मनीष वैद्य
यह अनायास ही था, करीब-करीब अप्रत्याशित-सा। न मैंने कभी ऐसी कोई कल्पना की थी और न उससे मिलने की मुझे कोई उम्मीद थी। इस तरह तो बिलकुल नहीं। मैं उसे भूला नहीं था, पर कभी शिद्दत से याद भी नहीं किया था। हां, जब कभी गांव को याद करता तो स्वाभाविक ही वह बाकी लोगों की तरह शामिल रहा करता। हो सकता है यह वह न हो। पर उसके पूरी तरह बदल जाने के बावजूद आंखें साफ-साफ देख रही थीं। मैं किसी रिश्तेदार का हाल जानने के बाद अपने शहर के बड़े अस्पताल की सीढ़ियां उतर रहा था। तभी मुझे वह दिखाई दिया। पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि वह यहां इस तरह कैसे हो सकता है! पर वह सुनील ही था। वह अस्पताल के बाहर पत्थर की बेंच पर बैठा था। उदास, अनमना और उजड़ा हुआ-सा। वह वार्ड के बाहर खिड़की पर नजरें गड़ाए हुए बैठा था। मैंने गौर से देखा, वहां इस तरह देखने की कोई वजह नहीं थी। दीवार अन्य दीवारों की तरह ही बदरंग और सपाट थी। दूसरी सरकारी दीवारों की तरह। वहां कोई तस्वीर या पोस्टर भी चस्पां नहीं था। मुझे लगा कि वह वहां कुछ नहीं देख रहा था। वह शायद अपने अंदर के किसी बंद तहखाने से निकलने की उम्मीद में वहां देख रहा था। वह इस तरह अपने ही भीतर कुछ खंगाल रहा हो या बाहर बहती हवा के टुकड़ों को फेफड़ों में भर लेना चाहता हो। उस पर मुझे हमदर्दी हो आई।
सुनील मेरा हमउम्र और सहपाठी। उसे देखते ही अनायास आंखों में तैरने लगते हैं वे सपनों से दिन, जब शायद हमारी छाती में उड़ने को पंख लगे थे और पैरों में घूमने को पहिए। वे दिन याद आते हैं, तो कुछ हरहराने लगता है हरी घास की तरह भीतर तक। जैसे कोई गीलापन बच गया हो बहुत अंदर। पर आज उसे देख कर नहीं लगा कि यह कभी वह सुनील भी रहा होगा। अपनी उम्र से दोगुना लग रहा था वह। उसके चेहरे पर सफेद और काले बालों की खिचड़ी दाढ़ी का जंगल उग आया था। सिर पर बालों का घोंसला। मानो कई दिनों से कंघा ही नहीं किया हो। आंखों में कीच और चीकट कपड़े। उसके कुरते-पायजामे पर जगह-जगह मिट्टी लगी हुई थी। माथे पर चिंता की लकीरें और आंखों में निराशा। मुझे लगा, दुख में हम सब कितने असहाय और कमजोर होते हैं। कैसे सूखे पत्तों की तरह कांपने लगते हैं। कैसे तड़कने लगती है हमारे नीचे की ठोस धरती। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, तो उसने मुझे चौंक कर देखा। वह कुछ नहीं बोला। बस मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बैठा रहा उसी तरह। मैं भी बोलने या कुछ पूछने की स्थिति में नहीं था। वहां आसपास अस्पताल का हल्ला था और उसके बीच हमारा मौन। फिर उसकी आंखों ने यह मौन तोड़ा। उन आंखों में इतनी पीड़ा और हताशा थी कि मैं ज्यादा देर तक उन्हें देख नहीं सका। गोया आंखों ने ही सारी बात कह दी हो। वह अब भी चुप था। पर उसकी आंखें बता रही थीं कि उसके भीतर कहीं समंदर पछाड़ें मार रहा है। आंखों से उड़ती हुई दुख और बेबसी की किर्चियां साफ दिख रही थीं। वहां उम्मीद की कोई धूप नहीं थी, सिवाय घने कोहरे के। मुझे लगा, उसकी आंखों से दुखों की कोई नदी अभी बहने लगेगी।
मैं उससे हाथ छुड़ा कर अंदर वार्ड में गया। वह उसी तरह वहीं बैठा रहा। एक छोटे से कमरे में बारह पलंग लगे थे। छह-छह की पट्टी में। तीसरे पलंग पर सुनील के पिता नीम बेहोशी में थे। वे बहुत कमजोर हो चले थे। उनके काले और झुर्रीदार चेहरे पर मुर्दानगी थी, जैसे जंग हारते किसी सैनिक का चेहरा। वे अपनी बीमारियों से किसी सैनिक की तरह ही तो लड़ रहे थे। पर अब जैसे लड़ने की ताकत चूकते जा रहे थे। फिर भी किसी उम्मीद की तरह बोतल की दवाई बूंद-बूंद उनकी नसों में बह रही थी। मैंने कभी उन्हें इस तरह नहीं देखा था। अंदर से बहुत नरम, पर ऊपर से बहुत सख्त। बचपन में कभी-कभी तो उनकी आंखों से ही डर लगता। हमेशा तेज-तर्रार, चुस्त-दुरुस्त। अब तक मैंने उन्हें काम में लगे हुए ही देखा था। हमेशा तड़कते-गरजते, आम पिताओं की तरह। वे हमेशा कुछ न कुछ करते ही रहते थे। सुनील का छोटा भाई उनके पैरों के पास बैठा था। मैं उन्हें इस तरह नहीं देख पाया और वहां से बाहर निकल आया। मुझे लगा कि अब इस कोहरे को छांट कर ही उसे बाहर लाया जा सकता है। मैंने उसे अपने साथ लिया। हम दोनों चलने लगे थे। कहां। उसे पता नहीं था, मुझे भी नहीं पता था। शायद उसके दुखों का घनापन दूर करने के लिए, पर कहां। यह रास्ता कहीं तो जाएगा। इसी आस में हम चुपचाप चल रहे थे जैसे कुछ भी कहने-सुनने से टूट जाएगा कुछ और बिखर जाएगा सब कुछ। सामने कैंटीन थी। मैं सोच रहा था। बीमारों के साथ आए लोग भी कैसे बीमार की तरह ही हो जाते हैं। रीते-मुरझाए चेहरे और आंखों में इंतजार। अस्पताल का ठंडापन मानो उनकी आत्मा तक फैल गया हो। हम कैंटीन के नल के पास खड़े हो गए। उसने मुंह-हाथ धोए, चुल्लू भर पानी पिया और शरीर पर पानी के छींटे मारे तो लगा जैसे वह लौट रहा हो उसी देह में। मैंने उससे चाय को पूछा, पर उसने मना कर दिया। हम फिर आगे बढ़ गए।
हमारे घर से कुछ ही दूरी पर था उसका घर। हम एक ही कक्षा में पढ़ते थे और कक्षा के बाद भी ज्यादातर साथ ही रहते थे। वह कभी मेरे घर आ जाता और कभी मैं उसके घर। हर शाम स्कूल के बाद हम उसके खेत पर चले जाते। वहां वह अपने परिवार वालों का हाथ बंटाता और हम इस बीच बातें भी करते रहते। अमरूद के दिनों में अमरूद और बेर के दिनों में बेर। वह घास काटता, उसके पूले बनाता फिर पीठ पर लाद कर उसे मेड़ से खले तक ले जाता। वह रात भर जाग कर ठिठुरता। जमीन की रगों में ठंडा पानी बहता रहता और ठंड बर्छियों की तरह उसकी मरियल देह की हड्डियों में चुभती रहती। वह फसल काटता, सब्जियां तोड़ लेता, सूखी लकड़ियां काट लेता। पेड़ों पर चढ़ जाता और वहां मधुमक्खियों को चकमा देकर शहद का छत्ता तोड़ लाता। वह बावड़ी में गंठा लगाता तो उसके तल से चीजें निकाल लाता। वह पत्थरों के नीचे से बिच्छु ढूंढ़ता और फिर किसी किमची या कीले से उनका डंक तोड़ देता। वह पक्षियों के अंडे पहचानता था। वह हाट-बाजार में सब्जी की दूकान लगा लेता और चिल्ला-चिल्ला कर ग्राहकों को पुकारता। वह छुट्टी के दिन अपने ढोर-डंगरों को लेकर बडले की तरफ निकल जाता और दिन भर उन्हें चराता। हां, पढ़ाई में जरूर वह थोड़ा पीछे रह जाता। उसे पता था कि कौन-सा बीज कितने दिन बाद धरती फोड़ कर बाहर आएगा और कब अनाज पकेगा। किस खेत में कितना पानी देना है और कब-कब। कौन-सी गाय कितना दूध देगी और कौन बछड़ा मरकंडा निकलेगा।
मेरे लिए बचपन में वह किसी सुपरमैन की तरह हुआ करता था। खेती, जंगल और जीव-जंतुओं का इन्सायक्लोपीडिया। तब हमारे पास न तो खेत बचे थे और न ही मुझे ऐसे कोई काम आते थे। मुझे उसके साथ खेत पर जाना और वहां उसे काम करते देखना अच्छा लगता था। वह ज्वार और बाजरे की मोटी-मोटी रोटियां कभी नमक-मिर्ची से, कभी इमली के कर्रों से तो कभी कच्ची कैरी या प्याज से ही खा लिया करता। खेत में सब्जियां होतीं, तो उसकी मां सब्जी बना देती, पर जब खत्म हो जातीं तो घर में भी सब्जियां बननी बंद हो जातीं। हमारे यहां दाल और सब्जी बनने के बाद भी सबकी अलग-अलग पसंद हुआ करती, पर उसके साथ ऐसा नहीं था। बाजार से दाल और सब्जियां लाने का उनके यहां न रिवाज था और न ही पैसा। गांव में पिता के जाने के बाद हमारे हाथ कुछ नहीं था। दो रोटी की उम्मीद में गृहस्थी की गठरी बांधे हम शहर आ गए थे। कई साल गुजर गए, पर कभी गांव जाने की इच्छा ही नहीं हुई और आज जब वह मिला, तो आंखों में फिर एक बार गांव तैर गया। अस्पताल से थोड़ी दूरी पर गुलमोहर का पेड़ लाल फूलों से दहक रहा था। नीचे दूर तक हरी घास थी। हम वहीं बैठ गए थे। वह पहले तो घास को तोड़ता रहा कुछ देर, फिर धीरे-धीरे खुलने लगा। उसने जो कहानी सुनाई, उससे मैं दंग रह गया था। कलेजा धक रह गया और सांसें ठंडी हो रही थीं। मैं उसे ढांढस बंधाना चाहता था, पर कहने की छाती नहीं चल रही थी। शब्द हलक में फंस रहे थे। सुनील के पिता के पास साढ़े चार बीघा जमीन थी और इसी पर उनके पूरे परिवार का दारोमदार था। यह खेती ही उनकी भाग्यविधाता थी। वे इसी में खुश थे। वे इसमें अपना पसीना बोते और सोना उपजाते। परिवार के लिहाज से यह बहुत कम था, लेकिन जिंदगी बसर हो रही थी। वे दिन-रात खेत पर काम में लगे रहते। ज्यादा होता तो घर के बाकी लोग भी जुट जाते। सबके जुटने-खटने के बाद भी उनकी हालत जस की तस थी। दो बेटियां ब्याह के मुहाने पर बैठी थीं। खरामा-खरामा कर्जे का आंकड़ा बढ़ता जा रहा था।
साहूकार वक्त-बेवक्त उधार तो अपनेपन से देता, पर थोड़े ही दिनों में खेत के कागज वह अपने नाम कराने का कानूनी नोटिस भेजता, तो सब कुछ समझ आ जाता। वे इनका सारा खेल और ब्याज का गोबर गणित बहुत अच्छे से समझते थे। गांव में पढ़े-लिखे लडके अब दलाल बन गए हैं। वे जमीनों के सौदों में कमीशन पर चमकदार गाड़ियों में घूमते हैं। उनके अपने तरीके हैं और अपना लालच। जो नहीं बेच रहे, उन्हें डरा-धमका या बरगला कर बिकवाई जा रही है। साहूकार उन्हें तरह-तरह से फंसाने की तुक-तान लगाते रहते। वे जानते थे कि ये सब खेत के पीछे हैं। सड़क से लगा है उनका खेत। सोने जैसा खेत भला किसके पेट में न खलता। लोग जाल फैलाते, पर अब तक वे उसमें फंस नहीं पा रहे थे। पर कब तक, उन्हें नहीं पता था। सुनील की निगाहें जमीन पर गड़ी थीं, मानो कुछ खोज रहा हो। जैसे उसे जमीन से किसी सवाल का जवाब नहीं मिल रहा हो। घास के कोनों को तोड़ते हुए वह बहुत धीमे-धीमे कुछ कह रहा था। जैसे उसकी आवाज किसी गहरे कुंए से आ रही थी। उड़ी-उड़ी। वह अपने कहे को किसी व्यवस्थित क्रम में नहीं कह पा रहा था। कहीं से भी कुछ कहता और कहते-कहते फिर किसी और छोर से कहना शुरू कर देता। कभी चुप हो जाता और फिर जमीन से बातें करने लगता। वह मुझसे बात कर रहा था या अपने आप से कहना मुश्किल था। मैं उसके बुदबुदाने, हाव-भाव और कुछ उसकी बातों से समझने की कोशिश कर रहा था। उसका मन वहां नहीं था, वह उस वक्फे में कहीं और घुमड़ रहा था। मैं उसकी हालत समझ सकता था। मैं जो कुछ समझ सकता था, रफ्ता-रफ्ता समझ रहा था। वह बता रहा था कि किस तरह पिता जिंदगी के भंवर में फंसते चले गए, अच्छे दिनों की चाह में उनके बुरे दिन भी कहीं गुम हो गए थे और उनकी जगह उग आए थे और भी बुरे दिन। ऐसा क्यों होता है हमारे साथ, हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी हमेशा हम ही ठगे रह जाते हैं। हम ही छले जाते हैं हमेशा। कैसा समय है यह। पिता सच कहते थे-‘हमें सबसे ज्यादा तकलीफ हमारे अपने सपने देते हैं।’ पर हमारे सपने भी तो हमारी ही तरह छोटे थे। बहनों की शादी, खेत को पानी और खंडहर घर की मरम्मत करने का सपना बड़ा है। शायद हमें सपने देखने ही नहीं चाहिए।मुझे याद है, सुनील के पिता अक्सर कहते थे- ‘नदी की बाढ़ और कर्जे की रफ्तार एक-सी होती है। जब घेर लेती है, तभी मालूम होता है। तब तक बचने के सारे रास्ते भी बंद हो जाते हैं। कर्जा साहूकार का हो या सरकारी। एक ही जैसा होता है। राई-रत्ती फरक नहीं। कर्जा लिया नहीं कि कर्जदार की छाती पर कर्जे के घोड़े दौड़ने लगते हैं। दिन में सफेद, तो रात में काले घोड़े।’
वे कहते थे- ‘हम सब इनकी टापें सुनते हैं, पर इन्हें रोक नहीं पाते। किसानों की छाती बहुत कट्ठी होती है। उसमें मिट्टी का सत होता है, पर इनकी टापें इतनी सख्त होती हैं कि उसे भी रौंद देती हैं। किसानी तो जुआ है। लग गया तो वारे-न्यारे और नहीं चला तो पासंग भी नहीं। एक तरफ साल-दर-साल का घाटा, बढ़ता हुआ कर्जा तो दूसरी तरफ, जमीन खरीदने को आतुर सेठ-साहूकार और उनके दलाल। किसान धरती से बंधे हैं, किसान के लिए जमीन उसकी मां है। पूरे देश में यही हो रहा है, पर किसी को कोई चिंता नहीं। सरकार और बैंकों की अपनी गति है तो अफसरों की अपनी। घर तो किसानों के उजड़ रहे हैं। वे जगह-जगह मर रहे हैं।’ सुनील का घर भी देख लिया था इन घोड़ों ने और उसके पिता की छाती भी। उसने सुबकते हुए कहा- ‘सरकार से कुएं के लिए कर्ज लिया था। आधा कुंए में, आधा अफसरों के पेट में। न कुआं ढंग से खोद सके, न पैसा कोई काम आया। पिता की छाती को रौंदते हुए ब्याज के घोड़े दौड़ रहे थे। कब तक दम भरते हम। नहीं बचा सके हम अपनी जमीन। पिता ने तबसे बिस्तर पकड़ लिया। उनका सब कुछ उजड़ गया था। सब उसी के साथ खत्म हो गया था।’ हमारी तंद्रा टूटी थी सुनील के छोटे भाई की चीख से। हम वार्ड में बदहवास दौडते हुए पंहुचे थे। सुनील के पिता सांस लेने के लिए बुरी तरह छटपटा रहे थे। सुनील और उसके छोटे भाई ने उनके शरीर को सहारा दिया। मैं डॉक्टर के केबिन की ओर भागा। डॉक्टर आते उससे पहले ही वे आखरी हिचकी ले चुके थे। उनके निर्जीव देह की आंखें खुली थीं। मुझे लगा कि उनकी आंखें कोई सवाल पूछ रही हों। मुझसे, सुनील से या हम सबसे। पर हम सबके पास कोई जवाब नहीं है।

