नीरजा हेमेंद्र
मैं बैंक पहुंच कर अपने काम में व्यस्त हो गई। बैंक में जब कुछ सहकर्मियों ने बधाई दी तो याद आया कि आज मेरा जन्मदिन है। जीवन की आपाधापी में आज का दिन मैं विस्मृत कर बैठी थी। जबसे सहकर्मियों ने जन्मदिन की याद दिलाई है, तब से मन अशांत-सा है। बैंक से घर आकर पर्स और लंच बॉक्स मेज पर रख, अंजली से चाय बनाने को कह कर मैं सीधे बाथरूम में चली गई। मेरी छोटी बहन अंजली एक महिला कॉलेज में लाइब्रेरियन है। उसका कॉलेज बंद होने का समय मेरे बैंक बंद होने से पहले है, इसलिए वह मुझसे पहले घर में उपस्थित रहती है। अंजली के घर में रहने से मुझे बड़ी राहत मिलती है। घर खुला मिलता है। घर खुला मिले तो घर में ताजी हवा और रोशनी रहती है। बंद घर खोलने पर कुछ समय तक कमरे का वातावरण दमघोंटू-सा रहता है। यों भी बंद घर खोल कर प्रवेश करने में मुझे न जाने क्यों अकेलेपन की अनुभूति होती है। बाथरूम के शीशे में स्ंवय को देखते हुए मैं सोचने लगी कि घर से बैंक और बैंक से घर की दिनचर्या में समय कब इतना आगे बढ़ गया कि मुझे आभास तक न हुआ कि मैं उम्र की तिरपन सीढ़ियां पार कर चुकी हूं। उफ्फ! तिरपन वर्ष? यह तो समय की एक बड़ी अवधि है। मैंने दर्पण में स्वंय को देखा जैसे पहली बार देख रही होऊं। काले-सफेद खिचड़ी बाल, आंखों के चारों तरफ स्याह घेरे, नाक पर चश्मे का भूरा निशान, निस्तेज चेहरा। क्या यह मैं ही हूं? अब से पहले तो मैं ऐसी नहींं थी, या कि अपने को इससे पहले ध्यान से देखा ही नहीं था, या उस दृष्टि से देखने की आवश्यकता ही न पड़ी हो, जैसे आज देख रही हूं। सत्य यही है कि आज की दृष्टि से अपने को इससे पहले मैंने नहींं देखा था। इस अवधि में जीवन में क्या पाया? मैं सोचने लगी। हाथ-मुंह तो कब का मैं धो चुकी थी, पर आज दर्पण के समक्ष खड़े होकर स्वयं से बातें करने का मन हो रहा था। ‘आखिर क्या पाया मैंने इस लंबी अवधि में? क्यों मैं उम्र के इस पड़ाव पर किसी अनजाने भय से भयभीत रहने लगी हूं? पहले तो मैं ऐसी नहींं थी? पहले क्या था मेरे पास और आज क्या नहीं है?’ अनेक प्रश्न, अनेक आशंकाएं व्याप्त होती जा रही हैं।
‘दीदी, चाय ठंडी हो रही है।’ अंजली ने आवाज दी। विचारों पर विराम देते हुए मैं शीघ्रता से बाथरूम से बाहर आ गई। मेरी चाय अंजली ने डायनिंग टेबल पर रख दी और अपनी चाय लेकर टीवी के सामने बैठ गई। अंजली को इस प्रकार आनंद के साथ चाय पीते हुए देख कर मुझे अच्छा लग रहा था। मैं डायनिंग टेबल पर बैठ कर चुपचाप चाय पीने और अंजली को देखने लगती हूं। घर के अधिकतर काम प्रतिदिन ऐसे ही संवादहीनता के बिना होते हैं, यंत्रवत। मेरी चाय खत्म हो चुकी है, पर विचारों का प्रवाह थम नहीं रहा है। इस घर में मैं और अंजली ही तो रहते हैं। मेरे तीन अन्य भाई भी हैं, जो इसी मकान के तीन अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। मेरे साथ मेरे भाई नहीं रहते या यों कहें कि मैं भाइयों के साथ नहीं रहती। मैं और अंजली इस बड़े से मकान के सबसे किनारे वाले छोटे हिस्से में साथ रहती हैं। अंजली और मेरी उम्र में दस वर्ष का अंतर है। तीनों भाई मुझसे छोटे हैं। अंजली हम सबसे छोटी है। मुझे याद आते हैं बचपन के वे दिन- मैं और अंजली एक ही स्कूल में पढ़ते थे। घर से एक साथ निकलते थे। अंजली प्राइमरी कक्षाओं की ओर मुड़ जाती थी, मैं इंटरमीडिएट की। स्कूल छूटने पर हम एक साथ घर आते थे। शुरू से ही अंजली भावनात्मक रूप से मुझसे जुड़ती चली गई थी। स्कूल में कोई समस्या होती तो वह सीधे मेरे पास आती। घर में किसी अन्य से अपनी कोई समस्या नहीं कहती। न मां-पिता जी से न भाइयों से। मुझे अब तक याद हैं कॉलेज के शुरू के वे दिन, जब अंजली मेरे साथ मेरी ही कक्षा में बैठना चाहती थी। बड़े यत्न से मैं उसे समझा कर उसकी कक्षा में पहुंचा कर आती थी। जब वह कुछ बड़ी होने लगी तो घर में सबसे अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहती कि ‘मैं भी बड़ी होकर अनामिका दीदी की तरह बनूंगी, बड़ी कक्षा में पढूंगी, प्रथम आऊंगी।’ उसकी बातें सुन कर मैं मुस्करा पड़ती। आज भी मैं मुस्करा पड़ती हूं हृदय में उठती एक गहरी टीस के साथ कि अंजली का भाग्य मेरे भाग्य से कितना मिलता-जुलता है। वह कुछ-कुछ मेरे जैसा ही भाग्य लेकर आई है।
अपनी शिक्षा पूरी कर मैं नौकरी की तैयारियों में व्यस्त हो गई थी कि एक दिन अकस्मात पिताजी के शरीर के दाहिने अंग ने काम करना बंद कर दिया। वे चलने-फिरने में असर्मथ हो गए। मां पर घर के कामों के अलावा पिताजी की देखभाल का उत्तरदायित्व भी आ गया। वे घर में ही व्यस्त होती गर्इं तथा पिता जी के साथ सामाजिक रूप से निष्क्रिय। लोगों के मुंह से मैंने सुना कि मैं विवाह योग्य हो गई हूं। लोग कहते रहे, समय मेरी उम्र को लेकर आगे बढ़ता रहा। इस बीच मुझे बैंक में नौकरी मिल गई। पिताजी का पूरा जीवन वीलचेयर तक सिमट गया। देखते-देखते मेरे तीनों भाई भी शिक्षा पूरी कर नौकरियों पर लग गए। हम सबको आत्मनिर्भर होते देख पिताजी के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि के भाव छलक पड़ते। मैं घर में सबसे बड़ी थी। शादी, पर्वों या अन्य किसी बुलावे पर मां-पिताजी मुझे ही रिश्तेदारों के घर भेजते। अंजली मेरे साथ होती। सभी मुझे अपने घर बुलाते, मेरे घर आते पर मैंने किसी भी परिचित को अपने लिए विवाह का प्रस्ताव लाते नहीं सुना। जबकि सभी मेरी व्यवहार कुशलता और हंसमुख स्वभाव के प्रसंशक थे, उनके घरों में विवाह योग्य लड़के भी थे। इसका कारण मैं अपनी साधारण शक्ल-सूरत को समझती। एक-एक कर मेरे तीनों भाइयों का विवाह हो गया। मेरे चेहरे पर समय ने लकीरें खींचनी शुरू कर दी थीं। ऋतुएं आती-जातीं और उनके साथ मौसम भी परिवर्तित हो जाते। कभी गर्म तपिश भरे दिन, तो कभी बफीर्ली ठंड लिए शीत ऋतु। शुरू से ही मुझे मेरे घर के सामने का अमलतास का वृक्ष आकर्षित करता। तेज गर्मियों में जब हरियाली सूखने लगती, सृष्टि बियावान, उजाड़-सी दिखाई देती, तब यह अमलतास का वृक्ष पीले फूलों से भर जाता। सृष्टि में फैले सूनेपन को अपने आर्कषक पुष्पों से भर देता। उसकी इसी विशेषता के कारण मैं गर्मियों में बालकनी में खड़ी देर तक इस वृक्ष के सौंदर्य को निहारा करती।विवाह की मेरी उम्र निकल चुकी थी, पर अंजली विवाह की उम्र को छूने लगी थी। उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी थी। एक वर्ष घर में रहने के बाद अकेलेपन से ऊब कर उसने अपने लिए नौकरी तलाशनी शुरू कर दी थी। उसने एक बालिका डिग्री कॉलेज में लाइबे्ररियन की नौकरी प्राप्त कर ली। उसके दिन कॉलेज और रातें घर में कटने लगीं। घर में आने-जाने वाले रिश्तेदारों से बेटियों के लिए रिश्ते बताने के लिए कहते-कहते पिताजी एक दिन इस दुनिया से चले गए। पिताजी के निधन के बाद मां अस्वस्थ रहने लगीं। भाइयों के अपने-अपने घर-संसार में व्यस्त हो जाने के कारण मां मुझे ही अंजली के लिए कोई योग्य वर तलाशने के लिए कहतीं। मानो मैं कोई चमत्कार कर अंजली के लिए योग्य वर लाकर उनके समक्ष खड़ा कर सकती हूं।
मैंने यह चमत्कार किया। इसी शहर के एक अच्छे लड़के से अंजली का विवाह तय कर दिया। लड़के वालों की इच्छानुसार विवाह कोर्ट में हुआ। घर-गृहस्थी के सभी साजो-सामान, गहने, बर्तन, जेवर के साथ हमने अंजली को विदा किया। अंजली की ससुराल स्थानीय थी। इसलिए जब भी मिलने का मन होता अंजली हमारे यहां आ जाती। कभी पति को बता कर तो कभी बिना बताए। अंजली के विवाह के कुछ माह बाद एक दिन मां भी चल बसीं। अंजली का विवाह देखने की ही उनकी इच्छा शेष रही होगी। मां के चले जाने के बाद मेरे जीवन में अकेलेपन का घनत्व बढ़ता गया। स्मृतियों के विस्तृत पथ कुछ कदम ही मैं आगे बढ़ पाई हूं कि रसोई में कुछ खटकने की आवाज आई। अंजली टीवी बंद कर रसोई में जा चुकी थी। वह रात का भोजन बनाने की तैयारी कर रही होगी। मेरी चाय कब की खत्म हो चुकी थी। पर स्मृतियां हैं कि समाप्त ही नहीं होती हैं। रसोई से आती खटपट की ध्वनियां मेरी एकाग्रता को बाधित कर रही थीं। मैं कमरे से निकल बाहर बालकनी में खड़ी हो गई। स्मृतियां घुमड़ती रहीं, जैसे यह अभी कल की बात हो। वसंत ऋतु विदा ले रही थी। दबे पांव ग्रीष्म ऋतु आ रही थी। मेरे घर के सामने अमलतास का वृक्ष कलियों से परिपूर्ण होने लगा था। वृक्ष के पत्ते पीले होकर भूमि पर गिरने लगे थे। बस कुछ ही दिनों में पूरा वृक्ष फूलों से भर जाएगा। वृक्षों पर पुरातन पीले पत्ते कहीं नजर नहीं आएंगे। धूल भरी गरम हवाओं में, बियावान सृष्टि पर सौंदर्य और जीवंतता का सृजन करते ये अमलतास के फूल…। स्मृतियां घुमड़ रही थीं- ‘…स्थानीय विवाह की कुछ अच्छाइयां होती हैं, तो कुछ समस्याएं भी होती हैं। अंजली अपनी ससुराल में सामंजस्य बिठा कर सबसे घुलमिल कर रहने का प्रयत्न कर रही थी। न जाने कब, मेरे किस रिश्तेदार ने उसके पति के कान में अंजली के चरित्र को लेकर उल्टी-सीधी बातें भर दीं और वह उन्हें सच मान बैठा। अंजली देखने में आर्कषक है। मैंने महिलाओं से सुना है कि वैवाहिक जीवन में सौंदर्य और शक बहुधा साथ-साथ चलने लगते हैं। अंजली के साथ भी यही हुआ। बढ़ते-बढ़ते बात इतनी बढ़ गई कि अंजली मेरे पास आकर रहने लगी। मां-पिताजी के न रहने पर इस संसार में मैं ही उसका संबल थी। मेरे पास रहते हुए अंजली के चेहरे पर शांति और सुकून के जो भाव आने लगे, उनसे मुझे यह अनुमान लगाने में देर न लगी कि वह अपने वैवाहिक जीवन से कितनी त्रस्त थी।
अंजली के साथ जो हुआ उसे भुलाया तो नहीं जा सकता, पर हमें समय के साथ आगे बढ़ना ही होता है। मेरा अनुमान था कि विवाह टूटने के आघात से अंजली टूट जाएगी, पर वह गलत साबित हुआ। वह अपनी नौकरी के साथ शाम के समय आसपास के निर्धन बच्चों को पढ़ाती है। उसका सपना निर्धन बच्चियों को इस प्रकार की शिक्षा देने का है कि वे न सिर्फ समाज के साथ चल सकें, बल्कि आत्मनिर्भर होकर समाज के विकास में अपना योगदान भी दे सकें। मैं स्मृतियों के जंगल में गुम हो गई थी। टीवी के स्वर बालकनी तक आ रहे थे। शायद अंजली रसोई में काम समाप्त कर ड्राइंग रूम में आकर टीवी देख रही होगी। मैं भी बालकनी से ड्राइंगरूम में आ गई। अंजली टीवी खोल कर माथे पर छलक आई पसीने की बूंदों को पोंछ रही थी। मुझे देख कर मुस्कुराते हुए उसने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ देखा। शायद यह समय उसके पसंदीदा धारावाहिक का था। वह सोफे पर बैठ कर रिमोट से चैनल बदल कर आराम से टीवी देखने लगी। टीवी देखने में मेरी विशेष रुचि नहीं है। पर मैंने अनुमान लगाया कि जो धारावाहिक अंजली देख रही थी वह प्रेम कथा पर आधारित था। उसके चेहरे की मुस्कराहट से ऐसा लग रहा था जैसे वह नायक-नायिका के प्रेम लोक में स्वयं को स्थापित करती जा रही है। किसी युवती की तरह लज्जा और लालिमा के भाव उसके चेहरे पर नजर आ रहे थे। मैं खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो चुका था। पूरी सृष्टि में अजीब-सा विरानापन था। मेरा हृदय आज अपने तिरपनवें जन्मदिन पर इतना अशांत क्यों हो रहा है? ऐसा लग रहा है जैसे सृष्टि पर पसरा विरानापन और सन्नाटा मेरे हृदय में समाता जा रहा है। एक भय-सा क्यों मेरे भीतर समाता जा रहा है कि मेरे न रहने पर अंजली कैसे अकेली रहेगी? भाइयों के बच्चे भी विवाह योग्य हो चुके हैं। उन सबकी अपनी विवशताएं और व्यस्तताएं हैं। पास रह कर भी दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि वे हमारे पास नहीं आ पाते, मैं और अंजली ही बहुधा उनके पास चले जाते हैं मिलने। यहां तक कि पर्व और प्रसन्नता के अवसर भी हमें अकेले मनाने पड़ जाते हैं। मैंने पलट कर अंजली की तरफ देखा। वह निश्चिंत भाव से टीवी देख रही थी। उसके चेहरे पर वही चिर परिचित प्रसन्नता के भाव विद्यमान थे।
उसे देख मुझे आत्मसंतुष्टि की अनुभूति हुई। मैंने खिड़की के बाहर देखा। सांझ फैलती जा रही थी। दिन भर चलने वाली गरम हवाएं शीतल होने लगी थी। अमलतास के वृक्ष पुष्पों से भर गए थे। उन्हें देख कर मुझे सुखद अनुभूति हुई। प्रकृति की भांति जीवन में भी पतझड़ आता है। मेरा यह सोचना कि अकेलेपन के पतझड़ वाले दिन अंजली कैसे व्यतीत करेगी, व्यर्थ है। पतझड़ में खिल उठे अमलतास के इन पुष्पों ने मेरा मार्गदर्शन किया है। अकेलेपन के पतझड़ में अंजली के जीवन में भी अवश्य खिल उठेंगे पुष्प अमलतास के। प्रकृति का यही नियम है। मेरी अंतरात्मा ने धीरे से मुझसे कहा, ‘चलो अनामिका, घर में चलो। खिड़की से ताजा हवा आने दो। प्रकृति ने सबके हिस्से की खुशियां सबको दी हैं। तुम्हें भी… अंजली को भी।…’
