कर सकेगा, क्योंकि दहाड़ने और दहाड़ महसूसने की शक्तियां उसके पास नहीं है। उसने दूर से ही देख लिया है कि उसके बच्चे पड़ोसी बच्चों के साथ पतंगबाजी कर रहे हैं। अब बच्चों की नजर भी उस पर पड़ गई है एक हलचल-सी मच गई है। उसके बच्चे भाग रहे हैं। उसे लग रहा है कि बच्चे भागते हुए चिल्ला रहे हैं- भेड़िया आया, भेड़िया आया, या भूचाल आया, भूचाल आया, या इसी तरह का कुछ और। ‘खाना लाओ, जोर से भूख लगी है।’ वह कड़क कर रोब से कहना चाहता है लेकिन अवाज रिरिया जाती है, जैसे भीख मांग रहा हो- कुछ खाने को मिल जाए मांजी, भगवान भला करेगा…। कोई जवाब नहीं, सिर्फ सन्नाटा। उसे लगता है, वह श्मशान पर आ गया है- अभी राख के ढेर से प्रेत जगेंगे और उसे खाने दौड़ पड़ेंगे। ‘अरे भाई, खाना तैयार न हो तो एक प्याली चाय ही दे दो।’ वह डरते-डरते फिर पुकारता है जैसे प्रेतों ने गला दबाना शुरू कर दिया हो। ‘आहा, चाय-खाना दे दो। जैसे सब कुछ रख ही गए थे।’ एक धमाके के साथ प्रेत जाग जाता है, ‘बनिए से एक किलो आटा, पाव किलो चीनी और और भाजी वाले से आधा किलो आलू ले आओ। कह देना- पहली को हिसाब चुका देंगे।’ एक चीकट झोला पैरों के पास ऐसा गिरता है, जैसे छत से प्रेत कूदा हो। वह सहम कर दो कदम पीछे हट जाता है। वह झुक कर झोला उठाता है और झुका ही झुका वापस चल देता है। उसका चेहरा फिर गायब हो गया है। पता नहीं फिर वापस आएगा या नहीं।