देवेंद्र कुमार

रिक्शा में बाजार जा रहा था। एकाएक आवाज आई- ‘सर, प्रणाम।’ और एक स्कूटर रिक्शा के पास आकर रुक गया। मैंने रिक्शा वाले से रुकने को कहा। स्कूटर सवार ने मेरे पैर छू लिए। मैंने उसे पहचान लिया, वह मेरा पुराना छात्र यशपाल था। मैंने यशपाल के घर-परिवार की जानकारी ली। यशपाल ने बताया कि एक अच्छी नौकरी के लिए उसका चयन हो गया है। मैंने उसे आशीर्वाद दिया। यशपाल ने एक बार फिर मेरे पैर छुए और चला गया।

अपने पुराने छात्र से मिल कर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने रिक्शा वाले से आगे चलने के लिए कहा। पर वह रुका रहा। मैंने कहा- ‘चलो रिक्शा बढ़ाओ।’

‘क्या आप उस लड़के को जानते हैं, जो आपके पैर छूकर गया है?’

‘जानूंगा क्यों नहीं, वह मेरा पुराना छात्र है। हमेशा अव्वल आता था। ऐसे छात्रों पर अध्यापक को बहुत गर्व होता है।’ मैंने कहा।

‘आप जिसे इतना अच्छा बता रहे हैं वह अच्छा नहीं, गलत आदमी है।’ रिक्शा वाले ने कहा।

यशपाल के बारे में उसकी ऊलजलूल बातों से मुझे गुस्सा आ गया- ‘तुम ये क्या बकवास कर रहे हो। क्या तुम उसे पहले से जानते हो?’ मैंने तेज स्वर में पूछा।

‘जी नहीं। मैंने तो बस दो दिन पहले उस लड़के को पहली बार देखा था बड़े बाजार के चौराहे पर। … मैं सवारी के इंतजार में चौराहे पर खड़ा था। तभी एक स्कूटर सवार तेजी से आया और एक बच्ची को धक्का मार कर चला गया। बच्ची गिर पड़ी और जोर-जोर से चीखने लगी। बच्ची की मां चिल्लाई तो लोग स्कूटर सवार के पीछे दौड़े। पर वह रुका नहीं, आगे निकल गया। कोई उसे पकड़ नहीं पाया। पर मैंने उसका चेहरा देख लिया था। आज जब वह मेरे पास आकर रुका तो मैं उसे तुरंत पहचान गया।’ रिक्शा चालक अमजद ने कहा। इसी बीच मैंने उसका नाम पूछ लिया था।

मुझे धक्का लगा। क्या अमजद सचमुच सच कह रहा है! पर मेरा मन यह मानने को एकदम तैयार नहीं था कि यशपाल एक बच्ची को घायल करके इस तरह भाग सकता है। उसे रुक कर घायल बच्ची को देखना चाहिए था। पर यह भी तो हो सकता है कि अमजद को भ्रम हुआ हो। बच्ची को गिरा कर भागने वाला कोई और रहा हो। मैंने अमजद से यही कहा- ‘मुझे लगता है वह कोई और रहा होगा। तुमने दूर से उसका चेहरा देखा था, फिर इतने विश्वास से कैसे कह रहे हो कि यह लड़का वही था।’
‘मैंने उसे ठीक पहचाना है। यह वही था। क्या आप जानते हैं कि यह लड़का कहां रहता है?’

‘मैं यशपाल से न जाने कितने सालों बाद मिला हूं। मुझे पता नहीं कि वह कहां रहता है, लेकिन अगर कभी मिला तो उस घटना के बारे में पूछूंगा जरूर।’ मैंने अमजद से कहा।
‘ऐसे गलत लोगों को सजा जरूर मिलनी चाहिए।’

‘तुमने ठीक कहा, वह जो भी था उसे रुक कर घायल बच्ची को डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए था।’ मैंने कहा।

अमजद ने रिक्शा आगे बढ़ा दी। मैंने पूछा- ‘अब बच्ची कैसी है? क्या तुम्हें कुछ पता है?’

‘हां मैं जानता हूं दोनों मां-बेटी को। वहीं पास में रहती हैं।’

‘तब तो तुमने जाकर जरूर बच्ची का हालचाल लिया होगा।’

अमजद कुछ देर की चुप्पी के बाद बोला- ‘नहीं, मैं बच्ची का हाल पूछने नहीं जा सका। उस घटना के बाद एक लंबी सवारी मिल गई और मैं रात में बहुत देर से लौटा था।’

‘मुझे ले चलो बच्ची के पास।’ मैंने कहा। मैं सोच रहा था- मान लो अगर बच्ची स्कूटर से ही घायल हुई है, तो मुझे उसकी मदद जरूर करनी चाहिए। यशपाल से झूठ-सच का हिसाब बाद में भी लिया जा सकता है।

अमजद मुझे बच्ची के पास ले गया। बच्ची की मां उसे गोद में लिए बैठी थी। अमजद को देखते ही वह रोकर बोली- ‘भैया तुम भी मदद को नहीं आए।’

मैंने देखा- बच्ची का पैर सूजा हुआ था। अमजद चुप खड़ा था। मेरे पूछने पर बच्ची की मां ने पूरी घटना के बारे में बताया। एक कमरे के उस घर में गरीबी की छाप थी। मैंने बच्ची के पिता के बारे में पूछा तो मां ने कहा- ‘मुनिया के बापू परदेस में नौकरी करते हैं। दो दिन में आएंगे।’

मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि अभी तक मुनिया की चोट का इलाज नहीं हुआ है। मैंने मुनिया की मां से कहा- ‘मुनिया का इलाज तुरंत होना चाहिए। एक डॉक्टर मेरे जानकार हैं। आओ इसे उनके पास ले चलें।’

‘लेकिन…’ मुनिया की मां ने कहना चाहा, पर तब तक अमजद मेरे इशारे पर मुनिया को घर से बाहर ले आया। मुनिया की मां उसे गोदी में लेकर रिक्शा में जा बैठी। डॉक्टर का दवाखाना पास ही था। डॉक्टर मुझे अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने मुनिया की अच्छी तरह जांच की, पैर का एक्सरे किया। पता चला कोई फै्रक्चर नहीं था। डॉक्टर ने घाव साफ करके पट्टी कर दी। मुझे बताया कि कई दिन तक दवा लेनी होगी। मैंने उन्हें सारी बात समझा दी। यही कि मुनिया की मां इलाज का खर्च नहीं उठा सकती। मैंने कहा-मुनिया के इलाज का सारा पैसा मैं दूंगा, लेकिन यह बात मुनिया की मां के सामने नहीं आनी चाहिए। इससे उसके स्वाभिमान को चोट पहुंच सकती है।

डॉक्टर साहब ने मुनिया की मां को अंदर बुला कर कहा- ‘तुम्हें मुनिया के इलाज के पैसे नहीं देने होंगे। मैं उसका इलाज मुफ्त करूंगा।’ सुन कर वह डॉक्टर के पैर छूने बढ़ी तो उन्होंने कहा- ‘यह सब छोड़ो, बस अपनी बच्ची का ध्यान रखो, बीच-बीच में दिखाने आती रहो।’

मैंने मुनिया की मां को अमजद से कहते सुना- ‘दुनिया में अब भी अच्छे लोग मौजूद हैं।’ यही बात उसने मुझसे कही तो मैंने इतना ही कहा- ‘वह ठीक ही तो कह रही हैं।’

अब मुझे मुनिया की ओर से तो तसल्ली थी, लेकिन यशपाल को लेकर मन परेशान था। बार-बार अमजद की कही बात मन में कांटे की तरह चुभ जाती थी। क्या सच मुनिया को घायल करके भाग जाने वाला यशपाल ही था!