माया मिश्र
न जाने कैसे मेरे आने का आभास हो जाता और फाइटर दरवाजे के पास खड़ा होकर कूं-कूं करने और जोर-जोर से पूंछ हिलाने लगता। आहिस्ता से दरवाजा खोलती। डरती कि कहीं उसे चोट न लग जाए। अंदर आते ही लपक कर पैरों को चाटने लगता, साड़ी खींचता। जब तक उसे उठा कर गोद में नहीं ले लेती वह यूं ही उछल-कूद मचाता रहता। गोद में लेकर थोड़ी देर बैठती। वह कभी सिर टिका कर आंखें बंद कर लेता, कभी आंखें खोल कर मुझे एटकट देखता। जब तक मेरे स्नेह दुलार से उसका जी नहीं भर जाता वह गोदी से नहीं उतरता।
उसके प्रति मेरा भी लगाव बढ़ता जा रहा था। उसमें कुछ अलग ही खासियत थी जो उसे सबसे अलग करती थी। एक आंख भूरी तो दूसरी काली, एक कान खड़ा रहता था तो दूसरा गिरा हुआ था। रंग भूरा था। शरीर पर बड़े-बड़े झबरीले बाल थे। पूंछ पर काले रंग की धारियां थीं। आंखों के बीचोबीच माथे पर काला गोल टीका उसकी विशेषता को और बढ़ा देता था।
वैसे तो पशु-पक्षी पालने का शौक मेरे पतिदेव को था, लेकिन उनको पोसने का दायित्व मुझे निभाना पड़ता था। कभी चूजे, कभी बकरी, तो कभी कछुआ। पालने का शौक तो था ही साथ ही उनकी जिद भी प्रबल थी। ठान लिया तो ठान लिया। कलाकार आदमी थे। समय की कमी के कारण उनको सहला कर, पुचकार कर अपना दायित्व पूरा कर लेते थे। उनकी देखरेख करना, दाना-पानी देना, उनकी गंदगी साफ करना, सारी जिम्मेदारी मुझे निभानी पड़ती थी।
मैं हमेशा से ही उनके इस शौक के खिलाफ रही, क्योंकि पाले गए पशु-पक्षी एक-एक कर कालकलवित हो जाते थे। उनकी देखभाल करते-करते मैं उनसे जुड़ जाती। मां की तरह उनका खयाल रखती, स्नेह बंधन से बंध जाती, उनके सुख से सुखी होती और दुख से छटपटाने लगती। इस तरह उनसे बिछड़ने से हृदय व्यथित हो उठता था। कई दिनों तक मैं सामान्य नहीं हो पाती थी।
अक्सर इस बात को लेकर आपस में लड़ाई भी होती, कुछ दिन मनमुटाव भी रहता। आखिरी जीव जब कछुआ भी नहीं बचा तो उन्होंने कहा कि अब किसी जानवर को नहीं पालूंगा। सुन कर मन को परम शांति मिली। सोचा, देर से ही सही अकल तो आई, पर बकरे की मां कब तक खैर मनाती। एक दिन घर आए तो हाथ में एक-दो महीने का पिल्ला था। मैं बहुत रोई-चिल्लाई, घर वालों ने भी विरोध किया, लेकिन पतिदेव पर कोई असर नहीं हुआ। यह दलील देकर सबको चुप करा दिया कि इसके डर से बाहर का कोई आएगा नहीं। घर की सुरक्षा होगी। थक हार कर असहनीय होते हुए भी सबने स्वीकार कर लिया।
सभी जानवर मेरे कमरे में ही आश्रय पाते, क्योंकि घर के कुछ सदस्य खुले में पालने के खिलाफ थे, सो वह भी कमरे में पलने लगा। लेकिन एक पिल्ले को कब तक कमरे में पाला जा सकता है। गंदगी बहुत होती। मुझे लगातार सफाई करनी पड़ती, फिर भी कमरे में ऐसी दुर्गंध पसरी रहती, जिसे बर्दाश्त करना अब भारी पड़ने लगा था। मेरा रुआंसा चेहरा और तकलीफ देख कर शायद घरवालों का मन पसीज गया और यह तय हुआ कि इसे गेट पर बांधा जाए, अंदर न आने दिया जाए।
पतिदेव के आने-जाने का कोई तय समय नहीं था। जितनी देर घर में रहते उसके साथ थोड़ा-बहुत समय बिता लेते। उनका प्यार या शौक जो भी था, यहीं तक सीमित था। घर भर से बहिष्कृत वह मेरे साए में पलने लगा। खाना-पानी देना, नहलाना, समय पर बाहर ले जाना साथ ही साथ घर की जिम्मेदारी और स्कूल जाना। असुविधा तो बहुत होती थी, पर धीरे-धीरे अभ्यस्त हो गई। उस समय बहुत पीड़ा होती जब किसी काम में व्यस्त होती और अचानक आवाज सुनाई पड़ती- ‘रेखा, कहां हो? जल्दी आओ। फाइटर ने गंदगी कर दी।’ तब मुझे रोना आ जाता। क्या जिंदगी है मेरी? गंदगी साफ करती तो कुछ लोग मुंह छिपा कर हंसते, तब बहुत शर्मिंदगी महसूस होती और पति की नासमझी और जिद पर गुस्सा आता।
फाइटर बड़ा हो रहा था। देशी-विदेशी का मिलाजुला रूप, खूब लंबा-तगड़ा और छबरीले बालों के कारण शेर जैसा लगता था। बाहरी लोग उसके डीलडौल को देख कर डरने लगे थे। गेट पर बंधा होने के कारण सड़क पर आने-जाने वालों पर भौंकता। घर का शांति भरा साहित्यिक माहौल है। उसके भौंकते रहने से शांति में व्यवधान पड़ता। बार-बार उठ कर जाना पड़ता था। फिर समाधान ढूंढ़ा गया कि इसे गेट के अंदर ही थोड़ी दूर पर बांधा जाए। लेकिन इससे परेशानी घटी नहीं, और बढ़ गई। गेट खोलकर कोई अंदर आता तो फाइटर आक्रामक हो उठता। जोर-जोर से भौंकता, गुर्राता और जंजीर तुड़ा कर उस पर झपटने की कोशिश करता। लोग घबरा कर बाहर भाग जाते।
शायद अकेलेपन और लगातार बंधन के कारण उसका आचरण आतंकी होता जा रहा था। मेरे घर में न रहने पर माता जी ही उसे खाना-पानी देती थीं, सो वह मुझसे, माता जी और पतिदेव से ही थोड़ा शांत रहता, बाकी घर का कोई सदस्य उसके करीब नहीं जाता। उसकी आक्रामकता के कारण परिस्थितियां विकट होती जा रही थीं। कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। पतिदेव उसे छोड़ना नहीं चाहते थे और घर वाले उसे खुला छोड़ने को तैयार नहीं थे। एक दिन तो उसने गजब ही कर दिया। घर में मेहमान आए थे। उनके साथ छोटा बच्चा था। नासमझ बच्चा फाइटर के नजदीक पहुंचा तो वह झपट पड़ा। चेन छोटी होने के कारण बच्चा तो बच गया, लेकिन सबके मन में डर बैठ गया। इसका भी समाधान ढूंढ़ा गया और अंत में यह तय हुआ कि इसे छत पर खुला छोड़ दिया जाए, यानी काले पानी की सजा। कोई भी अकेला रहना नहीं चाहता। सभी एक दूसरे का साथ चाहते हैं। अकेला तो विक्षिप्त हो जाएगा। लेकिन कोई क्या कर सकता है? घर के मुखिया की तरफ से उसे काले पानी की सजा सुना दी गई थी। भोगना तो था ही। शायद पिछले जन्म के पापों की सजा भोगने के लिए ही पतिदेव के हाथों में पहुंच गया था। कहते हैं अपने अच्छे-बुरे कर्मों की सजा यहीं इसी जन्म में ही भोगनी पड़ती है। लेकिन इस जन्म में तो उसे पाप करने का अवसर ही नहीं मिला। वह तो जन्म के कुछ समय बाद से ही हमारे पास बंधनों में ही रहा।
मैं बार-बार पतिदेव को समझाती, फाइटर को छोड़ने के लिए कहती। उस पर इस तरह का अत्याचार तो अमानवीय है। लेकिन वे नहीं मानते। किसी इंसान का अहं इतना बलवान कैसे हो सकता है कि वह भला-बुरा भी न सोचे।
जब मैं उसे खाना-पानी देने छत पर जाती तो वह मुझसे लिपट जाता। कभी भौंक कर, कभी पैरों में लोट कर अपनी वेदना प्रकट करता। आंखों की चमक क्षीण हो गई थी और आंसुओं से सनी रहती। उदास आंखों से देखता और चुपचाप गोदी में बैठ जाता। बाकियों के लिए खूंखार फाइटर मेरी गोदी में सिर्फ कूं-कूं करता रह जाता।
उसे सहलाती, पुचकारती, बेबसी से देखती और जताने का प्रयास करती कि मैं भी तुम्हारी तरह ही लाचार हूं। जब उसे छोड़ कर आना चाहती तो आने नहीं देता। साड़ी खींचता जैसे नादान बच्चे को समझाता जाता वैसे ही उसे समझाती-बुझाती फिर नीचे आ जाती।
छत पर छोड़ देने के कारण वह सबसे कट गया था। जब तक नीचे था सबको आते-जाते देखता, भौंकता, अपनी क्रियाओं द्वारा लोगों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करता। इस प्रकार वह व्यस्त रहता, पर अब बिल्कुल अकेला पड़ गया था। रेलिंग से झांकता, जोर-जोर से भौंकता, छत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक दौड़ लगाता, पक्षियों पर झपटता फिर थक कर पैरों से मुंह छिपा कर शांत हो जाता।
फाइटर का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जा रहा था। खाना कभी खा लेता कभी वैसे ही पड़ा रहता। उसकी बेबस आंखें लगातार मुझसे सवाल करतीं- ‘आखिर मेरा कसूर क्या है?’ अपनी बेबसी उस मासूम को कैसे समझाती?
रेलिंग के सहारे खड़ा हो जाता और ऐसी दर्दभरी आवाज में भौंकता कि छाती दहल जाती। ऐसा लगता मानो लोगों से याचना कर रहा हो कि घर वाले तो सुनते नहीं, तुम्हीं मुझे इस कैद से आजाद करा दो। पिंजरे में कैद पक्षी की तरह पंख फड़फड़ा कर रह जाता। जब कोई सुनवाई नहीं होती तो अपने ही बाल दांतों से नोचने लगता।
नौकरी पर जाने से पहले उसका खाना-पानी रखती, उसे पुचकारती, सहलाती, प्यार जताती और जाते-जाते उसे समझा जाती कि खाना खत्म कर लेना, पानी पी लेना। वह भी आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपनी आंखें मटकाता और तेजी से पूंछ हिलाने लगता जैसे मेरी सारी बात समझ गया हो।
घर लौटने पर सबसे पहले उसी के पास जाती। वह खुशी के मारे मेरे पैरों पर लोट-पोट हो जाता। उसकी खुशी देख कर मैं निहाल हो उठती।
धीरे-धीरे खाने के प्रति उसकी रुचि कम होती जा रही थी। सुबह का रखा खाना वैसे का वैसा ही पड़ा रहता, तब उसे खूब डांटती। वह भी डांट चुपचाप सुन लेता और आंखों में दुनिया भर का दर्द समेट कर मुझे देखने लगता। उन आंखों से मैं डर जाती। यह स्थिति मन को झकझोर देती।
कभी-कभी सोचती, चुपके से इसे बाहर छोड़ दूं। फिर खुद पर क्रोध आता कि इतनी अकल पहले क्यों नहीं आई। अब उसे बाहर छोड़ना खतरनाक हो सकता है। बाहरी दुनिया उसके लिए अजनबी थी। वह बाहरी लोगों के लिए खतरा बन सकता था, तब स्थिति और भी बिगड़ जाती। कभी ईश्वर से प्रार्थना करती- ‘हे ईश्वर इसे इस पीड़ा से मुक्ति दे दो।’ मैंने मां की तरह उसका लालन-पालन किया था। उसकी देख-रेख की थी। उसका मल-मूत्र साफ किया था। उससे एक रिश्ता बन गया था। उसको दुखी देख कर मैं भी खुश नहीं रह पा रही थी।
काले पानी की सजा भोगते-भोगते दो वर्ष गुजर गए। फाइटर काफी कमजोर हो गया था। शरीर के बाल जगह-जगह से झड़ने लगे थे फिर भी वह जीवन से हार मानने वालों में से नहीं था। मुक्ति के लिए उसका संघर्ष जारी था। लेकिन मैं उसका दर्द झेल नहीं पा रही थी। उसकी आंसुओं से सनी आंखों से भयभीत हो उठती थी। गहरी सांस लेकर सोचती- ‘भगवान, ऐसी जिंदगी किसी को न मिले।’ हम दोनों ही एक-दूसरे की पीड़ा समझने और समझाने; एक दूसरे के जीवन की गुत्थी सुलझाने में इतने डूब गए थे कि यह समझना मुश्किल था कि उसको पालने में मैं फाइटर बन गई थी या वह फाइटर था।
एक दिन स्कूल जाने से पहले उसे खाना-पानी देने गई, तो हमेशा की तरह वह लपक कर मेरे पास नहीं आया। अपनी जगह पर बैठा चुपचाप मुझे देखता रहा। आंसू बह रहे थे। चेहरा उदास था। मैं खुद उसके समीप गई। उसे प्यार किया और समझाया कि खाना खा लेना।
आज स्कूल में मन अशांत रहा। अंदर से बेचैनी महसूस हो रही थी। मन फाइटर के आसपास ही भटक रहा था। उसने आज से पहले कभी ऐसा नहीं किया था। उसका यह बदलाव मुझे विचलित कर रहा था। कहीं उसकी तबीयत तो खराब नहीं? सोचा, घर पहुंचते ही सबसे पहले उसे डॉक्टर को दिखाऊंगी। घर जाते ही बैग फेंका और दौड़ कर फाइटर के पास पहुंची। वहां जो कुछ देखा, देख कर सकते में आ गई। आंखें फटी की फटी रह गर्इं।
सामने फाइटर निश्चेष्ट पड़ा था। आंखों से आंसू चिपक गए थे, मुंह खुला था। जीभ बाहर निकली पड़ी थी। मक्खियां भिनभिना रही थीं। अंतिम समय में इसने बहुत कष्ट झेला होगा। दर्द में डूबी आंखें दरवाजे की ओर स्थिर थीं, शायद किसी की प्रतीक्षा में।
मैंने एक-दो बार उम्मीद से उसे पुकारा भी, शायद उठ जाए, मुझसे लिपट जाए, साड़ी खींचे, मेरे पैरों को चाटे, पर मेरी करुण पुकार भी उसके बेजान शरीर में कोई हलचल पैदा नहीं कर पाई।
मैं जैसे एक ही जगह पर जड़ हो गई थी। पुकारने की ताकत भी शेष नहीं थी। एक नि:श्वास भर निकला- ‘आखिर फाइटर को आजादी मिल ही गई।’ और अगले ही पल मैंने निश्चय किया कि जीते जी किसी को इतनी पीड़ा भोगने नहीं दूंगी। जिससे नेह लगाओ, उससे बिछड़ने की पीड़ा मन को तोड़ देती है।
jansatta ravivari kahani uska jana
