बहुत पुरानी बात है। एक गांव में दो सहेलियां रहती थीं। दोनों में खूब पटती थी। दोनों साथ-साथ खेलतीं, साथ-साथ खेत में काम करने जाया करती थीं। दोनों की एक ही दिन शादी हुई। दोनों एक साथ गर्भवती हुर्इं। दोनों ने आपस में वादा किया कि होने वाले बच्चों के बीच भी रिश्तेदारी हो जाए, ताकि उनकी दोस्ती और गहरी हो। अगर दोनों को लड़की हुई तो सहेली बनाएंगे, अगर लड़के हुए तो पक्के दोस्त और अगर लड़का-लड़की हुई, तो दोनों की शादी करवाएंगे।

कुछ समय बाद दोनों के बच्चे पैदा हुए। एक को लड़का और दूसरी को लड़की हुई। उनका नाम क्रमश: डमबोंग और खुप्तिंग रखा गया। उन दिनों कूकी जनजाति की परंपरा में स्त्रियां खेत में काम करने जाती थीं, पुरुष शिकार करने जाते थे, लड़के जंगल में लकड़ियां काटने और लड़कियां पानी भरने जाती थीं। ऐसी दिनचर्या के कारण दोनों सहेलियां अपने बच्चों की देखभाल बुजुर्गों को सौंप कर काम पर चली जातीं।

उस दिन सुबह-सुबह काम पर जाते समय वे बच्चों को अलग-अलग पालने में रख गई थीं। वापस आकर देखा की वे दोनों बच्चे एक ही पालने में हैं। यह देख कर दोनों मांओं को बड़ी हैरानी हुई।

दोनों बच्चे बड़े हुए साथ-साथ खेलने लगे, साथ-साथ खाने लगे। धीरे-धीरे दोनों जवान हुए और दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगे। दोनों का प्रेम अटूट और गहरा था।
डमबोंग के जवान होने के थोड़े ही दिनों बाद उसके पिता की मृत्यु हो गई। जिस कारण घर में गरीबी छा गई। इस कारण दोनों बच्चों की शादी के बारे में खुप्तिंग की मां का इरादा बदल गया। अब वह खुप्तिंग की शादी डमबोंग से नहीं करवाना चाहती थी। इधर दोनों का प्रेम सातवें आसमान को छूने लगा था और डमबोंग, खुप्तिंग की मां से उसका हाथ मांगने आया। पर उसने उसे मना कर दिया। उसकी मां ने डमबोंग की दुर्दशा, पारिवारिक स्थिति, गरीबी और लाचारी पर ढेर सारी उल्टी-सीधी बातें सुनार्इं। काफी प्रयत्न के बावजूद डमबोंग को आखिरकार निराशा ही हाथ लगी।

पर डमबोंग ने हार नहीं मानी। एक दिन वह खुप्तिंग को लेकर भाग गया। भागते-भागते वे जंगल पहुंच गए। मौसम खराब था बारिश होने लगी। दोनों सुरक्षित स्थान ढूंढ़ते रहे। बारिश तेज होने लगी। अंत में दोनों को पेड़ के नीचे बड़े-बड़े पत्तों से सिर ढंक कर खुद को बचाना पड़ा। खुप्तिंग की दशा देख कर डमबोंग को अपराधबोध हो रहा था। क्योंकि उसी की वजह से खुप्तिंग को इस बारिश में इतनी तकलीफ सहनी पड़ रही थी।

सप्ताह भर बाद दोनों गांव लौट आए। खुप्तिंग की मां बहुत गुस्से में थी। सबके सामने उसने खुप्तिंग को जोर से थप्पड़ मारा और बाल पकड़ कर घसीटती हुई घर के भीतर ले गई। डमबोंग को बहुत दुख हुआ, गांव वाले भी बड़े दुखी हुए। खुप्तिंग की मां ने बेटी को डांटते हुए कहा कि डमबोंग अनाथ है, गरीब है, वह तुझे क्या दे पाएगा? कभी खुश नहीं रख पाएगा। मैं उससे तुम्हारी शादी हरगिज नहीं होने दूंगी। अगले जन्म में भी नहीं। दरअसल खुप्तिंग की मां पहले नहीं जानती थी कि डमबोंग के घर वाले जादू-टोना करते हैं।

खुप्तिंग मन ही मन सोच रही थी कि अब वह डमबोंग से अलग नहीं रह पाएगी। वह अपनी मां की बात याद करके अपने भाग्य को कोसने लगी। उसकी मां ने धमकी दी कि अगर वह दोबारा उसके साथ भागी तो मां का मरा मुंह देखेगी। खुप्तिंग मां को भी खोना नहीं चाहती थी। डमबोंग ये सारी बातें छिप कर सुन रहा था। खुप्तिंग ने खाना-पीना छोड़ दिया, वह लगातार कमजोर होती जा रही थी। एक दिन वह घनघोर बीमार पड़ गई, दवाई खाने पर भी असर नहीं हो रहा था। वह डमबोंग से मिलना चाहती थी। आखिरकार मां को डमबोंग को बुलाना पड़ा।

डमबोंग के आने से खुप्तिंग की तबीअत में थोड़ी सुधार हुई। जब डमबोंग वापस गया तो साथ में खुप्तिंग का बाल ले गया। रास्ते में डजाम नामक नदी पड़ती थी। डमबोंग ने एक ढक्कन बंद डिब्बे के अंदर खुप्तिंग के बाल रखे। फिर उसे धागे से कहीं बांध कर नदी के किनारे भीगने के लिए रख दिया। इससे खुप्तिंग बार-बार बीमार पड़ती थी और डमबोंग को उससे मिलने का मौका मिल जाता था। जब उसे बुलाया जाता था, वह उस भीगे बाल को खुप्तिंग के बाल से लगाता था और वह ठीक हो जाती थी।

एक दिन रोज की तरह उसने बाल वैसे ही नदी किनारे बांध कर रखा। उस रात बारिश हुई और बाढ़ आ गई। वह डिब्बा बाढ़ में बह गया। सुबह उठ कर डमबोंग ने देखा कि वह डिब्बा बह चुका था। इसका अंजाम वह जानता था कि खुप्तिंग की मृत्यु निश्चित है। वह बहुत पछताया और अपने आपको दोष देने लगा।

खुप्तिंग की मृत्यु के बाद उसकी मां डमबोंग के सच्चे प्यार को पहचान पाई। इसलिए अब वह छोटी बेटी का हाथ उसे देना चाहती थी। डमबोंग ने उसका वह प्रस्ताव ठुकरा दिया। डमबोंग अब दुखी-दुखी रहता था, किसी से बात नहीं करता था। उसने डमबोंग की कब्र के पास रात की रानी फूल का पौधा लगाया। पौधा बड़ा हुआ, फूल खिलने लगे थे। रात के समय कोई चुपके से उस फूल को तोड़ कर ले जाता था। ऐसा रोज होने लगा। डमबोंग ने छिप कर देखा कि एक जंगली बिल्ली उसमें से फूल को तोड़ कर ले जाता थी।

एक दिन डमबोंग ने बिल्ली से पूछा। फिर जब उसे मारने पर आमादा हुअ तो उसने खुप्तिंग का नाम लिया। नाम सुन कर वह रुक गया। उसने बताया खुप्तिंग के कहने पर ही वह फूल तोड़ने आती है।

डमबोंग ने खुप्तिंग के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह यमलोक में रहती है। डमबोंग उससे मिलना चाहता था। इसलिए उसने जंगली बिल्ली के साथ जाने का निर्णय किया। बिल्ली ने बताया कि उस जगह जाने के लिए उसे रास्ते में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। जान को भी खतरा हो सकता है। इन सब की परवाह किए बिना डमबोंग खुप्तिंग से मिलने चल पड़ा।

रास्ते भर कड़ी धूप, बारिश, बाढ़, आंधी आदि झेल कर वह अपने मंजिल तक पहुंच गया। खुप्तिंग से मिलने के बाद वह भूल गया था कि वह अब यमलोक पहुंच चुका है। उसे किसी का डर नहीं था। खुप्तिंग उसे देख कर बहुत खुश हुई, पर उसने उसे समझाया कि उनका मिलन इस प्रकार संभव नहीं है, क्योंकि अब वह डमबोंग की तरह जीवित नहीं है। डमबोंग ने जवाब दिया कि अगर मैं भी तुम्हारी तरह मर जाऊं तो हमें मिलने से कोई नहीं रोक सकता। खुप्तिंग नहीं चाहती थी कि डमबोंग अपनी जान गंवाए। लेकिन डमबोंग की जिद के आगे खुप्तिंग को उसकी बात सुननी पड़ी।

आखिरका खुप्तिंग ने उससे कहा, घर वापस जाकर लोगों को बड़ी दावत दो। लोगों में हमारी होने वाली मिलन की खुशियां बांटो और सबका आशीर्वाद लेकर आओ। उस रात हमारा मिलन होगा। मणिपुरी जनजातियों (कुकी, नगा) में शादी के समय बड़ी दावत देने की परंपरा हैं, जो आज भी चली आ रही है। डमबोंग की बड़ी दावत से सब लोग हैरान थे, क्योंकि दावत का कारण कोई नहीं जनता था। उस रात डमबोंग ने खुप्तिंग की बताई हुई योजनाओं के अनुसार पेट भर खाना खाया और बड़ों से आशीर्वाद लिया। उसने अपना बिस्तर ठीक छत के नीचे रखा। वहां एक नुकीला भाला रखा जो आसानी से गिरने पर सीधा उसके पेट में चला जाए और वह मर जाए। डमबोंग उसी बिस्तर पर सोया और आधी रात में खुप्तिंग चील बन कर आई, भाला को धक्का दिया, भाला नीचे गिरा, डमबोंग के पेट में भाला घुस गया, और वह मर गया। इस प्रकार खुप्तिंग और डमबोंग का मिलन मृत्यु के बाद हो पाया।
जीवित रहते वे नहीं मिल पाए, पर मृत्यु के बाद दोनों अपनी ‘प्रेमकथा’ को अंजाम दे पाए और अपनी ‘प्रेमकथा’ को अमर बना दिया।

(चिंगनेइ सांङ्)