हेमंत कुमार पारीक
उस बंगले का नंबर पंद्रह है। जब कभी भी वह मदन महल स्टेशन पर उतरता है अचानक उसके कदम बंगले की तरफ मुड़ जाते हैं। हालांकि कोई हक नहीं है उसका फिर भी उसके सामने से गुजरता है। कुछ देर खड़े होकर उसे निहारता है। ऊपर से नीचे तक देखता है। अगल-बगल लंबाई में उसकी नजर जाती है। ऊपर घिसे-घिसाए अंग्रेजी कवेलू दिखते हैं। उन पर जमी हरीकच्च काई नजर आती है। काई की कई परतें जम चुकी हैं कवेलुओं पर। विशालकाय दरवाजों का रंग फीका पड़ गया है और दीवारों से चमड़ी की माफिक चूने की पपड़ियां उधड़ रही हैं। बाउंड्री वॉल सड़क की तरफ झुकी जा रही है और मेन गेट आधा खुला पड़ा रहता है। शायद कोई रहता है अब भी। हमेशा की तरह उस दिन भी वह बंगले के सामने खड़ा था। तभी किसी के खांसने की आवाज सुनाई दी। उसने अनुमान लगाया कि हो न हो कोई बूढ़ी औरत है। वह सड़क के किनारे इत्मीनान से खड़ा हो गया। दरवाजे की धड़ से बूढ़े आम के पेड़ को देखा। उसके तने पर दीमकों की बस्तियां नजर आयीं। कृशकाय था। बूढ़ा भी। वह फल देने लायक नहीं बचा था। पर कहीं-कहीं बौर जरूर दिख रहे थे। शायद वह भी यह जताने की कोशिश कर रहा था कि उस बंगले की तरह बूढ़ा नहीं हुआ है। अभी भी उसमें दम बाकी है। बौर देखकर उसकी आंखें भर आर्इं। उस बंगले से कोई रिश्ता भी नहीं था, फिर क्यों? ..बिना किसी रिश्ते के भी आंसू आ सकते हैं क्या?… अचानक मेन गेट पर लटकी लकड़ी की तख्ती पर उसकी नजर टिक गयी। उसके अक्षर मिट चुके थे। बिलकुल दीवार की तरह उसमें भी सफेद पेंट की पपड़ियां निकल पड़ी थी। दो शब्द ‘ग’ और ‘प’ दिखे। वह खुद बुदबुदाया-गया प्रसाद पाठक! उसे तो मालूम है पर कोई अनजान कैसे जान सकता है कि वह बंगला कलेक्टर गया प्रसाद पाठक का है।
वह दृश्य उसे असहनीय लगा। लगभग काफी अरसे बाद देख रहा था। वह घूम गया। पहले सामने की ओर एक मकान था। अब वहां सिर उठाए एक बिल्डिंग खड़ी थी। पुराने मकान का हुलिया उसकी आंखों के आगे सजीव हो उठा। छोटे से देशी कवेलुओं वाले उस मकान की बंगले के सामने कोई औकात नहीं थी लेकिन फिर भी सामने तो था, तनकर खड़ा था। वहीं छोटे से गेट पर टिक कर खड़ी होती थी इंदुबाला। अब वह गेट भी नहीं है। बड़े-बड़े लोहे के सरियों वाले दरवाजे हैं। गार्ड बैठा था पूरी मुस्तैदी से नीली यूनीफार्म में। सामने एक लंबी सी कार खड़ी थी। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि उससे कुछ पूछे। मगर गार्ड उसे लगातार घूर रहा था। अजनबी था न वह! धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा तो गार्ड से रहा नहीं गया। उठकर बाहर आया और उसकी तरफ मुखातिब हुआ, किसे खोज रहे हैं जनाब ? ‘किसी को नहीं।’ ‘बताइये तो सही, हो सकता है मैं आपकी कोई सहायता कर सकूं?’ वह बोला, ‘पहले यहां एक मकान हुआ करता था?’ ‘मगर वे लोग बेचकर चले गए। अब यह रस्तोगी साहब की बिल्डिंग है’। ‘कहां गए वे लोग, कुछ पता है?’ ‘पता नहीं, मैं तो अभी पांच साल से यहां हूं। पर आप कौन है उनके?’ उसने पूछा। ‘कोई नहीं… पर सामने जो बंगला है उनका दूर का रिश्तेदार…। पहले यहां इंदुबाला रहती थी।’ ‘पता नहीं कब की बात कर रहे हैं आप?’ उसने कोई जवाब नहीं दिया। ‘अच्छा यह बताओ अभी इस बंगले में कोई रहता है?’ ‘हां, एक बूढ़ी औरत है। उसके दो बेटे हैं..। मगर कोर्ट में केस चल रहा है।’ तभी उसे लगा कि उस टूटे हुए गेट पर कोई महिला खड़ी है। बूढ़ी महिला गेट पर लटकी-सी उनके बीच हो रहे वार्तालाप को ध्यान से सुन रही है। गार्ड ने देख लिया था। उस तरफ इशारा कर बोला, अम्मा जी खड़ी हैं, उन्हीं से पूछ लो।’ इतना कहकर वह अपनी जगह लौटने लगा। उसने पलट कर देखा। वह महिला उसे ही ध्यान से देख रही थी। झिझकते हुए उसने पूछा, ‘कौन हो भैया और यहां किसे ढूंढ रहे हो?’ वह खुद बड़बड़ाया, लेना एक न देना दो। फालतू खड़ा हुआ। अब महिला के कई सवालों के जवाब देने पड़ेंगे उसे।
सड़क के इस तरफ आ गया वह। महिला से मुखातिब हुआ। ‘अम्माजी, पहले यहां गया प्रसाद..?’ उसका सवाल पूरा ही नहीं हुआ था कि वह बीच में ही बोली, ‘अब नहीं है।’ ‘और उनका लड़का रोहन?’ ‘वे भी नहीं है अब इस दुनिया में..।’ ‘आप कौन हैं?’ ‘मैं रागिनी…।’ ‘उनकी कौन?’ उसने गले का थूक गटका। उल्टे उससे ही पूछ लिया, आप ही बतालाइये आप उनके कौन लगते हैं?’ ‘उनका एक शुभचिंतक।… मित्र समझ लीजिए।’ ‘तो फिर अंदर आइये।’ वह कसमकस में था। अंदर जाए या न जाए। बंगले की हालत देख उसने अनुमान लगा लिया था कि अंदर क्या हो सकता है। हो सकता है बैठने को एकाध कुर्सी भी न हो। फिर भी वह अंदर जाने को तैयार था। वहां से भाग नहीं सकता था। धीरे-धीरे चलते हुए वह अंदर दाखिल हुआ। जैसा उसने अनुमान लगाया था ठीक वैसा ही था वहां सब। कलेक्टर साहब के उस बंगले का पुराना वैभव याद आने लगा उसे। समय किसी को भी नहीं छोड़ता चाहे जानदार हो या बेजान! पहले उस इलाके में मात्र वही एक बंगला था। बाकी यहां-वहां विदेशी कवेलुओं वाले छोटे-छोटे बहुत से मकान थे। पूरे इलाके में बंगले की चर्चा होती थी। कलेक्टर साहब के बंगले से दूसरे घरों की पहचान बताते थे लोग और इंदुबाला को तो सभी जानते थे। वजह थी रोहन, कलेक्टर साहब का एकलौता वारिस! कलेक्टर माने किसी राजे-रजवाड़े का मुखिया। स्टेशन के पास चायवाला बनवारी तक मुसाफिर को बंगला दिखाने चला आता था। शायद इसलिए कि कभी कलेक्टर साहब की नजर उस पर भी मेहरबान हो जाए। जब वह मदनमहल स्टेशन से चला था तो उसकी नजरें बनवारी के चाय के ठेले को ही ढूंढ रही थीं। उस जगह आटो स्टैंड बन गया है। बनवारी पता नहीं कहां चला गया। वरना स्टेशन से निकलते समय वह उसके ठेले पर चाय पीता था। स्टेशन और मोहल्ले का नक्शा बदल गया पर कलेक्टर साहब के बंगले की ज्यामिती नहीं बदली। बिल्कुल वैसी की वैसी है। सोचते हुए वह अंदर दाखिल हुआ। महिला आगे-आगे थी। एक पुराने आलीशान सोफे की तरफ इशारा कर बोली, बैठिए!’ उसने देखा सोफे की लकड़ी दुरूस्त थी पर बेरंग हो चुका था। जगह-जगह से तार-तार हो गया था। अंदर के स्प्रिंग ऊपर साफ-साफ दिख रहे थे। कहीं-कहीं कपड़े पर उसके इम्प्रेशन भी थे और कहीं नारियल की बूछें बाहर दिख रही थीं। ‘बैठिए!’ उसने दोबारा आग्रह किया। मरता क्या न करता। झिझकते हुए वह सोफे पर पसर गया। उसने अंदर आवाज दी, ‘मुन्ना, दो कप चाय बना ला।’ उस माहौल को देख उसने चाय की शक्ल का अनुमान लगा लिया था। बोला, ‘रहने दें। अभी स्टेशन से पीकर चला आ रहा हूं।’ सांसें फूल रही थीं उसकी फिर भी वह मुस्कुराई। गाल पर हड्डियों का उभार दिखने लगा था। उसकी मुस्कुराहट में मानो रोड़ा था। समय के मान से वह मुस्कुराहट फीकी थी। ‘पहली बार आए हैं आप, बिना चाय-पानी के कैसे जा सकते है? खाने को कहती पर..?’ वह बोला, ‘तकल्लुफ मत करिए। मैं तो यूं ही पुरानी यादें ताजा करने चला आया। बाई-द-वे आप कलेक्टर साहब की कौन हैं?’ वह फिर हंसी। हंसी में खालिस मिलावट थी। ‘बहू… पर मुझे इस हाल में देखकर आपको विश्वास नहीं होगा।’ वह बोला, इंदुबाला को जानती हैं आप?’ ‘यहीं आकर पता चला कि मेरे पति की प्रेमिका थी।’ ‘मगर आप… ?’ ‘कहा न, उनकी पत्नी! पर लोग मानते नहीं इसलिए केप्ट! लोगों की नजरों में नाजायज बीवी! आपके मानने और नहीं मानने से क्या होता है? दुनिया जो कहे वही सच होता है। इसलिए बाहर नहीं निकलती।’ ‘और इंदुबाला?’… उसने फिर वही सवाल दोहराया। वह रूकी। अचानक गले में थूक अटक गया था। खांसने लगी। तो तब तक अंदर से एक व्यक्ति चाय ले आया था।
उसने टेबल पर चाय के दो कप रख दिए बोला, बाई, बिस्कुट खत्म हो गए हैं।’ उसने कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि उसकी तरफ इशारा कर बोली, ये मेरा छोटा बेटा है मुन्ना।’ ‘यानि रोहन का?’… उसने सामने लटकी रोहन की तस्वीर को देखा और बोली, नहीं!’ वह आश्चर्य से उसे देखने लगा। एक बार उस लड़के को देखा। रोहन का चेहरा जेहन में उतर आया। मिलान करने लगा। कहीं से वह रोहन के फ्रेम में फिट नहीं बैठ रहा था। उसने उसके चेहरे पर उतरते-चढ़ते भावों को पढ़ा और बोली, मैं विधवा हूं। जब रोहन सर्विस में थे तब उनके घर काम करने जाया करती थी। आपको शायद पता नहीं, उन्होंने शादी नहीं की थी।’ ‘मगर इंदुबाला?’ ‘पता नहीं।… शायद मेरी तरह बूढ़ी होगी या मर खप गई होगी। इनकी प्रेमिका थी। सामने मकान में रहती थी। स्कूल के दिनों से साथ पढ़े थे…।’ वह बोलते-बोलते रूकी विषय बदलते हुए बोली, ‘चाय लीजिए’। अनिच्छा से उसने कप उठाया और मुंह से लगा लिया। ‘इंदुबाला की स्टोरी तो मुझे पता है। पर उसके बाद पता नहीं चला।’ उसने तकिए के नीचे से एक डायरी निकाली, एक फोटो निकाला और उसके सामने रखते हुए बोली, इसमें सब लिखा है।…. वे इंदुबाला से शादी करना चाहते थे पर जाति की दीवार बीच में आ गई। हालांकि वह भी ब्राह्मण थी। आपको तो पता ही होगा ब्राह्मणों में भी जातियां होती हैं। ऊंच-नीच थी उस समय। और दूसरी बात बंगला था कलेक्टर साहब का और इंदुबाला उनके बंगले और मकान का अंतर बड़ा होता है। बेटा बोला, पिताजी मैं इंदुबाला से शादी करना चाहता हूं तो पिता का पेट खौलने लगा । इकलौता बेटा था! सोचने लगे कि धूमधाम से शादी करूंगा। कुल वधु लाऊंगा। लेकिन फच्चर लग गया। इसलिए कलेक्टरी वाला दांव चल दिया बाप ने बेटे पर। वादा किया और विदेश भेज दिया पढ़ने। और बाबू के साथ खिचड़ी पकाई। डर दिखाया। धमकी दी। शादी का पूरा खर्च उठा इंदुबाला को किसी और के गले मढ़ दिया।’… एक बार फिर उसने रोहन की फोटो को देखा और बोली, बेटा भी कम नहीं था। आखिर बाप से दस कदम आगे।… विदेश से लौटते ही फैल गया। बाप ने तरह-तरह के जाल बिछाए, प्रलोभन दिए पर पंछी तो उड़ने लगा था। उसे वे दाने अच्छे नहीं लगे। लेकिन कितना उड़ता आखिर… थक-हार कर एक डाल पर बैठ गया…। वही डाल हूं मैं!’ वह फिर रुकी, आपने चाय नहीं ली? शायद अच्छी नहीं लगी या सुनकर मुंह कसैला हो गया?… अब मेरे पास तो सिवाय इस बंगले के और कुछ नहीं है। सालों साल उनकी सेवा का इनाम है। और शायद आपको पता नहीं इस पर भी जालिमों की नजरें गड़ी हैं। इंतजार कर रहे हैं मेरे मरने का..। केप्ट हूं ना। कानूनन उनकी धर्मपत्नी नहीं हूं मगर यह डायरी और इसमें रखे खत ही पत्नी होने का प्रमाण हैं। बस इन्हीं के भरोसे लड़ रही हूं। जब कभी घर के बाहर निकलती हूं तो दुनिया वालों की नजरों से डर लगता है। कैसे-कैसे देखते हैं लोग इस बूढ़ी काया को..।
फिर भी एक बात समझ नहीं आई कि आप जो भी हैं, कलेक्टर साहब से आपका कोई न कोई रिश्ता तो होगा ही, वरना इस बंगले के आसपास आप इस तरह क्यों कर घूमते? आपकी तरह ही उनके कई रिश्तेदार आ चुके हैं यहां। बंगले की परिक्रमा करते दिखते हैं। उनमें से एक ने तो कोर्ट में अपना हक ही जता दिया है।’ वह बोला, रिश्तेदार तो जरूर हूं पर बहुत दूर का। मेरा कहीं से कहीं तक इस बंगले पर कोई हक नहीं बनता। मुझे तो इंदुबाला और रोहन के प्रेम प्रसंग में दिलचस्पी थी। उस आदमी से मतलब था जिसने मजनू की तरह इंदुबाला से प्यार किया था पर लैला किन परिस्थितियों की शिकार हुई यह नहीं मालूम। सुना है कि रोहन अपने पिता से अंतिम समय भी मिलने नहीं आया।’ ‘हां, सच है। मगर वो पिता भी क्या जो अपनी संतान की न सुने। उसे गुलाम समझे।’ उसकी आंखों के सामने मुस्कुराती इंदुबाला आ खड़ी हुई। रोहन खड़ा था, बंगला और कलेक्टर साहब की गरजती आवाज थी। वह पेन उसके जेहन में आ गया था जो रोहन ने उसे एक बार भेंट में दिया था। ऑफ व्हाइट रंग का था। जिससे उसने पहली कहानी लिखी थी।
वह उठने लगा। उठते-उठते बोला, बड़ी दर्दनाक कहानी है। कहानी के इस प्लाट में आप तो कहीं नहीं थीं। फिर अचानक कहां से आ गयीं?… दरअसल जीवन ही एक पहेली जैसा है। हमें आने वाली घटनाओं का बिल्कुल पता नहीं होता कि अगले कदम पर कौन-सा सीन बनना है। कहां, कब, कौन मिलेगा और उससे हमारा क्या रिश्ता होगा?’… उसे फिर खांसी आने लगी थी। ठसका लगा। सांस फूलने लगी थी। उसका बेटा पीठ सहलाने लगा। वह वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया। इंतजार में था कि सहज हो जाए तो उससे विदा ले। बेटे ने पानी का गिलास उसके मुंह से लगाया। थोड़ा सुस्ताने लगी वह। सामान्य हुई और खड़ी हो गई। वह बाहर की तरफ निकला तो वह भी पीछे-पीछे चल पड़ी। गेट तक छोड़ने आई और जाते-जाते उससे बोली, इस कहानी में आज का यथार्थ मैं हूं और यह बंगला नंबर पंद्रह! अब चाहे कोई मुझे रोहन की पत्नी कहे या केप्ट फर्क नहीं पड़ता।

