कुंदन कुमार

महिलाओं के बारे में माना जाता है कि वे उन कार्यों को पूरा करने में सक्षम हैं, जो पुरुष नहीं कर सकते। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति की अवधारणा अनंत काल से मौजूद रही है। भारत में नारी शक्ति के रूप में दुर्गा, काली, महिषासुर मर्दिनी और भगवती की पूजा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि प्राचीन काल में नारी शक्ति की प्रतिमूर्ति मानी जाती थी। महिलाओं के सम्मान में मनुस्मृति में लिखा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता:।’ यानी जहां महिलाओं की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। हालांकि, पश्चिमी विचारकों का दृष्टिकोण महिलाओं के प्रति संकुचित नजर आता है। अरस्तू ने महिलाओं की तुलना दासों से की है और उन्हें पुरुषों का गुलाम तक बताया है।

हालांकि, भारत में भी विदेशी आक्रमणकारियों के कारण समाज में महिलाओं की स्थिति बद से बदतर होती गई। शक्ति की प्रतिमूर्ति दुर्गास्वरूपा नारी घर की चारदिवारी तक सिमट कर रहने को मजबूर हो गई। परदा प्रथा, सती प्रथा, देवदासी प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों ने रिवाज का रूप धारण कर महिलाओं का जीवन दूभर कर दिया। घर और घर के बाहर महिलाएं हिंसा और यौन उत्पीड़न का शिकार होने लगीं। महिलाओं का घर के निर्णय में सहभागिता की बात तो दूर, खुद वे अपने व्यक्तिगत जीवन से संबंधित निर्णय लेने को भी स्वतंत्र नहीं थीं। स्थिति यहां तक बदतर हो गई थी कि महिलाओं को उपभोग की वस्तु समझा जाने लगा। राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद विद्यासागर, ज्योतिबा फुले और महात्मा गांधी ने महिला अधिकारों के लिए संघर्ष किया। राजा राममोहन राय के भगीरथ प्रयास से सती प्रथा जैसे अमानवीय परंपरा का अंत कानून बना कर 1829 ई. में किया गया। ज्योतिबा फुले ने महिलाओं के लिए प्रथम विद्यालय की स्थापना तब की जब महिलाओं को पढ़ने से जबरन रोका जाता था।

हालांकि अब स्थिति काफी हद तक बदल चुकी है। फिर भी आज भी महिलाओं को मंदिरों और मस्जिदों में प्रवेश के लिए उच्चतम न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। सबरीमला में महिलाओं को प्रवेश का अधिकार इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। हालांकि पितृसत्तात्मक समाज को यह बात नागवार गुजरी और एक बार फिर परंपरा और नियमों का हवाला देकर उन्होंने सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश के उच्चतम न्यायालय के फैसले का विरोध किया और सड़क से संसद तक महिलाओं के प्रवेश का जम कर विरोध किया। हालांकि कुछ बातों को दरकिनार कर दिया जाए तो स्थिति काफी हद तक सुधरी है, पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इक्कीसवीं शताब्दी में महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव किया जाता है। आज भी महिलाएं घरेलू शोषण और उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमेन से भी उजागर हो चुका है कि भारत में दस में से छह पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी के साथ हिंसक व्यवहार किया है।

हालांकि हाल के वर्षों में महिलाओं के जीवन में महत्त्वपूर्ण बदलाव हुआ है। बड़े शहरों की महिलाएं अब अपनी क्षमता और उपयोगिता को महसूस कर रही हैं। घर और कार्य स्थल पर लैंगिक समानता और न्याय की बात कर रही हैं। महिलाओं ने तकरीबन हर क्षेत्र में बाधाओं को दूर किया है। चाहे तकनीकी क्षेत्र हो या अंतरिक्ष विज्ञान, खेल या सेना, सभी जगह महिलाएं अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय के अनुसार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में हर पांचवी महिला उद्यमी है। एक तिहाई सर्टिफाइड इंजीनियर महिलाएं हैं। प्राथमिक स्तर पर तीन चौथाई से ज्यादा स्वास्थ्यकर्मी भी महिलाएं ही हैं। एक अनुमान के मुताबिक, तकरीबन एक तिहाई सभी क्षेत्रों में शोधकर्ता, बैंकिंग, कर्मचारी, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कर्मी और चार्टर्ड अकाउटेंड महिलाएं हैं। अगर साक्षरता दर की बात करें तो आजादी के समय महिलाओं की साक्षरता दर मात्र नौ प्रतिशत थी। वहीं आज यह बढ़ कर 65.46 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।

वर्ष 2016 में महिला सशक्तीकरण के इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय तब जुड़ा, जब तीन लड़कियों को भारतीय वायु सेना में लड़ाकू पायलट नियुक्त किया गया। ओलंपिक, राष्ट्रमंडल खेलों और हाकी आदि में महिलाएं हर रोज एक नया कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। नैनो उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने वाली टीम में महिला वैज्ञानिकों का शामिल होना यह दर्शाता है कि अगर महिलाओं को समान अवसर मिले तो वे आसमान में भी अपनी सफलता की इबारत लिख सकती हैं।

पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या तकरीबन छियालीस फीसद है। ग्रामीण स्तर पर तेरह लाख से ज्यादा महिलाओं के शासन में होने के कारण अब समाज में जमीनी स्तर पर भी बदलाव नजर आ रहा है। 1957 के आम चुनावों में सिर्फ पैंतालीस महिलाएं चुनाव मैदान में थीं, जबकि 2014 के आम चुनावों में 402 महिलाएं चुनाव मैदान में थीं। हालांकि यह उनकी आबादी के हिसाब से काफी कम है। सबसे बड़े दुखद आश्चर्य की बात यह है कि महिलाओं की आधी आबादी का संसद भवन में प्रतिनिधित्व मात्र 11.2 फीसद है। महिलाओं की जीवन प्रत्याशा दर में भी वृद्धि दर्ज की गई है। 1950-1951 में महिलाओं की औसत उम्र जहां 31.7 साल थी, वहीं 2016 में बढ़ कर यह सत्तर साल हो गई है। महिलाओं के वित्तीय समावेशन में भी जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। 2005-2006 में बैंक या बचत खाता रखने वाली सिर्फ पंद्रह फीसद महिलाएं थीं, जबकि 2015-2016 में यह आंकड़ा बढ़ कर 53 फीसद हो गया है।

वर्ष 2015 में शुरू हुई सुकन्या समृद्धि योजना नारी सशक्तीकरण की दिशा में ‘मील का पत्थर’ साबित हुई है। सुकन्या योजना के तहत लड़कियों के बैंक खातों में एक निश्चित राशि जमा करने पर ज्यादा ब्याज मिलता है। इस रकम को लड़की के अठारह साल पूरा करने पर उसके द्वारा निकाला जा सकता है। कुल 1.39 करोड़ लड़कियों के खाते सुकन्या समृद्धि योजना के माध्यम से खोले जा चुके हैं और इन खातों में कुल 25,979 करोड़ रुपए की रकम जमा भी हो चुकी है। जनधन योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ एवं सुकन्या समृद्धि योजना जैसे सरकारी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं के वित्तीय सशक्तीकरण का प्रयास सराहनीय कदम है।
पर आजादी के बहत्तर सालों बाद भी समाज में महिलाओं की स्थिति ज्यादा नहीं सुधरी है। एक महिला का देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन जाना या फिर किसी राजनीतिक पार्टी का प्रमुख बन जाना नारी सशक्तीकरण का पैमाना कतई नहीं हो सकता। जब तक गांव और शहर की प्रत्येक महिला अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, तब हम महिला सशक्तीकरण की बात करना भी बेमानी होगा। जब तक हम अपने देश के महिला संसाधन का समुचित उपयोग नहीं करते, तब तक सर्वांगीण विकास का सपना रेत पर घर बनाने जैसा होगा।