राजस्थान के बीकानेर में जल की स्थिति के लिए यह कहावत है-जल उंड़ा थल उजला, नारी नवले बेस…। यानी जल स्तर बहुत नीचे है और थल पर बालू-रेत का अपार समुंदर दिखाई देता है और यहां की नारियों की वेशभूषा बहुत निराली है। इस क्षेत्र में जल का मोल घी से भी ज्यादा माना गया है। यहां के लोगों से सुना जाता है कि घी ढूले तो कांई नहीं, पाणी ढूले तो म्हारो जी बले यानी घी व्यर्थ में बह जाए तो कुछ नहीं लेकिन जल व्यर्थ में नहीं बहना चाहिए। ऐसे सूखे क्षेत्र में कुएं और तालाब पानी के मुख्य स्रोत हुआ करते थे।
बीकानेर में कुओं के कई नाम प्रचलित थे जिसमें खांडिया, खारिया, अंध, चैतिणा आदि खास थे। इन कुओं की अपनी-अलग विशेषताएं थीं। खांडिया नाम किसी घटना विशेष के कारण खंडित होने पर पड़ा। खारिया खारे पानी के कारण, अंध कुआं पाताल तोड़ कुएं को कहां जाता था जोकि बहुत ही गहरा होता और चैतिणा, जिसकी चार तिवण हो यानी चार चड़स पानी के साथ निकाला जा सके। बीकानेर के कुओं में मुख्य रूप से तीन प्रकार का पानी हमें पीने को मिलता है जिसमें सबसे उत्तम पानी मीठा होता था।
बीकानेर में पानी बहुत गहरे होता था इसलिए कुओं का निर्माण बहुत धीरे-धीरे उल्टी चिनाई के साथ किया जाता था। कुएं की खुदाई के लिए चार-पांच फुट धरातल को खोदा जाता था और नीचे से ऊपर की ओर उसकी चिनाई कर दी जाती थी। इस चिनाई को ऊंध चिनाई कहते हैं। यहां पर्याप्त मात्रा में खारा चूना मिल जाता था इसलिए छोटी र्इंट या पत्थर के साथ चूने द्वारा चिनाई की जाती थी। कुएं के अंदर लगने वाले पत्थर के बाहरी भाग को सतमल रखा जाता था और उनका माप-तौल इस प्रकार रखा जाता था कि वे एक दूसरे से चिपके रहते थे। जैसे-जैसे खोदाई नीचे की तरफ बढ़ती वैसे-वैसे काम करना मुश्किल हो जाता था। जब तक पानी नहीं निकल जाता तब तक खोदाई और चिनाई की प्रक्रिया लगातार चलती रहती थी। पानी के निकलने के साथ ही आस-पास के क्षेत्र में थाली बजाकर सूचना दी जाती थी। और लोग कुएं पर इकट्ठा होना प्रारंभ हो जाते थे। एक बड़े उत्सव की तरह लोग एक-दूसरे को बधाइयां देते और हर्षोल्लास मनाते थे।
कुओं का वास्तु देखें तो पता चलता है कि ये कुएं केवल पानी का स्रोत नहीं थे। कुएं के साथ जुड़ी उसकी सारण होती थी। सारण वह स्थान है जहां कुएं से पानी निकालने के लिए ऊंट या बैलों को जोड़कर पानी खींचा जाता था, जितना गहरा कुआं होता उतनी ही लंबी उस कुएं की सारण होती। सारण को थोड़ा ढलुवां बनाया जाता जिससे ऊंट या बैलों को चलने में सुविधा रहती थी। बीकानेर में दो सारण और चार सारण वाले भी कुएं हैं।
बीकानेर में कुओं पर लाल पत्थरों से बहुत ही कलात्मक छतरियां बनी हुई हैं। ये छतरियां बाहर से आने वाले यात्रियों और आम व्यक्ति के लिए विश्रामगृह के रूप में उपयोग आती थीं। कई कुओं से आस-पास के गांवों से भी लोग पानी भरने आते थे। वे इन्हीं छतरियों के नीचे सुस्ताते थे। ज्यादातर कुओं में इन छतरियों की संख्या दो है लेकिन बड़े कुओं पर इनकी संख्या चार पाई गई है। बरसात से बचने के लिए भी इन छतरियों का उपयोग किया जाता था। कुआं से सींचने वाला व्यक्ति भी इन्ही छतरियों के नीचे दोपहर के समय कुछ देर आराम करता था। इन कुओं पर बेल-बूटे या कौरनी का काम बहुत ही कम या न के बराबर देखने को मिलता है। लेकिन कुएं के चारों ओर पीपल, नीम और खेजड़ी के छायादार पेड़ होते थे, जिनके नीचे बैठकर आराम किया जा सकता था।
बीकानेर के कुएं सार्वजनिक बातचीत के अड्डे होते थे। सुबह और शाम बहुत चहल-पहल हुआ करती थी। औरतें और मर्द पानी भरने के लिए बहुतायत में यहां इकट्ठा होते थे। जब तक पानी भरने का नंबर आता तब तक आपस में सुख-दुख की बातें बतियाते रहते थे। लोग आपस में घुलेमिले हुए थे।
कुआं परिसर से तीस-चालीस मीटर दूर ही पत्थर का एक स्तंभ होता था। इस स्तंभ को गोवर्द्धन या कीर्ति स्तंभ कहते हैं। इस पत्थर की चौड़ाई चारों ओर से करीब एक-एक फुट की होती थी और इसका बाहरी हिस्सा लगभग चार फुट बाहर की ओर रहता था। जिस पर सांप, गणेश, सूर्य और इस स्तंभ पर निर्माणकर्ता का नाम, संवत, वार, आदि जानकारियां मुडिया, मारवाड़ी या संस्कृत भाषा में उकेरी जाती थीं। साथ ही दूर से ही किसी व्यक्ति या यात्री को पानी के स्थान होने का पता चल जाता था। बीकानेर में प्रत्येक कुएं के पास मंदिर का निर्माण अवश्य करवाया जाता था और इन कुओं से निकलना वाला पहला चड़स भरा पानी (बारे) मंदिरों में चढ़ाया जाता था। बीकानेर में कुएं के पास बाड़ी होने का उल्लेख बहुत स्थानों में मिलता है।
यहां कुआं सींचने (पानी निकालना) का काम मुख्य रूप से माली जाति के लोग करते थे। ये माली सुबह और शाम दोनों समय कुएं पर काम करते और लोगों को पानी उपलब्ध कराते थे। इनको अपने परिवार के लालन-पालन के लिए कुएं के पास रहने के लिए जमीन दी जाती थी। कुछ जमीन कुएं के पास भी दी जाती थी, जहां वे सब्जी, फल-फूल आदि की छोटी मात्रा में खेती करते। इस खेती को बाड़ी कहते थे। बीकानेर की बहियों में यह उल्लेख मिलता है कि कुआं से पानी खींचने वाले व्यक्ति को निशुल्क पानी दिया जाता था। जहां कुएं होते थे, वहां मेले-मगरिए भी लगते थे। इन मेलों में मुख्य रूप से गणगौर का मेला कुओं पर आज भी लगता है।
लेकिन, दुर्भाग्य से पानी को सुरक्षित रखने का यह पारंपरिक तरीका खत्म हो चुका है। इन जल स्रोंतों की भूमि पर कब्जे हो चुके हैं। जहां कहीं कुएं बचे हैं, वहां उनकी देखभाल नहीं है, जिससे उनकी दुर्दशा हो रही है। जनसंख्या बढने के साथ-साथ ज्यादा रहवासों की जरूरत बढ़ी तो उनका पहला शिकार ये कुएं ही हुए। लोगों को यह भूमि कब्जे के लिहाज से आसान लगी, नतीजा हुआ कि सारणों और कुओं की जमीन कब्जे में चले गए। कुएं भी पट गए। कुओं के निर्माण से संबंधित कीर्ति स्तंभ, जिनसे हमें ऐतिहासिक जानकारी मिल सकती थी, कब्जेदारों ने ध्वस्त कर दिए। बीकानेर के ज्यादातर कुए सूख चुके हैं। एक समय था जब यही कुएं लोगों के लिए जीवन का सहारा थे। इन्ही कुओं ने जाने कितनी पीढ़ियों को पाला-पोसा है। आज वे गंदगी (अकूड़ी) के ढेर बने हुए हैं। कचरे से सटे पटे हुए हैं। न तो इनके परिसर की कोई थाह ले रहा है और न ही इन पर बने कलात्मक छतरियां और हौदों (कोठे) की।
समाज का क्या यही धर्म है कि जब तक हमें किसी से कुछ मिलता रहे तब तक हम उसको पूजते रहे, जब उसकी आवश्यकता कम हो तब हम उसको भूल जाएं। हो सकता है आज इनका पानी सूख गया हो, लेकिन इन्हें दोबारा साफ किया जा सकता है। इसके लिए सरकार और समाज, दोनों को अपनी इच्छाशक्ति जगानी होगी। आने वाले समय में पानी की महत्ता और बढ़ने वाली है, जब आफत-विपत में यही कुएं ही काम आएंगे।
(संजय श्रीमाली)
