दुर्गा प्रसाद गुप्त
रेत पर बंजारे
रेत पर तने हुए हैं बंजारों के तंबू
यह सृष्टि में उनके घर होने का एहसास है
जो कभी स्थायी नहीं रहता
स्थायी है
रेत पर चूल्हों का बनना, और
उनसे धुएं का उठना
कांसे और मिट्टी के बर्तनों के खनक का होना
उनके जानवरों की अनिवार्य उपस्थिति के साथ-
उनके बच्चों का शोरगुल और
रेत पर उनका खेलना
रेत पर फैला पूरा एक जीवन और
उसमें शामिल कई-एक जीवन के काफिले।
चलते-फिरते काफिले स्थायी हैं
रेत पर तने हुए तंबू नहीं, और
वैसे भी किसको पता है कि
अगला ठिकाना कहां होगा उनका।
उनकी बोली-बानी से अनजान मूक-दर्शक हैं हम उनके
फिर भी सोचता हूं
उनके और रेत के बारे में
राजस्थान के बारे में नहीं
यदि इस रेत की जगह मिट्टी होती, तो
क्या वह उनके पैरों को बांधती, और
रोकती उन्हें, और
उनका भी कोई घर होता इस सृष्टि में!
पर रेत है कि उन्हें रोकती ही नहीं
बांधती ही नहीं
मुक्त करती है
जीवन में बंजारापन रोपती है, और
बंजारे हैं कि
उस पर जीवन रोपते हैं!
बाशिंदे नहीं होते बंजारे
देखता था बचपन में उन्हें
जब गांव की सड़क से गुजरते आदमियों और जानवरों के काफिले उनके
अजनबियों की तरह उन्हें देखने
पहुंच जाते हम सड़क किनारे
काफिला अपने जीवन के अनिवार्य
माल-असबाब से भरा-पूरा होता
उनके बर्तन-भांडे, कपड़े-लत्ते, ओढ़न-बिछावन
बच्चे, मुर्गे-मुर्गियां लदे होते जानवरों पर
कुत्ते तो जैसे स्थायी हमसफर थे उनके!
खाली सड़क भर जाती काफिले से
काफिले से उठती सड़क की धूल
जहां तक दिखाई देती थी हमें
हमारी निगाहें देखती थीं उन्हें वहां तक
क्षितिज के आसपास जाकर
कहीं ओझल हो जाते थे वे
ठंडी-गरमी, आंधी-पानी से बेखबर
लगातार चलते रहते हैं वे इस सृष्टि में!
घरवाले जब कहते कि
घर साथ लेकर चलते हैं यात्राओं में वे, तो
विश्वास नहीं होता था हमें
उनका घर हमारी तरह नहीं, बल्कि
आदमियों और जानवरों के पैरों पर चलता घर था।
अब लगता है कि इस धरती पर
अनेक सभ्यताओं के समानांतर
अनवरत चलती रहती है
एक विस्थापित सभ्यता
जिसके पड़ाव तो होते हैं
मुकाम नहीं।
इसलिए चलना घर का यात्राओं में
लग सकता है
जैसे आदमी यात्रा पर न हो,
यात्रा पर हो घर और
दोनों ही एक-दूसरे के पर्याय हों
जैसे हमारी दुनिया को देखने के लिए
यात्रा पर निकले हों वे, और
ये अनिवार्य यात्राएं हों उनके जीवन की
जो कभी खत्म नहीं होतीं
सिर्फ शुरू होती हैं, और
चलती रहती है
एक अंतहीन विस्थापन की यात्रा
जिसमें बाशिंदे नहीं होते बंजारे
सिर्फ यात्री होते हैं विस्थापन के
इस सृष्टि में!
