महावीर राजी
रेलवे स्टेशन से निकल कर ‘स्टेशन सरणी’ शहर के बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेरशाह सूरी मार्ग’ को जिस जगह लंबवत काटती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के व्यस्ततम चौराहे में तब्दील हो गई है। ‘प्रेमचंद चौक’ की कलंगी लगाए इस चौराहे के बीच में फूल-पौधों की क्यारियों से सजा छोटा-सा वलयाकार उपवन है। उपवन के मध्य में छह फुटिया बेदी पर ब्लैक स्टोन पर उकेरी मुंशी प्रेमचंद की स्कंध प्रतिमा! प्रेमचंद चौक की स्थिति एलओसी की मानिंद हो गई है। चौड़े चिकने चमचमाते ‘शेरशाह सूरी मार्ग’ के दोनों ओर बड़े बड़े शोरूम, मॉल, बैंक, सरकारी कार्यालय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की लंबी शृंखला वाला इंडिया! इसके उलट स्टेशन रोड की पतली उबड़-खाबड़ सरणी के किनारे बसा ग्रामीण परिवेश से कदमताल मिलाता सब्जियों, फल, जूस, सस्ते रेडीमेड वस्त्र, पुरानी पत्रिकाओं और मर्दानगी की जड़ीबूटी बेचते फुटकर विक्रेताओं की छोटी-छोटी गुमटियों और ठेलों की कतारों वाला भारत! दोनों के संधिस्थल पर किसी बिजूके की तरह निरीह से खड़े प्रेमचंद समय और समाज की छाती पर बेआवाज पड़ती वैश्वीकरण की थापों को टिमटिमाती आंखों से महसूस करते रहते। झुमकी स्टेशन के उस पार लाइन के सामांतर बसी झुग्गी बस्ती में रहती थी। झुमकी के बाद उसकी तीन और बहनें थीं। झुमकी चार साल की रही होेगी कि उसका पिता गुजर गया। उसकी मौत के बाद सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया। मां ने बड़ी मुश्किल से दो घरों में चौका-बासन का काम पकड़ा। झुमकी के लिए तीसरे घर की तलाश में बहुत हाथ-पांव मारे, पर सफलता नहीं मिली। हार कर झुमकी ने भीख मांगने का आसान काम अपना लिया। झुमकी सुबह घर से निकलती तो रास्ते में संन्यासी मोड़ के पास बच्चों का स्कूल पड़ता। स्कूल में बच्चों को खेलते-कूदते और पढ़ते देखती, तो हसरत से उसकी आह निकल जाती। कुछ देर के लिए पांव अनायास थमक जाते। बच्चों को टकटकी लगाए देखते हुए कल्पना में वह भीतर जाकर उनमें शामिल हो जाती।
स्कूल के बाहर गेट के पास एक पीपल का पेड़ था। तने पर ऊपर की ओर विज्ञापन वाला बोर्ड टंगा था- ‘सर्वशिक्षा अभियान’। उसकी नजरें बोर्ड की ओर उठ जातीं। बोर्ड पर दो नन्हे बच्चे सवार थे। मासूम चेहरों पर चटक धूप-सी खिली मुस्कुराहटें! कंधों पर स्कूल बैग! हाथ हवा में फैले हुए- ‘चलो स्कूल चलें हम’। मन तो उसका भी बहुत कर रहा है स्कूल जाने का। पर घर के हालात उसे रोक रहे हैं। एक मुट्ठी खिचड़ी से पांच जन के पेट का कुंआ नहीं भरने वाला। मां की आमदनी इतनी नहीं की पूरा पड़ जाए। उसका चेहरा विद्रूप होकर रह जाता। तब वह खुद को तसल्ली देने लगती कि बोर्ड पर चित्रित उन बच्चों का आमंत्रण एक ढोंग है। स्कूल जाना उन जैसियों की तकदीर में नहीं है।
बाजार में आने के बाद सबसे पहले झुमकी प्रेमचंद की बेदी के पास आती। पूरी श्रद्धा से उन्हें प्रणाम करती। उसकी नजर में प्रेमचंद एक सिद्ध महात्मा थे और उनके आशीर्वाद के बिना सफलता नहीं मिलाने वाली।
झुमकी ने स्टेशन के कंगूरे पर टंगी घड़ी की ओर तिरछी नजरों से देखा। ढाई बज रहे थे। अंय, ढाई बज गए! इतनी जल्दी! समय जानते ही पेट के भीतर बैठे चूहे चीं चीं करने लगे। उसने बस्ती की ओर कदम बढ़ा दिए। चलते हुए फ्रॉक की जेब में हाथ डाल कर सिक्कों को टटोला। चेहरे पर आश्वस्ति की चमक बिखर गई। बेदी की ओर मुंह करके बड़बड़ाई- ‘सब आप ही के प्रताप से हुआ है महराज!’
तभी पांडेयजी के ठेले पर एक ग्राहक दिख गया। आम का मौसम था। पांडेयजी के ठेले पर आम सजे हुए थे। रस से सराबोर पके लंगड़ा आम। मीठी महक से पूरा परिवेश महका हुआ था। झुमकी की आंखों में चमक तैर गई। आम का खरीददार! संभ्रांत वेश-भूषा! तेज-तेज चल कर ठेले तक आ गई और एक दूरी बना कर उस पल का इंतजार करने लगी जब ग्राहक आम ले चुकने के बाद भुगतान के लिए जेब से पर्स निकालेगा। इंतजार के उन्हीं कुछ बैचेन क्षणों के दौरान नजरें ठेले पर रखे आमों की ढेरी का मुआयना करने लगीं। जैसे हरे रंग में केसरिया तड़का डाल दिया गया हो, वैसी ही रंगत लिए एक पर एक धरे लंगड़ा आम! ढेरी से दूर ठेले के कोने में दो-तीन पिलपिले आम पड़े थे। उनका रंग काला पड़ चुका था।
झुमकी की नजरें उन पिलपिले आमों पर ठहर गर्इं। पहले ऐसा हो चुका है कि जब ऐसे बहिष्कृत आमों के खरीददार नहीं मिलते, तो पांडेजी उन्हें झुमकी को दे देते थे। अब उन्हें कोई नहीं खरीदेगा। न हो तो ग्राहक के विदा हो जाने के बाद वह खुद ही पांडे बाबा से इन आमों को मांग लेगी। आम पा लेने की क्षणिक-सी उम्मीद जगते ही आंखों में लालसा की एक चमक तैर गई।
तभी झुमकी ने देखा कि ग्राहक भुगतान करने के लिए पर्स निकाल रहा है। झुमकी लपक कर ग्राहक के पास जा पहुंची और हथेली आगे फैला दी।
‘क्या है रे!’ ग्राहक ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा। निहार में दुत्कार नहीं सहानुभूति का पुट घुला हुआ था- ‘भीख चाहिए?’
झुमकी ने हां में सिर हिला दिया।
‘ठीक है।…’ ग्राहक भी संभवत: फुर्सत में था। चुहल करते हुए बोला- ‘बोल… भीख में पैसे चाहिए या आम?’
आम की बात सुन कर झुमकी के मन में लालसा फुफकार उठी। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। कल्पना में आम का रसीला स्वाद उतर आया। उसने डरते हुए तर्जनी उठा कर ठेले के कोने में पड़े परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया।
‘मुंह से बोल ना रे छौड़ी!’ ग्राहक हंसा- ‘क्या गूंगी की तरह इशारे में बतिया रही है।’
झुमकी चुप रही।
‘अरे बोल न, क्या लेगी- आम या पैसे?’
झुमकी ने फिर भी मौन साधे रखा और डरते हुए पहले की ही तरह उन आमों की ओर संकेत कर दिया।
‘जब तक मुंह से नहीं बोलेगी, कुछ नहीं देंगे।’ ग्राहक झुंझला उठा। झुमकी सहम गई। चाह कर भी मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे। इसलिए फिर से मौनी बाबा की तरह वही संकेत!
‘धत्त तेरे की…।’ ग्राहक फनफनाते हुए बमक पड़ा- ‘सरकार दलितों, गरीबों, अंत्यजों की पूजा-आरती में बावली हुई जा रही है। उन्हें हक और जमीर के लिए लड़ने को उकसा रही है। और ई छौड़ी है कि सरकार बहादुर की नाक ही कटवाने पर तुली हुई है, हुंह! अरे अब तो रिरियाना छोड़ कर हक से मांगना सीखो।’
‘हां रे झुमकी। साहब ठीके तो कह रहे हैं। मुंह से बोल दे न, आम चाहिए कि पैसा।’ पांडेयजी उसे प्रोत्साहित करते हिनहिना दिए।
‘हम तो चले पांडेयजी…।’ ग्राहक खीजता हुआ आम वाला बैग उठा कर चलने को मुड़ गया। झुमकी धक से रह गई और तभी उसके कंठ से एक महीन किंकियाहट गूगली की तरह उछल कर बाहर आई- ‘आम…।’ अधमरी बेजान सी आवाज! ग्राहक के होंठों पर विजयी मुस्कान चस्पां हो गई। वह वापस दुकान पर आ गया- ‘ई हुई न बात…।’
ग्राहक ने अपने बैग से एक आम निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया- ‘ले रख ले।’
ग्राहक के बढ़े हाथ को देख कर झुमकी स्तब्ध रह गई। ताजा और पका नया आम दे रहा है ग्राहक बाबू! मजाक तो नहीं कर रहा? एक पल मौन रखने के बाद इंकार में सिर हिलाते हुए उसने तर्जनी से उन परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया।
‘छी:…’ ग्राहक खिलखिला कर हंस पड़ा- ‘अरे, समकालीन साहित्य के स्त्री और दलित विमर्श की नायिका है तू। बदबूदार आम तुझे शोभा देंगे? न… न..! इसे रख।’
झुमकी ने फिर भी इंकार में सिर हिल दिया। तर्जनी उन्हीं आमों की तरफ उठी रही। मुंह से बोल नहीं फूटे।
‘अजीब खब्ती है रे तू…।’ ग्राहक झुंझला उठा। वह फनफनाया- ‘हम अपनी मर्जी से न दे रहे हैं ई आम। इतनी सरकारी योजनाएं, इतने फंड, इतने अनुदान…! सारी कवायदें तुम लोगों को ऊपर उठाने के लिए ही न हो रही हैं? इन सरकारी कवायदों में एक छोटा-सा सहयोग हमरा भी, बस!’
‘हम भिखारी हैं सर। अच्छा आम हमरी तकदीर में नहीं लिखा। ऊहे आम नीक रहेगा।’
‘देखा पांडेयजी…!’
‘एक बात है सर…’- हथेली पर खैनी मलते हुए पांडेयजी बोले- ‘दलितों के लिए सारे सरकारी अनुदान, योजना और फंड के पैसे राजधानी से ऐसे कार्टून में भर कर लदान किए जाते हैं, जिसके तल में बड़ा-सा छेद बना होता है। सारा कुछ रस्ते में ही रिस जाता है और कार्टून जब इन लोगों के दरवाजे आकर लगता है, तो पूरा का पूरा छूछा…! हा हा हा…!’
‘कुछ हद तक ठीक है आपकी बात पांडेयजी…।’ ग्राहक भी हंसे बिना नहीं रह सका- ‘पर इसमें सारा दोष सरकार को देना भी ठीक नहीं। दोष इन लोगों का भी है। इन लोगों को भी तो अपना हक बूझना होगा, उसको पाने के लिए हाथ-पांव चलाना होगा। मतलब, हक बचाने की पहल तो इन लोगों को ही न करनी है। एक बार तन कर देखें तो… सारे हक मिलते चले जाते हैं कि नहीं?’ ग्राहक आगे बढ़ा और आम को झुमकी की हथेली पर रखते हुए हिनहिनाया- ‘तकदीर, मुकद्दर, भाग्य… सब बेकार बातें हैं रे। जरूरी है हक को बचाने के लिए लड़ाई की पहल। देख, अब इस आम की मालकिन तू हुई। यह पूरी तरह तेरा है। अब इस पर तेरा हक है। तकदीर तेरी मुट्ठी में कैद हो गई कि नहीं?’
आम थामी झुमकी की हथेली थरथरा रही थी। आम की साफ पुखराजी रंगत और उसका खरगोश-सा मुलायम स्पर्श रोमांचित भी कर रहा था। पर आंखों में अविश्वास और भय दुबका हुआ था।
ग्राहक अपनी राह चला गया। झुमकी चुपचाप धीरे-धीरे घर को जाने वाली राह पर बढ़ने लगी। उसे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि हथेली में ताजा लंगड़ा दुबका हुआ है। चलते-चलते अचानक रुकी और एक ओर खड़ी होकर आम को भरपूर नजरों से निहारने लगी। निहार में एक साथ आश्वस्ति, प्यार और तृप्ति के कई रंग घुले हुए थे। ताजा पका आम पहली बार झोली में आया है। कदम तेजी से बस्ती की ओर बढ़ने लगे।
स्टेशन लांघ कर कदम कब लाइन-पार आ गए और देखते-देखते संन्यासी मोड़ का स्कूल कब आ पहुंचा, झुमकी को पता ही नहीं चला। स्कूल से कुछ आगे बार्इं ओर की पतली गली में मुड़ी ही थी कि सामने इंस्पेक्टर निमाई बाबू जिन्न की तरह प्रकट हो गए। खाकी वर्दी! हाथ में रूल! आंखों में लोमड़-सी चमक! खाकी वर्दी देख कर न जाने क्यों झुमकी की जान सूखने लगती थी। इस बार भी वही हुआ। भीतर ही भीतर कलेजा धकधक करने लगा।
‘का रे झुमकी?’ निमाई बाबू ने खींसे निपोर दिए- ‘धंधा से लौट रही?’
‘हां सर… एही बखत तो लौटते हैं रोज।’ झुमकी मन ही मन फनफना उठी। वह एहतियात बरतते हुए आम को पीछे ले जाकर फ्रॉक तले छिपाने का प्रयास कर रही थी कि निमाई बाबू की गिद्ध नजरों ने ताड़ लिया।
‘क्या छिपा रही रे…?’ निमाई बाबू ने झपट कर उसके हाथ को आगे किया। आम देखते ही उनकी आंखें विस्मय से फैल गर्इं- ‘ऊरी बाबा, लंगड़ा आम! वो भी एकदम ताजा!’
आम को अपने कब्जे में करने में निमाई बाबू को एक पल भी नहीं लगा। ‘कहां से मिला रे?’
‘एगो साहेब ने भीख में दिया सर…।’ सफाई देते हुए झुमकी की जुबान लड़खड़ा गई। निमाई बाबू की आंखों में अविश्वास सिमट आया। फिर हो हो करके हंस पड़े- ‘इतना सुंदर और ताजा आम भीख में! असंभव! सच सच बता… किसी दुकान से पार किया न?’
‘नहीं सर…।’ झुमकी की सांसें रुकने-रुकने को हो रही थीं- ‘पांडेय बाबा की गुमटी पर एक ग्राहक ने दिया। उनसे पूछ लें।’
निमाई बाबू ने आम का एकदम करीब से अवलोकन किया। नाक के पास लाकर भरपूर सांस खींची तो नथुनों के भीतर रसीली महक के साथ-साथ लोलुप चमक भी रेंग गई।
‘एई…’- निर्णय लेने में एक पल लगा- ‘हर चोर चोरी पकड़े जाने पर यही बोलता है। यह आम भीख का नहीं, चोरी का माल है।’
‘हम झूठ नई बोल रहे सर, सच बोल रहे। आप पांडेयजी से पूछ लें।’
‘पूछने का कोई दरकार नेई। ये चोरी का माल है। थाना में जमा होगा।’ निमाई बाबू कुटिलता से मुस्कराए।
‘हम चोरी नहीं किए…।’ झुमकी के हौसले पस्त होते जा रहे थे।
‘चोप्प! जबान लड़ा रही है? जब हम बोल रहे कि चोरी का माल है तो बस है।’
‘हमारा यकीन करें सर…।’
‘बोला न चोप्प! एक भी शब्द बोला तो लॉकअप में बंद कर देगा, बूझा? प्रमाण लाना होगा। प्रमाण लेके आओ, तब मिलेगा।’ झुमकी स्तब्ध खड़ी रही। प्रमाण? हुंह! भीख का प्रमाण मांग रहे। बाजार की दुकानों से और बस्ती से दैनिक वसूली करते हैं, उसका प्रमाण मांगा जाए तो…? तो दे सकेंगे? ग्राहक बाबू से कितना बोली थी ऐसे सुंदर आम उन जैसों की तकदीर में नहीं होते। उन्होंने नहीं माना। सरकारी योजनाओं के हवाले दे डाले। उसके चेहरे पर स्याह मायूसी पुत गई। तभी उसकी आंखें धुंआने लगीं। क्या वाकई सब कुछ इतनी आसानी से फुस्स हो जाने दे? ग्राहक बाबू ने कहा था न कि हक पाने और बचाने के लिए चौकन्ना रहने के साथ-साथ हाथ-पांव चलाते हुए संघर्ष की पहल करना जरूरी है। पहल! इस मौजूदा स्थिति में पहल के क्या विकल्प हैं भला? वह नन्ही जान! लंबे-तगड़े निमाई बाबू से हाथापाई करके जीत सकती है? आम छीन कर दौड़ भी पड़े तो निमाई बाबू लपक कर पकड़ लेंगे। आम तो जाएगा ही, भरपूर पिटाई भी हो जाएगी। तब…? उसके दिमाग में कई अजब-गजब युक्तियां कौंध रही थीं। कोई तो पहल करनी ही होगी हक को बचाने के लिए। एकदम आसानी से सब कुछ फुस्स नहीं होने देगी वह। अचानक उसके भीतर एक कौंध हुई। कलेजा धकधक करने लगा। निमाई बाबू आम पा जाने की खुशी में बौराए से तनिक असावधान तो थे ही। झुमकी ने चीते की तरह लपक कर उनके हाथों से आम को कब्जे में लिया और पूरी ताकत से आम पर दांत गड़ा दिए।
