पंचम दा के नाम से मशहूर संगीतकार राहुलदेव वर्मन अपने फन में तो माहिर थे ही, साथ में वे मिलनसार भी बहुत थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी थी अपने मातहतों और सहयोगियों की भरपूर प्रशंसा करना और उनकी मदद करना। अगर उनकी किसी टीम में किसी के पास कोई प्रतिभा थी तो वे उसे सामने लाने में कोई कोताही नहीं बरतते थे। सत्तर के दशक की एक शाम की घटना है। उस दौर के चर्चित फिल्म निर्माता और निर्देशक नसीर हुसैन अपनी किसी फिल्म की संगीत के लिए राहुल देव बर्मन के पास पहुंचे। पंचम दा तब तक नसीर हुसैन प्रोडक्शंस के नियमित संगीत निर्देशक बन चुके थे इसलिए उन्हें नसीर की पसंद के बारे में जानकारी हो गई थी। समस्या यह थी कि पंचम दा तब तक कोई ऐसी धुन नहीं बना पाए थे जो नसीर को पसंद आ जाए, इसलिए हरमोनियम पर एक-दो इधर-उधर की धुनें सुनाने के बाद उन्होंने कहा कि वे अब जो धुन सुनाएंगे वह उन्हें जरूर पसंद आएगी। देखने वाली बात यह रही कि वह धुन नसीर को वाकई में पसंद आ गई। उनकी रजामंदी मिलते ही पंचम दा बोल पड़े, ‘मुझे मालूम था कि यह धुन आपको पसंद आएगी, क्योंकि यह धुन मैने नहीं बल्कि यह भानू ने बनाई है।’
दरअसल भानू गुप्ता पंचम की यूनिट के नियमित संगीतकार थे और समय-समय पर गीतों के लिए संगीत भी तैयार करते थे। संगीतकार के रूप में आरडी बर्मन की यह खूबी थी कि वे अपने सहयोगियों के योगदानों की सार्वजनिक प्रशंसा करने में कभी भी थकते नहीं थे, इसलिए उनके साथ काम करने वाले अधिकतर संगीतकार अंतिम दिनों तक उनके साथ रहे। उन्हें इस बात का गम कभी भी नहीं रहा कि उनकी कृतियों पर मिलने वाली वाहवाही किसी और के नाम पर परदे पर जा रही है। यों तो राहुल देव बर्मन पर विदेशी धुनें चुराने का आरोप भी लगा, लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि उन्हें देशी धुन के मीटरों पर भी संगीत तैयार करने में महारत हासिल थी। पार्श्व गायक अमित कुमार के मुताबिक साठ के दशक में बनी फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ में संगीत निर्देशक मदन मोहन के बनाए लोकप्रिय गीत ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’ के आधार पर ‘तेरी कसम’ की धुन पंचम दा ने तैयार की थी। ‘नरम-गरम’ और ‘सागर’ के लिए धुन तैयार की थी।
साठ-सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मों में कैबरे डांस की प्रस्तुति लगभग अनिवार्य हो गई थी। इसके लिए उस दौर की कैबरे डांसरों का अपनी कला में कुशल होना भी था। पहली कतार में हेलन, पद्मा खन्ना, बिंदु, लक्ष्मी छाया, जयश्री, कल्पना अय्यर आदि थीं। इन सबकी सिरमौर हेलन थीं। राहुल देव ने अपने संगीत के जरिए कैबरे को नई पहचान देकर उसे दर्शनीय के साथ श्रवणीय भी बनाया। फिल्म ‘कारवां’ का यह गीत ‘पिया तू अब तो आ जा’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ‘जीवन साथी’ का गीत ‘आओ न गले लगा लो न’ में आशा की आवाज का मादक और उत्तेजक उपयोग करने में आरडी सफल रहे हैं। आशा से कैबरे सांग गवाकर उनकी आवाज का नशीला जादू जगाने में आरडी को महारत हासिल थी। ‘तेरी-मेरी यारी बड़ी पुरानी’, ‘आज की रात कोई आने को है’ आदि में उनका संगीत सिर चढ़ कर बोलता है। राहुल देव ने लता मंगेशकर की कोमल और मधुर आवाज से भी कैबरे-गीत गवाकर श्रोताओं को चकित किया है। ‘शराबी, शराबी मेरा नाम हो गया’ (चंदन का पलना), ‘हां जी हां, मैंने शराब पी है’ (सीता और गीता) का संगीत कौन भूल सकता है।
(अभिजीत राय)
