ब्राजील में आपातकाल की घोषणा की गई है। इस आग से निकलने वाले धुएं का असर दक्षिणी अमेरिका के नौ देशों में देखने को मिल रहा है। नासा की मानें तो यह धुआं अटलांटिक तटों तक फैल रहा है। मतलब यह कि यह फैल कर अठाईस सौ वर्ग किमी क्षेत्रफल को घेर रहा है। इस साल 228 मेगाटन कार्बन डाईआॅक्साइड पैदा हुई है। यह 2010 के बाद सबसे ज्यादा है। यह दक्षिणी अमेरिका के तटीय इलाकों तक पहुंच चुकी है।

यह एक तरह त्रासदी है, तो दूसरी ओर विरोध और राजनीति भी। ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो ने जनता से अपील की है मदद करने की। उसके लिए उन्हें कुछ लोगों की आलोचना का शिकार होना पड़ा। लोगों ने कहा कि सरकार अमेजन में कृषि कार्य को रोकने और आग पर काबू पाने में नाकाम रही है। जुलाई में एक वरिष्ठ ब्राजीलियन अधिकारी ने एक समाचार एजेंसी को बताया था कि बोल्सोनारो ब्राजील में निर्वनीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं।

ब्राजील के एनजीओ ने भी राष्ट्रपति बोल्सोनारो पर जंगलों को काटने के लिए फंडिंग करने का आरोप लगया। राष्ट्रपति ने इसके जवाब में कहा कि उन पर आरोप लगाने वाले एनजीओ के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होंगे। उस समय उन्होंने यह भी कहा था कि यह युद्ध है, जिसका मैं सामना कर रहा हूं। बता दें कि बोल्सोनारो के इस बयान के बाद ब्राजील के कई शहरों में कई जगह विरोध प्रदर्शन भी हुए। राजनीतिक बयानबाजियां भी हुई थीं।

अभी अमेजन के जंगल में जो आग लगी है, उसका असर भारत में नहीं हो रहा है। प्रत्यक्ष तौर पर हम कह सकते हैं कि भारत इससे बचा हुआ है। लेकिन, जब इसे समग्रता में देखेंगे तो यहां की जलवायु पर भी भविष्य में यह विपरीत असर डालेगा। भारत पर इसका असर कुछ सालों बाद पड़ेगा। जिस हिसाब से अमेजन में आग के बाद कार्बन उत्सर्जन होगा, उससे भारत तो क्या, विश्व को कोई भी देश शायद ही अछूता रह पाएगा। पूरे विश्व की चिंता इसी कारण तो है। हम कह सकते हैं कि अगले सौ सालों बाद इस आग की लपटों और धुआं का असर दिखेगा। मौसम के लिहाज से बात करें तो पिछले सौ-दो सौ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुर्इं हैं। उनका असर अब दिख रहा है, जैसे साइक्लोेन ज्यादा हो रहा है। मॉनसून देरी से आ रहा है, गर्मी की प्रचंडता बढ़ रही है आदि। हाल के कुछ वर्षों में हम भारतीयों ने मौसम की मार झेली है। आने वाले समय में यह और विकट हो सकता है।
(तरुण गोपालकृष्णन, डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर क्लाइमेट, सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरमेंट)