राजेंद्र कुमार
आस्था और विचार
विचार को
भाषा में अलंकार की तरह
धारण करते हैं जो
उनके हर वाक्य में
कितनी तरह से, कितनी बार, आता है विचार
और हश्र यह कि विचार
किसी काम का नहीं रह जाता
आस्था को अलंकार की तरह
धारण ही नहीं किया जा सकता,
भले ही वह यमक हो या श्लेष
दोहराई जाए नए नए अर्थों में,
या एक ही प्रयोग में दे जाए कई कई अर्थ,
उसे गठरी की तरह
सिर पर लादकर भी
चलना पड़े तो चल रहे हैं
लाखों लाख लोग
आस्था की गठरी
कभी भी इतनी भारी नहीं
हुई कि कमजोर से कमजोर भी उसे
अपने सिर पर रख न सके
विचार, तुम्हारी तो धातु ही है चलना,
तब तुम इतने रुके-रुके से
क्यों हो
आस्था स्थिति है, फिर भी
गति के लिए उसमें कितना
दुर्निवार आमंत्रण है!
कोहरा छंटता नहीं दिखा
(1)
एक दूकान सब्जी की
(जिसे अगवा नहीं किया है
अभी किसी बिग बाजार ने, गो कि नीयत का क्या-
कभी भी बदल सकती है!)
(2)
एक अलाव,
बस उतनी ही आग
जितनी मयस्सर है उन
थोड़ी-सी लकड़ियों को
जो व्यवस्था की कागजी
कृपा की गवाह भर बनने को जलें, और फिर
चाहे जितनी भी जल्दी
राख हो जाए, और
आसपास ठिठुरती रहें
ठठरियां…
परछाईं की गति
यह किसी पक्षी की परछाई थी,
जो अभी अभी दिखी मुझे, चलती हुई,
और अदृश्य हो गई
हमारे ऊपर से उड़ता हुआ
कोई पक्षी गुजर गया होगा,
कैसे जानूं
यह पक्षी कौन रहा होगा-
कबूतर या कौव्वा!
