हरीश कुमार सेठी

पिछले कई सालों से संविधान की आठवीं अनुसूची में कुछ और भाषाओं को जोड़ने की मांग उठती रही है। संविधान बनाते समय आठवीं अनुसूची में कुछ प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल किया गया था। उस सूची को बनाने के पीछे संविधान निर्माताओं की यह दृष्टि थी कि भाषाएं मुख्यधारा से जुड़ी रहें। पिछली शताब्दी के अंत तक इनकी संख्या पंद्रह हो चुकी थी। आगे चल कर संविधान में संशोधन कर समय-समय पर इस सूची में कोंकणी, मणिपुरी, डोगरी, बोडो, मैथिली और संथाली भाषाओं को भी शामिल किया गया। संविधान की आठवीं अनुसूची में आज बाईस भाषाएं स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। इन भाषाओं के लिए हम यह कह सकते हैं कि इन्हें राज्य का आश्रय प्राप्त है। इसलिए इन सभी भाषाओं को एक प्रकार से भारत की राजभाषाएं कहा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करके उनका विकास करने की दृष्टि से काफी सार्थक प्रयास हुए। इसी विकास का परिणाम साहित्य अकादेमी द्वारा संविधान-सम्मत सूचीबद्ध उन सभी भाषाओं में रचित साहित्य को पुरस्कृत करने और किसी एक भाषा में पुरस्कृत रचना को अनुसूची में सूचीबद्ध अन्य भाषाओं में अनूदित करने जैसी योजनाएं नजर आती हैं। इससे भारत के साहित्य-भंडार में बढ़ोतरी हुई है, भारतीय साहित्य की अवधारणा को बल मिला है। आठवीं अनुसूची में समावेश से मोटे तौर पर सूचीबद्ध भाषा सशक्त होती है। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से ‘बोली’ की पहचान बनाए रखने वाली भाषा संविधान सम्मत ‘भाषा’ के पद पर आसीन हो जाती है; उसकी अपनी स्वतंत्र शैली और व्याकरण को स्वीकृति मिलने लगती है, वह साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने का आधार बन जाती है।

पर हम इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते कि केवल राज्याश्रय के सहारे कोई भी भाषा लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती। इतिहास इसका गवाह है। मुगलकाल में फारसी को राज्याश्रय मिला और वह शासन-प्रशासन की भाषा बनी रही। पर राज्य की छत्रछाया हटते ही उसे कड़ी धूप में झुलसने से कोई नहीं बचा सका। आज उसके व्यवहार का दायरा सिमट चुका है। दरअसल, जनमानस के व्यवहार से ही भाषा के बचने की गुंजाइश बन पाती है। लोक व्यवहार से भाषा के जिंदा रहने का उदाहरण हमारे सामने है। ब्रिटिश शासनकाल में शासन के आश्रय में अंग्रेजी ने अपनी जड़ें जमाई। यह लोगों के दिलो-दिमाग में इस तरह घर कर गई कि आजादी के बाद, राज्याश्रय की परिधि में न आने पर भी वह अपने अस्तित्व को बनाए रही। इसी का नतीजा था कि संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने के बावजूद अंग्रेजी को अगले पंद्रह साल तक के लिए छोड़ा नहीं जा सका था। अब स्थिति यह है कि अंग्रेजी का अस्तित्व आजादी के सत्तर साल बाद भी बना हुआ है। कहने का भाव यह कि भाषा लोगों से ही जिंदा रहती है; अगर लोग उसे छोड़ दें तो वह मरणासन्न हो जाती है; मर जाती है। ‘लोगों’ का मतलब उनके सरोकारों, आजीविका और सामाजिक प्रयोग में अभिन्न अंग के रूप में उसका बने रहना। लोगों द्वारा भाषा प्रयोग छोड़ने के कारण उस पर मंडराते खतरे का प्रमाण भी हमारे सामने मौजूद है। आज भूमंडलीकरण की आंधी में भाषाओं के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। भाषाओं के अस्तित्व को लेकर चिंता का मूल कारण यह है कि बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व में लगभग पंद्रह हजार भाषाएं व्यवहार में लाई जा रही थीं, जिनकी संख्या शताब्दी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते लगभग सात हजार रह गई। फिर आशंका यह बनी हुई है कि अगर इसी तरह भाषाओं के अस्तित्व पर संकट बना रहा तो इक्कीसवीं सदी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते भाषाओं की संख्या घट कर लगभग सात-आठ सौ तक रह जाएगी। भाषा के विलुप्त होने के साथ-साथ उस भाषा-समाज का इतिहास-संस्कृति और ज्ञान भी हमेशा के लिए विलुप्त हो जाता है।

भाषाओं पर खतरा तब और गंभीर हो जाता है जब समाज के बड़े-बुजुर्ग भी यह सोचने लगें कि समाज को अपनी भाषा को छोड़ कर दूसरी भाषा सीखनी चाहिए। इसी तरह, अगर समाज का श्रमिक वर्ग या निचले तबके के लोग अपनी भाषा का व्यवहार कम करते हुए यह सोचने लगें कि इतर भाषा सीखना चाहिए। दूसरी भाषा सीखने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर वर्चस्वशाली भाषा से आक्रांत या उसके दबाव में यह स्थिति बने तो यह सही नहीं होगा। हिंदी भाषा व्यवहार के मामले में सकारात्मक परिदृश्य नजर आता है। भूमंडलीकरण ने हिंदी भाषा को भी भूमंडलीकृत करने में योगदान दिया है। आज हिंदी का निरंतर विकास हो रहा है, उसके व्यवहार-क्षेत्र विकसित हो रहे हैं और वह नए-नए क्षेत्रों में प्रवेश का प्रयास कर रही है। यह हिंदी के अर्थशास्त्र की दृष्टि से निरंतर सार्थक होता जा रहा है। वहीं राजनीतिक स्तर पर देखें तो पिछले कुछ समय से जो राजनीतिक वर्ग सामने आ रहा है, वह अंग्रेजीदां नहीं है। इसकी जड़ें हिंदी से जुड़ी हुई हैं। यह केवल उत्तर या पश्चिम नहीं, दक्षिण और पूर्व तथा सुदूर पूर्वोत्तर भारत तक के संदर्भ में देखा जा सकता है। हिंदी का यह नया विस्तार सिर्फ हिंदी नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं के व्यवहार, विस्तार और अस्तित्व को बनाए-बचाए रखने की दृष्टि से सार्थक ही कहा जाएगा। अपने लचीलेपन और गतिशीलता के कारण आज हिंदी नए परिवेश में ढल चुकी है। फल-फूल रही है। लोगों की भाषिक संस्कृति बदल रही है और भविष्य की भाषा का नया स्वरूप प्राप्त करती जा रही है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि हिंदी भी शिष्ट और पूरी तरह से व्याकरणिक नियम-सम्मत हिंदी नहीं रह गई है। भाषाओं के टिक रहने में प्रौद्योगिकी की भी निर्णायक भूमिका है।

सूचना-संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भाषा का प्रयोग-व्यवहार, भाषा के भविष्य को प्रभावित करने वाला एक निर्णायक तत्त्व है। शुरू में रोमन लिपि आधारित अंग्रेजी ने स्वयं को सूचना-संचार संबंधी प्रौद्योगिकीय विकास की भाषा के रूप में स्थापित किया था, जिसके चलते देश और विश्व की भाषाओं के सामने चुनौतियां खड़ी हो गई थीं। छोटी भाषाओं के सामने उनके अस्तित्व पर संकट गहरा रहा था। पर हिंदी की आंतरिक शक्ति और खासकर उसकी लिपि देवनागरी आज अंग्रेजी को चुनौती दे रही है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी का वर्चस्व दिनोंदिन बढ़ रहा है। इस संबंध में किए जा रहे अध्ययन बताते हैं कि इंटरनेट पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ता वर्ग की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है। आज स्थिति यह है कि कंप्यूटर विशेषज्ञ, देवनागरी को सबसे अधिक समर्थ लिपि स्वीकार कर रहे हैं। सूचना-संचार प्रौद्योगिकी जहां हिंदी को विस्तार प्रदान कर रही है, वहीं अन्य भाषाओं के लिए नए रास्ते भी खोल रही है- आवश्यकता प्रौद्योगिकी केंद्रित भाषायी अनुसंधान और विकास करने की है। संकटापन्न भाषाओं के अस्तित्व को बचाने में भी सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का सार्थक उपयोग किया जा रहा है। इस प्रकार के प्रयासों को बोलियों के स्तर तक विस्तार प्रदान किया जा सकता है। भाषाएं केवल सरकारी अनुसूचियों में शामिल होने से संरक्षित-सवंर्धित नहीं होंगी। इसके लिए उनको जन-जन से जोड़े रखना होगा; उन्हें लोक-व्यवहार में बनाए रखने की जरूरत है। भाषा को रोजी-रोटी से जोड़ने की जरूरत है, वाणिज्य-व्यापार संबंधी व्यवहार में लाने की जरूरत है, ज्ञान की भाषा बनाने की जरूरत है। आज भाषाओं के प्रति संकुचित दृष्टि से ऊपर उठ कर अपने विचारों और दृष्टि को व्यापक बनाना होगा।