नीरजा हेमेंद्र

सर्दियों की ठिठुरन भरी ऋतु विदा ले रही थी। मौसम में हल्की-हल्की खुमारी उतरने लगी थी। एक ओर वृक्षों से पत्ते टूट रहे थे, तो दूसरी ओर निपात टहनियों से नई धानी कोंपले झांकने लगी थीं। ऋतु परिवर्तन के साथ यह समय सृष्टि में परिवर्तन का समय भी होता है। सृष्टि में परिवर्तन के साथ पशु-पक्षी, मनुष्यों आदि की मनोवृत्तियों में भी परिवर्तन होता है। ठंड और कोहरे से धुंआ-धुंआ होती सृष्टि पर सर्वत्र राग-रंग का सृजन होता दिखाई देने लगता है। परीक्षाएं प्रारंभ होने वाली थीं। कॉलेज में विद्यार्थियों की चहल-पहल प्रतिदिन की भांति थी। मेरी क्लास सुबह साढ़े दस बजे से प्रारंभ होती। मैं दस बजे तक कॉलेज पहुंच जाती। आज भी लगभग दस बजे मैं कॉलेज के अंदर थी। पार्किंग में स्कूटी खड़ी कर, आवश्यक सामान डायरी, पुस्तक हाथ में पकड़ा तथा पर्स को कंधे पर लटका कर मैं आगे बढ़ने लगी। कॉलेज में लड़के-लड़कियों के हंसी-ठहाकों के स्वर गूंज रहे थे। आज कॉलेज में चहल-पहल कुछ अधिक दिख रही थी। सहसा मुझे ध्यान आया कि आज चौदह फरवरी है। वैलेंटाइन डे। प्रेम प्रकट करने का विशेष दिन। कॉलेज के लड़के-लड़कियों के लिए तो यह दिन अतिविशिष्ट दिन हो जाता है। युवा ऊर्जा, उत्साह और उमंगों से भरे उनके हृदय में एक स्वप्न जागृत कराता, सपनों में पंख लगाता यह विशेष दिन। युवा वर्ग का पर्व है। इसी कारण आज कॉलेज में चहल-पहल, लड़के-लड़कियों की विशेष साज-सज्जा है और पढ़ाई कम, वैलेंटाइन मनाने का मूड अधिक है।
इस माहौल में अचानक मुझे अपनी मित्र रिया की याद हो आई। रिया मेरे साथ इंटरमीडिएट में थी। फिर हम दोनों का दाखिला एक ही कॉलेज में हो गया था। गे्रजुएशन में मेरे और रिया के विषय भी एक थे। इसलिए कॉलेज में हमारा अधिकतर समय साथ बीतता। उस दिन लगभग दो बजे हमारी क्लासेज समाप्त हुर्इं। हम घर जाने के लिए निकल पड़े थे।
‘गे्रजुएशन के बाद आगे का क्या प्रोग्राम है श्यांती?’ रिया ने मुझसे वही प्रश्न पुन: पूछा, जो कई बार पहले भी पूछ चुकी थी।
‘मैं तो आगे और पढ़ना चाहती हूं।’ मैंने कहा। ‘और तुम क्या करोगी?’ रिया से जानना चाहा।
‘नौकरी की तलाश… और क्या?’ रिया ने कहा।

‘आज के समय में जहां अच्छी शिक्षा के बावजूद नौकरी मिलना मुश्किल है वहां मात्र ग्रेजुएशन कर लेने से नौकरी कहां मिलने वाली है?’ मैंने शंका व्यक्त करते हुए कहा।
देखते-देखते एक वर्ष और बीत गया। हमारा ग्रेजुएशन पूरा हो गया था। मैं आगे पढ़ना चाहती थी। स्नातकोत्तर में मुझे प्रवेश मिल गया। रिया नौकरी करना चाहती थी। इसलिए उसने कॉलेज आना छोड़ दिया तथा नौकरी की तलाश करने लगी। हमारी मित्रता यथावत् बनी हुई थी। फोन पर एक-दूसरे के संपर्क में हम थे। समय निकाल कर कभी-कभी मिलते भी। एक दिन रिया का फोन आया कि उसे किसी सरकारी कॉलेज में कंप्यूटर शिक्षक की नौकरी मिल गई है। नौकरी अभी अस्थायी थी। रिया बहुत खुश लग रही थी। किसी दिन अवकाश मिलने पर उसने मुझसे मिलने की इच्छा प्रकट की।
एक दिन जब रिया के कॉलेज में अवकाश था, हमने एक मॉल में मिलने का निर्णय किया। रिया खूब आकर्षक लग रही थी। उसे नौकरी करते हुए डेढ़ माह हो गए थे।
‘आत्मनिर्भरता की चमक चेहरे पर दिख रही है।’ मैंने उससे कहा।
‘कहां…?’ उसने सकुचाते हुए कहा।
‘आत्मविश्वास के रूप में तुम्हारे चेहरे पर।’
‘ऐसा कुछ नहीं है।’ रिया ने धीरे से कहा।

रिया अपनी नौकरी के बारे में बता रही थी- ‘हालांकि यह नौकरी अस्थायी है, पर इसके स्थायी हो जाने की संभावना है। इसीलिए इतनी कम सैलरी में यह नौकरी कर रही हूं।’ मैं रिया की बातें सुन रही थी। रिया सचमुच खुश लग रही थी।
‘मेरे साथ एक लड़के संजीव की पोस्टिंग भी अस्थायी रूप से उसी कॉलेज में हुई है, खेल शिक्षक के रूप में।’ रिया बता रही थी। उसकी बातें सुन कर मैं मुस्करा रही थी। रिया की सफलता मुझे अच्छी लग रही थी।
‘अच्छा है रिया। सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलना अब उतना सरल नहीं रहा। तुम मन लगा कर नौकरी करो।’ मैंने रिया से कहा।
लगभग पंद्रह दिनों बाद हम फिर मिले। मैंने गौर किया कि इस बार रिया ने कुछ मेकअप भी किया है। स्टाइल से बंधे बाल, आंखों में मस्कारा, ओठों पर नैचुरल शाइनिंग वाली लिपिस्टक तथा ब्रांडेड जीन्स-शर्ट।
‘वाह! क्या बात है!’ मैंने कहा,तो वह मुस्करा पड़ी। बोली कुछ भी नहीं।

अब रिया जब भी मुझसे मिलती, हर बार उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन दिखाई देता। कभी हेयरस्टाईल अलग, तो कभी आकर्षक लगने के लिए मेकअप में नया प्रयोग। रिया के जाने के बाद मैं सोचती कि मैं तो अभी विद्यार्थी हूं, मुझमें यह परिवर्तन क्यों नहीं? फिर खुद ही उत्तर देती कि शायद वह नौकरी करने लगी है, इसलिए ऐसा है। जल्दी ही इस रहस्य से पर्दा उठ गया। एक दिन रिया ने बताया कि वह अपने साथ काम करने वाले उस लड़के संजीव को पसंद करती है। वह भी उसे पसंद करता है। मैं समझ गई कि रिया में यह परिवर्तन प्रेम के इसी खूबसूरत एहसास के कारण आया है।
‘तो आगे क्या इरादा है? पता कर लिया, कहीं वह विवाहित तो नहीं?’ मैंने परिहास करते हुए कहा।
‘नहीं, वह अविवाहित है। उम्र में मुझसे दो वर्ष ही तो बड़ा है।’
‘तो आगे क्या करना है, कुछ सोचा है?’

‘कुछ समझ में नहीं आ रहा है, आगे क्या है?’ रिया के चेहरे पर संशय के भाव थे। मैं समझ नहीं पा रही थी कि रिया किन दुविधाओं में घिरी है और क्यों?
समय अपनी गति से आगे बढ़ता जा रहा था। उस समय मैं स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष में थी। रिया को भी नौकरी करते लगभग दोे वर्ष हो चुके थे। इस बीच रिया और संजीव और समीप आ चुके थे। मैं रिया के प्रेम के प्रति आशंकित भी थी कि कहीं यह युवावस्था का महज शारीरिक या भावनात्मक आकर्षण तो नहीं है? उनके प्रेम की गंभीरता और गहराई के प्रति मैं सशंकित थी। रिया प्रसन्न थी और दिनोंदिन निखरती जा रही थी। वह मिलती, संजीव के बारे में बातें करती। उसके साथ कौन-सी मूवी देखी, कहां-कहां घूमी आदि। आजकल ये सब बातें सामान्य हैं। पर वे दोनों एक ही कॉलेज में शिक्षक हैं और नौकरी भी अस्थायी है। कॉलेज में किसी को भनक लग गई, तो बात फैल जाएगी। दोनों का नौकरी करना कठिन हो जाएगा। पर बात वही पुरानी कि प्रेम अंधा होता है। तो दोनों रुकने वाले नहीं थे।
मेरा स्नातकोत्तर पूरा हो गया था। मैं शोध करने की तैयारी करने लगी थी। मुझे इसी शहर के विश्वविद्यालय से शोध का विषय मिल गया था। मेरा अधिकतर समय पुस्तकालय में पुस्तकें ढूंढ़ने, पढ़ने आदि में व्यतीत हो जाता। घर में मेरे विवाह की बातें होने लगी थीं। मैंने घर वालों को शोध पूरा कर लेने तक रुकने को कहा था।
आज बहुत दिनों बाद रिया से मिलना हो पा रहा था। इस बार वह मुझे कुछ उदास-सी लगी। पूछने पर उसने बताया कि संजीव उससे आजकल नाराज चल रहा है।
‘क्यों… क्या हुआ…?’ मैंने जानना चाहा। जमीन की ओर देख कर वह अपने पैरों के नाखून से जमीन कुरेदने लगी।
‘संजीव क्यों नाराज है तुमसे?’ मैंने पूछा। वह रुआंसी हो गई- ‘संजीव के घर वाले उसके लिए लड़की देख रहे हैं।’
‘यह बात किसने कही?’
‘खुद संजीव ने।’

रिया की बात सुन कर मैं स्तब्ध थी। उसके चेहरे पर फैली निराशा को बखूबी समझ पा रही थी। पर इस समय रिया से क्या कहूं? कैसे उसे ढाढ़स बधाऊं, समझ नहीं पा रही थी।
‘तुम उससे पूछ सकती हो कि अगर तुम्हारा विवाह कहीं और तय होने वाला है तो मेरे साथ क्या था…? मेरे प्रति अपना प्रेम क्यों व्यक्त करते थे?’ रिया से मैं किसी प्रकार इतना ही कह पाई।
‘कहा था। मैंने उससे पूछा था कि मेरे साथ तुम्हारे प्रेम का क्या हुआ? उसने कहा कि प्रेम तो मैं तुमसे ही करता हूं, पर विवाह अपने घर वालों की इच्छा से करना पड़ेगा।… मैंने कहा कि तुमने मुझे धोखा दिया है। तो उसने कहा कि नहीं, मैंने तुमसे विवाह का कोई वादा नहीं किया था।’ रिया की बातें सुन कर संजीव के लिए मेरे भीतर घृणा उत्पन्न हो रही थी।
फिर मिलने का वादा कर रिया चली गई। कुछ दिनों बाद रिया का फोन आया। उसने बताया कि घर में उसके विवाह की बात चल रही है। उसने सहमति दे दी है। मैंने सोचा, रिया ने ठीक ही किया। आखिर किसी धोखेबाज के पीछे समय बर्बाद क्यों करना?
मेरा शोध कार्य पूरा हो गया था। मैं नौकरी की तलाश में थी। किसी उच्च शिक्षण संस्थान में पढ़ाना मेरा स्वप्न था। संयोग से एक डिग्री कॉलेज में शिक्षक के लिए कुछ रिक्तियां निकली थीं। वह कॉलेज मेरे शहर कुछ से दूर एक छोटे-से शहर में था। मैं मैंने आवेदन किया और मेरा चयन हो गया। मेरे कॉलेज आने-जाने की आपाधापी शुरू हो गई थी और घर में मेरे विवाह की चर्चा। मैं अपना लक्ष्य पाकर काफी खुश थी। व्यस्तता भरे छह महीने देखते ही देखते बीत गए। एक दिन रिया का फोन आया कि संजीव का विवाह हो गया है। मुझे ऐसा लग रहा था कि बातें करते-करते रिया अभी रो पड़ेगी। ‘मेरी भावनाओं से खेल कर उसने विवाह कर लिया है। कॉलेज में भी अब वह मुझसे खिंचा-खिंचा रहता है, मानों गलत वह नहीं, मैं हूं। संजीव के साथ पुरानी बातें विस्मृत कर अब मैं उसके साथ अपना रिश्ता सामान्य करना चाहती हूं, क्योंकि हम एक साथ काम करते हैं। मैं समझती हूं कि मनमुटाव रखना ठीक नहीं है, पर संजीव मेरी अनदेखी करता है।’
मैंने रिया को समझाया कि अब पुरानी बातों को छोड़ कर तुम सामान्य रहने का प्रयत्न करो। ठीक है कह कर रिया ने फोन रख दिया।

फोन पर मेरी और रिया की बातें होती रहतीं। लगभग दो माह बाद वह मुझसे मिली। उसने बताया कि उसका विवाह तय हो गया है। सुन कर मुझे अच्छा लगा। इस बीच उसने संजीव से हुई अपनी कुछ बातें बतार्इं, जिसे सुन कर वेलेंटाइन और उसे मनाने वाले युवा संजीव के बारे में मेरी धारणा बदलती जा रही है। रिया ने बताया-
‘क्यों न हम पहले की तरह मित्र बनकर रहें। हमारी मित्रता पहले की तरह चलती रहे।’ एक दिन कॉलेज में उसे अकेले देख संजीव ने कहा। रिया अचंभित थी कि विवाह के बाद जो संजीव उसे देख कर अपरिचित बन जाया करता था, वह आज कई महीनों बाद एकांत में कैसी-कैसी बातें कर रहा है। उसकी बातों में छल स्पष्ट था। रिया ने कोई उत्तर नहीं दिया और वहां से चली आई। संजीव को रिया के विवाह की बात पता चल चुकी थी।
रिया अपने विवाह की तैयारियों में व्यस्त रहती। सभी तैयारियां पूरी हो गई थीं। विवाह की तिथि समीप आ गई। उस दिन वह अपने विवाह का निमंत्रण-पत्र कॉलेज के स्टाफ को दे रही थी। एक कार्ड उसने संजीव की ओर बढ़ाया ही था कि उसने उससे बात करने की इच्छा प्रकट की। बताओ, क्या कहना चाहते हो? रिया ने कहा। उसने कहीं और मिल कर बात करने की इच्छा प्रकट की। मैं तुमसे कहीं और नहीं मिल सकती। तुम्हें जो कुछ कहना है, यहीं कहना होगा। रिया ने कहा। ठीक है, आधे घंटे बाद मैं यहीं आता हूं। कह कर संजीव चला गया। रिया सोचती रही कि आधे घंटे बाद तो स्टाफ रूम प्राय: खाली हो जाता है। सभी अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते हैं। फिर भी आधे घंटे बाद रिया स्टाफ रूम में गई। संजीव वहां पहले से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
‘बताओ क्या कहना चाहते हो?’ उसने संजीव से कहा।
‘तुम मुझसे प्रेम करती हो या नहीं…?’ उसने कहा।
‘यह कैसा प्रश्न है? यह समय है यह प्रश्न करने का?’ उसने सख्त होते हुए कहा।
‘मेरी बात का उत्तर दो। मैं तुमसे अब भी प्रेम करता हूं।’ संजीव ने रिया की बात को अनसुना करते हुए कहा। .

‘तुमने मुझे अब तक बेवकूफ बनाया है और अब भी बना रहे हो। प्रेम मुझसे और विवाह किसी और से? यह कैसा प्रेम…?’ रिया ने बिफरते हुए कहा।
‘यह किसने कहा है कि जिससे प्रेम करो उसी से विवाह करो। प्रेम जिससे किया जाए, आवश्यक नहीं कि वह पत्नी ही हो। मैं तुमसे प्रेम करता हूं।’ संजीव के शब्द पिघलते हुए गरम शीशे की भांति रिया के कानों में घुस रहे थे।
‘तो वो जो तुम्हारे घर में है, वो कौन है? क्या तुम उससे प्रेम नहीं करते?’
‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं और चाहता हूं कि तुम यह विवाह न करो।’ कुछ क्षण चुप रहने के बाद रिया की आंखों में आंखें डाल कर देखते हुए संजीव ने कहा।
‘मैं क्या तुम्हारी रखैल बन कर रहूंगी?’ रिया जो अब तक संजीव की अनर्गल बातों पर भी चुप रह जाती थी, आज उसका मौन मुखर हो गया था।
‘नहीं, ऐसी बात नहीं है।’ संजीव ने हड़बडाते हुए कहा।

‘तो क्या वह रखैल बन कर रहेगी, जो तुम्हारे घर में है।’ संजीव रिया को देखता रह गया।
‘तुम लोगों ने औरतों को खेलने और भोगने की वस्तु समझ रखा है।’ रिया बोलती जा रही थी।
‘नहीं, अब तो कोर्ट ने भी कह दिया है कि पत्नी के साथ एक ही घर में प्रेमिका भी रह सकती है।’ संजीव ने मुस्कराते हुए कहा। मानो उसके हाथ कोई बहुत बड़ा तीर लग गया हो। रिया को उसकी मुस्कान में धूर्तता स्पष्ट दिख रही थी।
‘यह बात थी तो मुझे अपनी पत्नी बना लेते और अपनी पत्नी को प्रेमिका।’ कहने को तो रिया कह गई, पर तत्काल उसे ध्यान आया कि इसमें भी किसी न किसी औरत की हार है और संजीव जैसे पुरुषों की जीत। फिर बोली, ‘मुझे खुद पर लज्जा आती है कि कुछ दिनों तक मैं तुम्हारे समीप रही, अपना निश्छल प्रेम समर्पित किया। मुझे तुम्हारी पत्नी बन कर भी स्वंय पर लज्जा ही आती। अच्छा हुआ कि तुमने मेरे सामने विवाह का प्रस्ताव नहीं रखा। एक और औरत शोषित होेने से बच गई।’ रिया वहां से जाने को तत्पर हुई। ‘अब मुझसे तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं रहा। यह रिश्ता उस दिन समाप्त नहीं हुआ, जिस दिन तुमने विवाह किया था, बल्कि आज समाप्त हुआ है। तुम्हें मेरे विवाह में आने की आवश्यकता नहीं है।’ जाते-जाते रिया ने सख्त लहजे में कहा।
‘तुम मेरी वेलेंटाइन हो रिया।’ जाते-जाते संजीव ने रिया को फंसाने का अंतिम अस्त्र प्रयोग करते हुए कहा।

‘नहीं, वेलेंटाइन का अर्थ स्त्रियों का शोषण नहीं है। वह जो तुम्हारे घर में है वो तुम्हारी वेलेंटाइन नहीं है क्या…? मन बहलाने के लिए कोई और ढूंढ़ो।’ कह कर रिया तेजी से वहां से चली गई।
जाते-जाते वह सोच रही थी कि प्रेम का प्रतीक बन चुके वेलेंटाइन की हवाओं में शुचिता के स्थान पर ये कैसी विषैली हवाएं घुल गई हैं। रिया का मुंह कसैला हो रहा था। अपने विवाह का निमंत्रण पत्र थामे वह शीघ्रता से आगे बढ़ गई। उसे अपने विवाह की तैयारियों से संबंधित बहुत सारे काम करने थे।
उसके बाद से मैं अब तक वेलेंटाइन का अर्थ ढूंढ़ रही हूं।