रेखा सेठी
कहीं पढ़ा था कि ‘हम अपने पिताओं से डरते हुए और उनके लिए प्रार्थना करते हुए बड़े हुए हैं।’ यह स्त्री जीवन की सच्चाई भी है और विडंबना भी कि उसे पिता और पितृसत्ता को दो स्तरों पर जीना होता है। स्त्री-रचनाशीलता के लिए भी परिवार और पितृसत्ता के द्वंद्व को सुलझाना चुनौतीपूर्ण है। परिवार में मां, पिता, भाई, बहन आदि संबंधों की कोमलता के बीच हमारे होने और जीने की संभावना बनी रहती है, लेकिन इस आत्मीयता के पार, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का पारिवारिक ढांचा स्त्री-जीवन का सबसे बड़ा संकट भी बनता है, क्योंकि यही वह आधारभूमि है, जहां शील और संस्कारों की महीन बुनावट स्त्री को समझौते करना सिखाती है। परिवार और अधिकार की टकराहट बहुत पैनी है। स्त्री का स्त्रीकरण करने वाली इस पारिवारिकता का घेराव अपने आप में एक प्रकार की हिंसा ही है, जो स्त्री के सपनों पर पहरा और उड़ान पर अंकुश लगा कर उसके जीवन को नियंत्रित करती है।
पितृसत्ता का यथार्थ, स्त्री अनुभव का अनिवार्य हिस्सा है, जिसे स्त्री-कविता किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त करती है। एक विशेष स्त्रीवादी बोध से रची गर्इं अनामिका और सविता सिंह की कविताओं में तो विशेष रूप से पितृसत्ता का घातक रूप दिखाई पड़ता है। सविता सिंह की कविता ‘प्रेम करती बेटियां’ आॅनर किलिंग के मर्दवादी यथार्थ में स्त्री के शिकार होने का प्रतिबिंब है- ‘आज भी बेटियां कितना प्रेम करती हैं पिताओं से/ वही जो बीच जीवन में उन्हें बेघर करते हैं/ धकेलते हैं उन्हें निर्धनता के अगम अंधकार में/ कितनी अजीब बात है/ जिनके सामने झुकी रहती है सबसे ज्यादा गरदन/ वही उतार लेते हैं सिर।’ अनामिका की कविताओं में भी पितृसत्ता के दबावों में घुटती स्त्री के बिंब कम नहीं हैं। उन्होंने तो उन दैनंदिन स्थितियों का कोलाज बना दिया है जो परिवार और समाज में स्त्री के स्त्रीकरण की प्रक्रिया को दृढ़ करती हैं। इन कविताओं के छोटे-छोटे ब्योरे उस सामाजिक प्रक्रिया को समझने में मदद करते हैं, जो अदृश्य रूप में सदा गतिमान रहती है।
इन दोनों कवयित्रियों का समकालीन स्त्री-कविता पर ऐसा प्रभाव है कि इनके बाद की अधिकांश युवतर रचनाकारों ने इस स्वर को पकड़ते हुए, स्त्रीवाद को पितृसत्ता के विरोध के सरल प्रत्यय में घटित कर दिया, जबकि स्त्रीवाद और पितृसत्ता के बीच का रिश्ता अत्यंत जटिल और तनावपूर्ण है।
स्त्रीवादी नजरिए से पिता को देखने पर, सामाजिक व्यवस्था के रूप में पितृसत्ता, पिता की मानवीय छवि पर हावी हो जाती है।
फिर पिता के साथ वह रिश्ता नहीं बन पाता, जिसमें सहानुभूति या कृतज्ञता का भाव हो। सविता सिंह की ही दूसरी कविता ‘एहसानमंद हूं पिता’- ‘एहसानमंद हूं पिता/ कि पढ़ाया-लिखाया मुझे इतना/ बना दिया किसी लायक कि जी सकूं निर्भय इस संसार में/ झोंका नहीं जीवन की आग में जबरन/ बांधा नहीं किसी की रस्सी से कि उसके पास ताकत और पैसा था/ लड़ने के लिए जाने दिया मुझको/ घनघोर बारिश और तूफान में/ एहसानमंद हूं कि इंतजार नहीं किया/ मेरे जीतने और लौटने का/ मसरूफ रहे अपने दूसरे कामों में।’ दोनों कविताओं को साथ में पढ़ने पर परिवार का वह सामंती ढांचा उभरता है, जहां पितृसत्ता, पिता के प्रति सहज रागात्मक संबंध पर हावी होने लगती है।
प्रभा खेतान लिखती हैं, ‘‘पुरुष प्रधान परिवेश में परवरिश स्त्री से ‘अधिकारों का त्याग’ मांगती है और स्वावलंबन ‘अधिकारों की चाह’।’’ पिता, परिवार और पितृसत्ता के बीच की टकराहट इसी बिंदु पर टिकी है। समकालीन स्त्री-कविता में यद्यपि पितृसत्ता के दबाव में शोषित स्त्री की छवियां ज्यादा हैं, लेकिन स्त्री के स्वावलंबन और आश्वस्ति की प्रतिध्वनियां भी हैं, शोषण के बिंब हैं, तो मुक्ति की तरकीबें भी। कविता लिखना भी ऐसी ही तरकीब है। कात्यायनी को स्त्री की इस भीतरी शक्ति पर बहुत भरोसा है, तभी वे कहती हैं- ‘यह स्त्री/ सब कुछ जानती है/ पिंजरे के बारे में/ जाल के बारे में/ यंत्रणागृहों के बारे में/ यंत्रणाघरों की बात छिड़ते ही/ गाने लगती है/ प्यार के बारे में/ एक गीत/ रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबासियां/ इन्हें समझो/ इस स्त्री से डरो।’ मुक्ति की आकांक्षा और उस लक्ष्य को पा जाने की तदबीरें, संशयों के कुहासे को साफ कर मंजिलों की राह रोशन करती हैं। स्त्री जीवन के कंट्रास्ट का ग्राफ स्त्री रचनाकारों की कविताओं में साफ झलकता है।
इस दृष्टि से, नीलेश रघुवंशी की कविताओं में पिता की छवि को स्त्री-कविता का नया प्रस्थान बिंदु माना जा सकता है, वहां पिता और पितृसत्ता अलग-अलग प्रस्तुत हैं। नीलेश उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं, जिनके पिताओं ने अपनी बेटियों को पढ़ने और आगे बढ़ने का हौसला दिया। निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी-पली इस लड़की ने ढाबा चलाते पिता को, भट्टी की आग के साथ-साथ जीवनगत अभावों की अग्नि में तपते देखा है। ऐसे परिवार में ‘जेंडर’ की कोई विशेष भूमिका नहीं है। नीलेश के लिए आर्थिक-विषमता का यह विद्रूप उसकी लैंगिक अस्मिता से कहीं बड़ा है। ऐसे में मुक्ति के सभी रास्ते, पूरे परिवार की मुक्ति की कामना से भरे हैं। पितृसत्ता के स्टीरियोटाइप से परे नीलेश ने पिता की तकलीफ और दर्द को सहानुभूति के साथ याद किया है।
‘टेलीफोन पर पिता की आवाज’, ‘पिता की पीठ’, ‘यात्रा करते पिता’, ‘पिता और कंप्यूटर’ आदि अनेक कविताएं पिता की निरीहता को कविता का सरोकार बनती हैं। यह नोट करने की बात है कि अपने पिता के प्रति ये पंक्तियां वह बेटी लिख रही है, जो उनकी आभारी है कि उन्होंने उसे पढने-लिखने, बढ़ने की आजादी दी। यह अनुभव नीलेश का निजी एकांतिक अनुभव नहीं है। हममें से बहुतों की स्मृति में ऐसे पिता हैं, लेकिन पिता के प्रति ममत्व का ऐसा स्वर स्त्री-कविता में दुर्लभ है- ‘पहली पगार से खरीदूंगी/ पिता के लिए एक पानदान/ छोटा-सा/ होंगे जिसमें मेरे सपने ग्यारह बरस के/ और उनकी जीवन भर की खुशी।’
यद्यपि स्त्री रचनाकारों ने यह स्वीकार किया कि उनका विरोध पुरुष से नहीं, पितृसत्ता से है। तब भी उनकी कविताओं में पुरुष की मानवीय संवेदनशील छवि कम ही उभरती है। जैसे, स्त्री के जेंडर स्टीरियोटाइप हैं वैसे ही पुरुष के भी हैं। स्टीरियोटाइप का खतरा यह होता है कि उस तस्वीर से मानवीय भावनाओं का चेहरा गायब हो जाता है। रजतरानी मीनू की कविता ‘पिता भी तो होते हैं मां’ में मां के न होने से, पिता की भूमिका बदल गई है और पिता जिस कोमलता से मातृहीन बच्ची का पालन-पोषण करते हैं, कवयित्री उस ममत्व के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है- ‘मैंने पापा की/ आंखों में देखा/ अपनी मां का चेहरा/ पापा मां ही तो होते हैं।’ पिता, मां की-सी कोमलता और साझेदारी से बेटी के मन में जगह बनाते हैं।
निर्मला पुतुल की कविताओं में पिता-बेटी के संबंधों के विलोम का दूसरा रुख है। उन्होंने अपनी अनेक कविताओं में कभी सीधे, तो कभी सांकेतिक रूप में ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया, जहां किसी छोटे-से एहसान के बदले बापू ने मूर्ख बन कर बेटी को बाघ-से दुष्ट आदमियों के हवाले कर दिया, लेकिन संभवत: पिता की निरीहता की पहचान और लोक संवेदना की आत्मीयता इस संबंध की कोमलता को बचा लेती है। ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’ में बेटी बाप से आग्रह करती है कि उसका ब्याह इतनी दूर न कर दें कि वे एक-दूसरे के सुख-दुख के भागीदार न हो पाएं।
इन कविताओं का संबंध कवि के स्त्रीवादी होने, न होने से नहीं है। पितृसत्ता का ढांचा लगभग एक जैसा है, लेकिन सब रचनाकारों के पास उससे संवाद या उसका विरोध करने की अपनी प्रविधियां हैं, लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि पिता और पितृसत्ता को अलग करके देखा जाए। महादेवी वर्मा ने ‘शृंखला की कड़ियां’ के अनेक निबंधों में पारिवारिक आदर्श द्वारा प्रस्थापित स्त्री परवशता की गंभीर आलोचना करते हुए, स्त्री के लिए शिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन की मांग की, क्योंकि यही वह आधार है जिससे स्त्री-शोषण की सांस्कृतिक-सामाजिक अधिरचना में परिवर्तन संभव हो सकेगा। नीलेश या रजतरानी मीनू की इन कविताओं में वह संभावना दिखती है और आने वाले समय में ऐसी रचनाएं ही स्त्री-पुरुष जेंडर बाइनरीज के परे सच्चे मानवीय अनुभव को रूपायित करेंगी, जो अधिक महत्त्वपूर्ण और स्थायी होगा।

