सुरेश सेठ

बहुत पहले की बात है। तब आकाशवाणी विविध भारती का एक पूर्वज हुआ करता था रेडियो सीलोन। यहां मशहूर उद्घोषक गोपाल शर्मा और दिवंगत अभिनेता सुनील दत्त, जो बलराज के नाम से जाने जाते थे, अपनी आवाज से दोस्तों के लिए अच्छे-अच्छे हिंदी फिल्मी गीत प्रस्तुत किया करते थे। महीने की पहली तारीख होती, तो वे किशोर कुमार की खिलंदड़ी आवाज में एक गाना अवश्य पेश किया करते ‘खुश है जमाना आज पहली तारीख है। रुपया जरा लाना, आज पहली तारीख है।’ लेकिन जा रे जमाना, मखमली आवाजें क्या गईं, जिंदगी खुरदरी हो गई। पहली तारीख क्या, अब महीने की किसी तारीख का भी मतलब नहीं लगता। काम करते-करते हाथ छंटनी के नोटिस थामने लगे हैं, कि जैसे दुष्यंत रहते तो कहते- ‘लोग गाते-गाते चिल्लाने लगे हैं’।

जनाब, महीने की पहली तारीख आज भी आती है, लेकिन उसकी खुशी गुमशुदा हो गई है। महीने भर की मेहनत के बट्टे खाते में चली जाती है। कहानीकार महेंद्र भल्ला से, रहते तो क्षमा प्रार्थना कर लेता कि उस कुत्तेगिरी का दाम देते-लेते आम लोगों का दिल जैसे बैठ जाता है। जमाने को खुश हुए देखे तो बहुत बरस बीत गए। अब तो ऊंची अटारियों वाले चंद लोग ही खुश नजर आते हैं, या कैबिन में बैठा वह मसीहा, जो यह दाम बांट कर कह देता है, अब मुझे रुलाएगा क्या पगले?

शेष लोग अपनी पहले दिन की टूटी-फूटी कमाई का मुजाहिरा अजब तरीके से करते हैं। प्रदर्शनकारियों को ‘हमारी दीनता मिटाओ’ के नारों के साथ कभी रोष स्वरूप बूट पालिश करते देखते हैं, कभी अधनंगे होकर सड़कों पर जुलूस निकालते।
इस बार तो साहब, गजब हो गया। अधभूखे, अस्थायी कर्मचारी अपने बच्चे कच्चे लेकर राजधानी के लोकतांत्रिक दरबार में चले आए कि इस टूटी-फूटी तनखाह में तो हमसे ये बच्चे नहीं संभाले जाते, अब इन्हें आप ही संभालिए।

हमें याद आया पिछले मास कारखानेदार और उससे पिछले मास दुकानदार अपने-अपने काम की चाबियां उनके हवाले करने चले आए थे, कि सरकार आपके टैक्स और कानून हमें राहत से काम नहीं करने देते। अब आप ही इन्हें संभालिए। लीजिए जनाब, सरकार सरकार न रही, आपके घर की जच्च संभालने वाली आया हो गई। या फिर वृद्धाश्रमों की तरह अब क्या प्रताड़ित परिवार गृह भी बनेंगे, जिनमें महंगाई आक्रांत जच्च बच्च सुख से रहेंगे, लेकिन साहब आज सुख कहा है। सुख तो उन परित्यक्त्ता वृद्धों को भी नहीं मिला, जो ममतावश अपना जमा जत्था संतान को दे तिरस्कृत हो इन वृद्धाश्रमों में जिंदगी काट रहे हैं। लेकिन आम चलन और परंपरा नहीं है अपने देश में वृद्धाश्रम खोलने की, इसलिए फिलहाल भिखारी गृहों के नामपट्ट बदल कर ही उन पर वृद्धाश्रम लिखा जा रहा है। जो परिवार कल्याण गृह खोलने जा रहे हैं, वहां भी कामकाज का रंग-ढंग वही होगा, जो आजकल बालिका संरक्षण गृहों अथवा अभागी महिला संरक्षण गृहों की सनसनीखेज खबरों के रूप में सामने आ रहा है।

लेकिन इतनी कम तनख्वाह पर इन फटेहाल परिवारों की गुजर-बसर कोई सनसनीखेज खबर नहीं, एक आदत है जो इस देश की तीन चौथाई जनता को पड़ गई है। अब वजीरे-आला ने कह तो दिया कि तनख्वाह कम लगती है, तो इस वेतन पर काम करने क्यों चले आए? हम आपको निमंत्रण तो नहीं देने आये थे, कि ‘आइए जनाब तशरीफ लाइए और इस तनख्वाह पर काम कीजिए। पहले रोजगार दफ्तरों के बाहर कतारें लगाते हो, सिफारिश पर सिफारिश, जब काम मिला तो देखो इनके नखरे।’

अब इन्हें कैसे समझाएं कि भूखा आदमी नखरे नहीं करता। छटपटाता है, भूख से तड़पता है और जब दम तोड़ जाए, तो जांच-पड़ताल करने वाले चले आते हैं कि साहब आदमी भूख से मरा या अपच से। भूख मिटाने के लिए कहीं कोई गलत दवाई तो नहीं फांक ली? आज इन सवालों का जवाब मर चुके आदमी के पास नहीं है और जो मरे नहीं, वे अपने अधनंगे, हुजूम के साथ इज्जत से जीने की मांग करते हैं, और फिर दफा-144 भोगते हुए तितर-बितर हो जाते हैं।
लेकिन कुछ लोग तो ऐसे भी होते होंगे, जिन्हें पहली तारीख को वेतन मिलने पर असीम खुशी मिलती होगी। मुंशी प्रेमचंद ने भी तो लिखा था, ‘सारा महीना अपनी कम कमाई के साथ कतर-ब्योंत में निकल जाता है। जब पहली तारीख आती तो मेरे धीरज का बांध टूट जाता। हलवाई की दुकान तक जाता, चार आने पैसे खर्च कर ही उठता।’

मगर आजकल चार आने पैसे तो क्या, दस रुपए में भी कुछ नहीं आता। इससे कम भिखारी को भीख देने लगे, तो वह भी नाक-भौं सिकोड़ते हुए हमारी गरीबी पर हमदर्दी प्रगट करता है। लेकिन सरकार आला चिंतित है। विदेशी मंडियों में रुपए का मूल्य निरंतर गिर रहा है। अब उसका रुतबा बढ़ाने के लिए मध्यवर्ग को राहत पहुंचाने वाली दर्जनों वस्तुओं पर आयात कर बढ़ गया। लीजिए साब, फुटपाथी लोग तो उदास ही थे, अब मध्यवर्गीय भी कमर पकड़ कर बैठ गए। ‘गरीब का बेटा गरीब ही रहे’, अब यही स्वर्णिम सिद्धांत चलेगा। अब कोई एसी या कूलर किस्तों पर लेने की न सोचिएगा। देश की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए कर्जा महंगा हो गया है। आज कर्जे की वापसी की मासिक किस्तें बढ़ जाएंगी। पहले अपनी फटी जेब सिलवा लो, फिर कोई कार किस्तों पर लेने के बारे में सोचना।