पवन कुमार वर्मा
आज प्रतीक को कई काम थे। स्कूल से लौट कर उसे पापा के साथ बाजार जाना था। स्कूल के लिए नए कपड़े, बैग और किताबें-कॉपियां लेनी थीं। पापा दो-तीन दिनों से टाल रहे थे। लेकिन आज तो किसी भी तरह उसे सारे सामान लेने ही थे। वरना कल स्कूल में सजा मिल सकती थी।
‘पापा, आपके भी जूते साफ कर दूं?’ प्रतीक ने पापा से पूछा।
‘नहीं नहीं, अपने जूते मैं खुद साफ कर लूंगा। तुम स्कूल जाने की तैयारी करो, वैसे भी देर हो रही है।’ पापा बोले।
‘ठीक है पापा।’ प्रतीक ने जवाब दिया और अपने स्कूल की तैयारी में लग गया।
स्कूल से लौटते ही प्रतीक फिर से हल्ला मचाने लगा। मम्मी उसे बार-बार समझा रही थीं कि आज पापा थोड़ा पहले आएंगे, और तुम्हारे साथ बाजार जरूर जाएंगे। लेकिन प्रतीक कुछ भी समझने को तैयार नहीं था।
पापा के आते ही प्रतीक उनसे तुरंत बाजार चलने की जिद करने लगा।
‘चलो चलो। तैयार हो जाओ।’ पापा बोले। बड़ी मुश्किल से वे एक गिलास पानी पी सके। उन्होंने स्कूटर पर प्रतीक को बिठाया और किताब-कॉपियों की दुकान पर पहुंच गए। उनके स्कूटर खड़ा करते ही प्रतीक दौड़ कर दुकान में पहुंच गया। दुकानदार को किताब-कॉपियों की सूची पकड़ा दी। दुकानदार ने भी तुरंत किताब-कॉपियां बांध दी और पापा को बिल पकड़ा दिया।
बिल देखते ही पापा पसीने-पसीने हो गए। बिल उनके अनुमान से बहुत ज्यादा था। मगर उन्होंने दुकानदार को पैसे दिए और बाहर आ गए।
‘पापा। अब ड्रेस लेने चलते हैं।’ प्रतीक स्कूटर पर बैठ कर बोला।
‘हां।’ पापा बहुत गंभीर हो गए थे।
ड्रेस की दुकान भी पास में ही थी। ड्रेस तो पापा ने किसी तरह खरीद लिए, लेकिन जूते के लिए बिलकुल पैसे नहीं बचे।
‘पापा, जूते कहां से लेंगे?’ प्रतीक ने पूछा।
‘बेटा, जूते कल ले लेंगे।’ पापा मुस्करा कर बोले।
‘लेकिन क्यों पापा?’ प्रतीक फिर से पैर पटकने लगा।
‘बेटा, आज बहुत देर हो गई है। फिर मम्मी भी घर में अकेली हैं।’ पापा प्रतीक को समझाने की कोशिश करने लगे।
मगर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। बड़ी मुश्किल से पापा ने उससे अगले दिन तक का समय लिया। पूरे रास्ते वह पापा से झगड़ता रहा। पापा बिलकुल शांत थे। उसकी किसी बात का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
घर पहुंच कर भी प्रतीक का मुंह फूला हुआ था। उसने किसी से कोई बात नहीं की और सीधा अपने कमरे में चला गया। मम्मी को भी कुछ समझ में नहीं आया। पापा ने जब उन्हें सारी बात बताई तो मम्मी हंसने लगीं।
मम्मी ने भी उसे बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन उसका गुस्सा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
अगले दिन सवेरे उसने किसी से कोई बात नहीं की। चुपचाप अपने स्कूल की तैयारी में लगा रहा। उसने अपने जूते साफ किए। पास में ही पापा के जूते रखे थे। पापा ने कल उसके जूते नहीं खरीदे थे, इसलिए वह उनसे नाराज था। उसने सोचा- पापा के जूते कहीं छिपा देता हूं। जूते नहीं मिलने पर पापा खूब परेशान होंगे। जैसे ही उसने पापा के जूते उठाए, तो वह उन्हें देख कर दंग रह गया। जूते में एक बड़ा-सा छेद था। जूते देख कर प्रतीक का सारा गुस्सा गायब हो गया। तो, पापा इतने दिनों से फटे जूते पहन रहे हैं? उसके जूते तो अभी बिलकुल ठीक हैं। जूते की उसे नहीं, पहले पापा को जरूरत है।
पापा पूरे घर की जिम्मेदारी उठाते हैं। उसकी पढ़ाई-लिखाई, कपड़े, स्कूल की फीस, घर के सामान सब कुछ तो वही करते हैं। उसने उनसे जो भी मांगा, पापा ने झटपट लाकर दिया।
पल-भर में उसका गुस्सा गायब हो गया। स्कूल में भी पूरे दिन वह पापा के बारे में सोचता रहा। उसे अपने कल के व्यवहार पर अब गुस्सा आ रहा था। उसने तय कर लिया कि अगर पापा उसका इतना ध्यान रखते हैं, तो उसे भी उनका ध्यान रखना चाहिए।
शाम को घर लौटते ही पापा ने उससे तैयार होने को कहा। वे उसे जूते दिलाने वाले थे।
‘पापा, मैं आपके साथ एक शर्त पर जूते लेने चलूंगा।’ प्रतीक ने कहा।
‘क्या बेटा? आज मैं तुम्हारे लिए जूते जरूर खरीदूंगा।’ पापा बोले ।
‘आप मेरे लिए नहीं, अपने लिए जूते खरीदेंगे। मेरे जूते अभी ठीक हैं। जूते की जरूरत पहले आपको है। अब मैं समझा कि क्यों आप मुझे अपने जूते छूने नहीं देते थे। पर अब मैं सब कुछ जान चुका हूं।’ प्रतीक एक सांस में बोल गया।
उसकी बात सुन कर पापा-मम्मी दोनों सन्न रह गए। प्रतीक की बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था। आखिर प्रतीक को पापा की बात माननी पड़ी। प्रतीक भी अब बहुत खुश था और वह पापा के साथ बाजार जाने की तैयारी करने लगा।
