कविता: चुआ चुआ कर खाई
रावेंद्र कुमार रवि
मस्त हवा के
झोंके ने जब
कस कर डाल हिलाई!
हलकी हुई डाल,
झट उसने
अमिया एक चुआई!

लल्ली ने वह
झट से लपकी,
बोली – ‘खा लो, भाई!’
लल्ला ने फिर
चूस-चूस कर
चुआ-चुआ कर खाई!
शब्द-भेद
कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।
ढेला / धेला
पत्थर या मिट्टी के छोटे टुकड़े को ढेला कहते हैं। बच्चे ढेला मार कर आम तोड़ते ही हैं। मगर धेला रुपए के आधा यानी अठन्नी को कहते हैं। लोग अक्सर बोल देते हैं- काम धेले का नहीं हुआ या धेले की कमाई नहीं हुई।

डली / डाली

किसी चीज के छोटे हिस्से को डली कहते हैं। वैसे यह मिश्री या गुड़ के अर्थ में अधिक प्रयोग होती है- मिश्री की डली, गुड़ की डली। जबकि डाली पेड़ की शाखा को कहते हैं, जिसमें से टहनियां फूटती हैं। बंदर पेड़ की डाली पर कूदते फिरते हैं।

