गरिमा सिंह

महिलाओं को देवी मान कर पूजने वाले भारत में सदियों से ऐसी प्रथाएं चली आ रही हैं जो महिलाओं के अस्तित्व को तार-तार करती रही हैं। उसके जीवन, आचरण और सामान्य व्यवहार पर ऐसी-ऐसी पाबंदियां हैं कि वह चाह कर भी इनसे मुक्त नहीं हो पाती। स्त्री अपने से नहीं, समाज के निर्देशों से चलती है, गोया उसका जीवन अपना न होकर समाज के हाथों गिरवी हो। परदा प्रथा इसी मानसिकता का द्योतक है, जो शताब्दियों से भारतीय स्त्री को दास बना कर रखती आई है। हम सब जानते हैं कि परदा भारतीय महिलाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा है। बात-खयालात-जज्बात से लेकर प्यार-इजहार, जीत-हार हर जगह यह संस्कार वाला परदा बना रहा है, चाहे वह शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक स्तर पर। परदा भारतीय महिलाओं के दिलो-दिमाग पर इस तरह काबिज है कि वे बिना सोचे-समझे इस पर्देदारी को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा मान बैठती हैं और अपनी इच्छाओं का दमन कर मर्यादा, प्रतिष्ठा तथा संस्कार के नाम पर जिंदगी भर इस बोझ को ढोती रहती हैं। भारतीय समाज जहां जोर से हंसना, तेज आवाज में बोलना, उछल-कूद करना, शृंगार करना, यहां तक कि किसी के सामने खाना और बिना किसी आवरण के सो जाना, लड़की के कपड़ों की लंबाई ही उसका चरित्र निर्धारित करती है। इतनी पर्देदारी में फिर माहवारी की बात कौन करे!

भारतीय समाज में पीरियड यानी माहवारी को शर्म का विषय माना जाता है। शायद यही वजह है कि माहवारी को लेकर हमारे समाज में जागरूकता से ज्यादा भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिनके बारे में हमें माहवारी के शुरुआती दौर से ही बताया जाता है। इन भ्रांतियों का प्रभाव न केवल हमारे शरीर पर, बल्कि समाज पर भी पड़ता है, जो आने वाली पीढ़ियों को लेकर जागरूकता के बजाय रूढ़ियों की दीवार खड़ा करती रही है। इस दौरान खानपान, साफ-सफाई में किन बातों का ध्यान रखना चहिए आदि के बारे में बात न होकर कौन-कौन से काम नहीं करने चाहिए, इसका पाठ हमें बखूबी पढ़ाया जाता है। इन्ही भ्रांतियों में से एक है माहवारी के खून को गंदा मानना। आमतौर पर लोगों में धारणा है कि माहवारी के दौरान निकलने वाला खून गंदा होता है, जिसकी वजह से महिलाओं को अपवित्र माना जाता है। इसके परिणाम स्वरूप उन्हें हर पवित्र कार्य से दूर रहने की हिदायत दी जाती है। जबकि यह सामान्य खून होता है, जिससे गर्भावस्था के दौरान कोख में पलने वाले बच्चे का शरीर विकसित होता है।

माहवारी के दौरान आचार, पापड़ छूने से वह खराब हो जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि माहवारी का आचार-पापड़ से कोई लेना-देना ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह मिथ प्रचलित है कि माहवारी के दौरान नहाना नहीं चाहिए, जबकि यह निराधार है। इस दौरान साफ-सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। सबसे बड़ा मिथ माहवारी के समय पर न होने को लेकर होता है। उसका एक ही मतलब, केवल गर्भधारण नहीं होता। तनाव, अनियमित खानपान, वजन में कमी, हार्मोनल बदलाव भी इसके कारण हो सकते हैं। कई बार अविवाहित महिलाओं को इस समस्या से इलाज के दौरान बहुत आपत्तिजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है। आधुनिक दौर में जहां एक तरफ लड़कियां लड़कों की बराबरी कर रही हैं, हर क्षेत्र में समान भागीदारी कर रही हैं, उसमें यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी महिलाएं मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं के बारे में किसी से चर्चा तक नहीं कर सकतीं। यहां तक कि माहवारी का नाम तक लेने में झिझक होने के कारण वे कोड वर्ड का प्रयोग करती हैं। वर्तमान समय में एक लड़की की माहवारी शुरू होने की औसत आयु बारह से घट कर नौ वर्ष हो गई है। इंडियन कॉउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के अनुसार सत्तर फीसद लड़कियों को पहली बार मासिक धर्म होने से पहले पता नहीं होता कि यह क्या है। सबसे पहले मां ही यह जता देती है कि यह गंदी, शर्मनाक चीज है और इसे छिपाना उचित ठहराती है। यही कारण है कि माहवारी और उससे जुड़ी समस्याओं के बारे में महिलाएं चाह कर भी किसी से बात नहीं कर पातीं।

देश में अठासी फीसद लड़कियां मासिक धर्म के दौरान आज भी गंदे और पुराने कपड़े, राख, गोबर आदि का इस्तेमाल करती हैं। इसका कारण है कि महंगे सेनेटरी पैड आम महिलाओं की पहुंच से बाहर हैं और इसके लिए उनमें जागरूकता की कमी भी है। गंदे पुराने कपड़े के टुकड़ों से मासिक धर्म का प्रबंध करने के कारण भारत में सत्तर फीसद महिलाएं मेंस्ट्रुअल हाइजीन से दूर हैं। वे इन असावधानियों और गलतफहमियों के कारण वे संक्रमण का शिकार हो जाती हैं। 2010 के एक सर्वेक्षण के अनुसार देश की हर सौ में से बारह महिलाएं ही सेनेटरी नैपकिन का उपयोग करती हैं। माहवारी की उम्र वाली महिलाओं की संख्या देश में तिरपन करोड़ से ज्यादा है। बरसों पहले ज्यादातर औरतें केवल कपड़ों को धो-सुखा कर उसका बार-बार इस्तेमाल करती थीं। इसके कारण संक्रमण और कई बार गंभीर बीमारियों से जूझना पड़ता था। इसी समस्या के समानांतर एक और समस्या, महिलाओं के अंत:वस्त्रों की है। अंत:वस्त्र भी अन्य वस्त्रों की तरह सामान्य कपड़े होते हैं, जैसे पुरुषों के लिए, पर महिलाओं के अन्त:वस्त्रों को लेकर ऐसी धारणा समाज में व्याप्त है कि जिसके कारण उन्हें उसका सहज रखरखाव और प्रयोग में समस्या होती है, जैसे उन्हें अन्य कपड़ों के साथ नहीं रख सकते, धुल नहीं सकते, खुली जगह पर नहीं सुखा सकते, जिसके कारण कई बार महिलाओं को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। विचित्र है कि इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में भी, जब दुनिया इतनी आगे बढ़ गई है और स्त्री-पुरुष की बराबरी के नए अध्याय लिखे जाने का इतिहास शुरू हो चुका है, तब भी ऐसी भ्रांतियां समाज में मौजूद हैं और कोई भी आगे बढ़ कर स्त्री को इस जलालत से आजाद करने को तैयार नहीं है। मुश्किल यही है कि इस अजीब स्थिति में स्त्री ही स्त्री की शत्रु बनती है, जिसकी शुरुआत खुद लड़की की मां से होती है, जो माहवारी को अपवित्र बना कर उसे गोपनीय रखने की सलाह देती है, जो धीरे-धीरे उस लड़की की एक ऐसी कुंठा या कमजोरी बन जाती है, जिससे वह कभी निजात नहीं पा पाती।

उसके बाद यह समाज, शास्त्र और मान्यताएं तो और भी उसे दब्बू बनाए रखने का काम करती हैं और उसे यह बोध घर कर जाता है कि माहवारी दरअसल उसकी अपवित्रता का सूचक है, जिसमें वह कोई भी काम करने लायक नहीं होती। अपनी प्रकृति में वह तो वैसे ही महीने के चार-पांच दिन भयावह यंत्रणा और दुख में काटती है, जिसमें उसे कमजोरी होती है, चिड़चिड़ापन होता है और देह शिथिल होकर उसे सब कुछ से उदासीन बना देती है। ऐसी स्थिति में उसके प्रति सामाजिक मान्यताएं जहर का घूंट ही होती हैं, जो उसको तिल-तिल कर जलाती हैं और उसके स्वाभिमान को तोड़ती हैं। ऐसे में अगर हम सचमुच स्त्री के प्रति न्याय करना चाहते हैं और चाहते हैं कि वह हर स्तर पर मजबूत बने, तो इसके लिए जरूरी है कि माहवारी जैसी सामान्य प्राकृतिक मासिक प्रक्रिया को सहजता से लिया जाए और सदियों से चली आ रही कुटिल भ्रांतियों से स्त्री को आजादी दी जाए। यह केवल पुरुष वर्चस्व को बनाए रखने का चालाक हथियार है, जिसे स्त्री के मन में इस तरह बिठा दिया गया है कि वह इससे कभी उबर नहीं पाती और अपने को बेबस और कमजोर मान कर हमेशा कमतर ही रहती है। यह याद रखने की बात है कि स्त्री को आजाद करने की कोई भी मुहिम उसकी देह से अलग नहीं हो सकती। माहवारी पर तकलीफदेह और शरीर को नापाक बना देने वाली कुटिल मानसिकता से निजात दिलाए बिना स्त्री को हम स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ने से रोकेंगे और उसमें हीनताबोध को जन्म देंगे।