रामनगीना मौर्य

मैंने गौर किया है कि तुम हर वक्त अपनी मां की गोद में घुसे रहते हो। तुम हमेशा यों ही अपनी मां की गोद में लेटे-लेटे मीठी नींद के साथ खुशनुमा सपने नहीं देख सकते। समझे कि नहीं?’ अपनी मां की गोद में सिर रखे नौ-दस बरस का वह बच्चा, जो कोई कहानी सुन रहा था, या शायद मां के साथ, अपने दिन-भर के क्रियाकलाप साझा कर रहा था। देर रात दफ्तर से लौट कर, हाथ-मुंह धोने, भोजन करने के बाद, आराम करने वास्ते बिस्तर पर आने पर पत्नी की गोद में बेटे को लेटा देख, पिता ने उसे लगभग झिड़कते हुए कहा।

‘क्यों डैड?’
‘अब तुम बड़े हो गए हो। खा-पी कर होमवर्क वगैरह भी पूरा किया करो। स्कूल से आने के बाद भी तुम्हारा दिमाग सिर्फ खेलने-कूदने, या अपनी मां संग गलबहियों में ही लगा रहता है। आखिर, हर चीज की एक उम्र होती है। इसे जितनी जल्दी समझ जाओगे, तुम्हारे भविष्य के लिए उतना ही बेहतर होगा।’
‘पर मैं तो… अपना होमवर्क पूरा करने के बाद ही मम्मी के पास आया हूं।’
‘हां, लेकिन यह क्या कि जरा देर अपनी मम्मी को कहीं लेटे-बैठे देखा नहीं कि जिद करने लगे उनकी गोद में लेटने, उनसे लिपटने-चिपटने की? आव देखा न ताव, जब देखो तब, हरदम इनकी गोद में घुसने की ही ताक में रहते हो। चलो अब जाओ यहां से?’
‘पर, डैड…?’
‘अरे भई! कामकाज से लौटने के बाद, मुझे भी तो दिन भर के अपने अनुभव तुम्हारी मम्मी से साझा करने होते हैं। बोलना-बतियाना रहता है। फिर, जरूरी नहीं कि तुम हमारी हर बात सुनो ही।’ इस बार पिता ने तनिक रूखेपन से कहा।
‘आप इसे इस तरह क्यों डांट रहे हैं? यही बात इसे प्यार से भी तो समझाते कह सकते हैं?’ पिता-पुत्र के इस संवाद के बीच, पत्नी ने हस्तक्षेप किया।
‘तुम्हारे प्यार-दुलार ने ही इसे बिगाड़ रखा है। तुमने ही इसे सिर पर चढ़ा रखा है। अरे भई! अभी तुम गए नहीं यहां से? अब जाओ अपने कमरे में, और ट्वेंटी तक का टेबल याद करो। सुबह मैं तुमसे पूरा टेबल सुनंूगा। समझे कि नहीं?’ पिता ने एक बार फिर उसे लगभग झिड़कते हुए कहा।
‘ओके बेटा…। मुझे आपके डैड से कुछ बातें करनी हैं। अब आप अपने बिस्तर पर जाइए, और सो जाइए। आपको सुबह जल्दी उठना भी है। कल से आपके स्कूल की टाइमिंग भी तो बदल गई है न? यू ऑर ए गुड ब्वॉय। गुड नाइट बेटा।’ बोझिल कदमों से बेटे को वहां से जाते देख, मां ने उसे ढांढस बंधाते समझाया।

‘गुड नाइट मॉम। गुड नाइट डैड।’
‘गुड नाइट बेटा।’
जाहिर है, पति की इच्छा, उनके गुस्से का मर्म समझते, पुत्र की मन:स्थिति भांपते, मां ने बेटे को प्यार से समझाते, पिता-पुत्र के बीच उपजी इस गुत्थी को सुलझाने की गरजवश, मौजूदा स्थिति में तालमेल बिठाने का प्रयास किया।
‘दफ्तर में आज फिर किसी से झंझट हो गई क्या?’
‘तुम्हें क्या लगता है?’ पति के तेवर अभी भी तल्ख थे।
‘आपका मूड देख कर तो यही लगता है।’
‘तुम कैसे समझ लेती हो मेरी दुविधाएं, मेरे मनोभाव?’
‘आपको समझना तो बहुत आसान है। आपसे जनम-जनम का प्यार का रिश्ता जो है। याद है! शादी के शुरुआती दिनों में, घर में हों या किसी पार्क में, जाड़ा-गरमी-बरसात कोई भी मौसम हो, सुबह-शाम घंटों यों ही हम बाहों में बाहें डाले बैठे या लेटे रहते थे। आप तो अक्सर, अच्छे-भले मूड में भी किसी फल, सब्जी, खोमचे या पॉर्किंग वाले से पैसे कम कराने के चक्कर में उलझ जाते थे। शुरुआती दिनों में तो मुझे यह सब बहुत खराब लगता था, पर धीरे-धीरे… ‘क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा, रुष्ट-तुष्टा क्षणे-क्षणे’ वाले आपके पल-पल बदलते मिजाज को मैं अच्छी तरह समझने लगी।’
‘पता नहीं वो नादानियां थीं कि उम्र का तकाजा।’ पति ने निरपेक्ष-भाव से लगभग अन्यमनस्कता से जवाब दिया।
‘पर उस दौरान के चिरौरी, मान-मनौव्वल के पल तो बेशक सुकूनदेह थे।’
‘सो तो है।’ पति ने, गहरी सांस लेते आहें भरी।
‘प्यार के ये अनमोल सुखद-दुखद क्षण, दुनियावी खूबियों-खामियों से लबरेज, हमारी कुलजमा जिंदगी भी तो यही है।’ पति के मिजाज को भांपते, पत्नी ने बात आगे बढ़ाई।

‘यह एक अरसे के बाद, तुम्हें आज क्या सूझी?’ पति ने अबूझ से स्वर में पूछा।
‘बेटा बड़ा हो गया है। उसे अब ऐसे मत डांटा कीजिए। वह अपने स्कूल के दोस्तों की बातें, उसके टीचर्स ने आज क्या-क्या पढ़ाया आदि दिन-भर की बातें ही तो मुझसे साझा कर रहा था।’ पति को प्रकृतिस्थ होते देख पत्नी ने प्यार से समझाना चाहा।
‘तो, अब तुम भी मुझे ही समझाने लगी? कितनी बार कहा कि बेटा बड़ा हो गया है। उसे अब दूसरे कमरे में सोने के लिए कह दिया करो। आखिर, मुझे भी तो तुमसे साझा करने होते हैं अपने दिन-भर के अनुभव। क्रियाकलाप। तमाम झंझावात। क्या-क्या मुश्किलें दरपेश हुर्इं, किन-किन से मिला, क्या-क्या कहा-सुना? क्या कुछ उतार-चढ़ाव देखा? फिर कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो मैं सिर्फ तुमसे कह सकता हूं।’
‘बेटा थोड़ा बड़ा हो जाएगा, तो अपने आप सब समझने लगेगा।’
‘कब बड़े होंगे ये महाशय? कब समझेंगे? क्या पिता होने पर समझेंगे अपने पिता को?’
‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं?’
‘तुम्हें तो पता है। मुझे अक्सर ही इन्हें नींद से जगाते या रात-विरात गोद में उठा कर इनके कमरे तक ले जाने में कितनी दिक्कत होती है? कमर अलग से दुखने लगती है। ऊपर से आज फिर, शाम से ही सिर में भयंकर दर्द हो रहा है। क्या तुम भी नहीं समझती मुझे? अरे भई! मेरी भी तो कुछ जरूरते हैं कि नहीं? मुझे भी तो गाहे-बगाहे जरूरत पड़ती है, तुम्हारे गोद की?’ पति ने लगभग निरीह-भाव, पत्नी से अपनी व्यथा-कथा कहनी चाही।
‘भई वाह! बातें बनाना तो कोई आपसे सीखे।’ पत्नी ने माहौल को खुशगवार बनाना चाहा।
‘बातें नहीं बना रहा हूं। सच कह रहा हूं। पता नहीं इतने वर्षों में तुम मुझे अब तक ठीक तरह समझ क्यों नहीं पाई?’
‘भला, आपको नहीं समझूंगी तो किसे समझूंगी? आपको बहुत अच्छी तरह समझती हूं। गांव से यहां आपके साथ रहने के लिए शहर आते वक्त अम्मा ने आपकी आदतों, स्वभाव के बारे में मुझे विस्तार से बताया था। आपको किसी के कुछ कहने का बहुत जल्दी ही अमरख लग जाता है। ऐसे में आपको सिर्फ बातों से ही समझाया-बंहटियाया नहीं जा सकता। बल्कि स्वादिष्ट खानपान का भी ध्यान रखना पड़ता है। अब तो आपका बेटा भी आपके पद-चिह्नों पर चलने लगा है। हर रोज टिफिन में कुछ-न-कुछ नई डिश की डिमांड करता है। उसे भी मुझे ही संभालना पड़ता है।’ पत्नी ने ये प्यार भरी बातें तनिक शरारती मुद्रा में कहीं।

‘अच्छा! क्या-क्या कहता है तुमसे?’
‘आपकी तरह उसे भी, अपने साथ बीते दिन-भर की घटनाओं के बारे में विस्तारपूर्वक बताने की बड़ी फिक्र रहती है। उसे भी मुझे ही, अच्छा-बुरा समझाना पड़ता है। पर एक बात जो सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगती है, वह यह कि अपनी सारी बातें वह मुझसे ही साझा करता है।’
‘सचमुच! यह तो बड़ी अच्छी बात है। पर ये जनाब बड़े कब होंगे, जो हर बात तुम्हारी गोद में ही आकर बताना चाहते हैं?’
‘आप ही पर गया है। क्या पता, उसे भी मेरी ही गोद में सुकून मिलता हो?’
‘वैसे, देखा जाय तो… मैं भी अपने दिन-भर के अनुभवों पर तुमसे बोल-बतिया कर ही दिली सुकून पाता हूं।’
‘फिर, बेटे को क्यों कह दिया, यहां से जाने के लिए? बेचारा मायूस हो गया। बच्चा ही तो है?’
‘अच्छा, बुला लो। आखिर, वह भी तो मेरी ही तरह हाड़-मांस का बना है। उसे भी तो जरूरत है तुम्हारे गोद की।’
‘अच्छा आइए, बैठिए यहां। सबसे पहले आप का सिर दबा देती हूं। अब तो खुश्श न?’ पत्नी ने मुस्कुराते हुए अपनी भूमिका निभाई।
‘तुम भी न!… ये अंत:सलिला-सी बातें कैसे समझ लेती हो?’
‘औरत हूं न। बचपन से ही आदत है। पर, आप जब झल्लाते-गुस्साते-भन्नाते हैं न, तब मुझे बिलकुल अच्छे नहीं लगते।’ पत्नी ने बनावटी गुस्सा दिखाते कहा।
‘वो तो मैं यों ही…।’
‘अच्छा जनाब! जब अपनी बारी आई तो लप्पो-चप्पो बतियाते बगले झांकने लगे। क्या सारे मर्द ऐसे ही होते हैं?’
‘क्या पता? पर इतना यकीन के साथ कह सकता हूं कि तुम्हारी गोद में आकर हम बाप-बेटे, दोनों को बेहद आराम और सुकून मिलता है।’
‘यानी! जादू की झप्पी?’
‘बेशक।’
‘पर, अब आप कहां जा रहे हैं?’
‘बेटे को भी यहीं लाने। आखिर, उसे भी तो तुम्हारी गोद, जादू वाली झप्पी की जरूरत है न? अभी हाल ही में मैंने पढ़ा है कि ‘सिगडिअनसेट’ को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के बाद जब पत्रकारों ने उनका साक्षात्कार लेना चाहा तो उन्होंने यह कहते असमर्थता जताई कि ‘अभी मैं आपसे बातें नहीं कर सकती। मैं जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण काम कर रही हूं।’ वे अपने बच्चे को गोद में लिए कहानियां सुनाते, उसे सुला रही थीं।’
‘आप भी न! कभी-कभी ऐसी बड़ी-बड़ी बातें करने लगते हैं कि आपको समझना वाकई मुश्किल हो जाता है।’
‘यही तो प्यार है, जिसे समझा नहीं, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।’ अगले ही पल पति-पत्नी के होठों पर मुस्कान बिखर गई।