योग सात्विक और पवित्र मार्ग है, जिस पर चल कर साधक आत्मसाक्षात्कार और ईश्वर साक्षात्कार तक पहुंचता है। इस श्रेष्ठ मार्ग पर चलने में परमात्मा योग साधक के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने की प्रेरणा देता है। लेकिन बाधाएं फिर भी आती हैं, क्योंकि आत्मा अल्पज्ञ है। सात्विक, राजस तथा तामसिक प्रकृति त्रिगुण लिए हुए है, इसलिए बाधाओं का आना स्वाभाविक है। पर योग में आने वाली बाधाओं को बुद्धि पूर्वक, दृढ़ निश्चय से दूर किया जा सकता है। जीव में जो ज्ञान है वह परमात्मा द्वारा दिया गया है, जिससे आत्मा अपने लौकिक तथा आध्यात्मिक कार्यों की सिद्धि प्राप्त कर मोक्ष को पाता है। ईश्वर गुरुओं का भी गुरु है। जब आत्मा परमात्मा को पाने के लिए प्रयास करता है तब शरीर, प्राण तथा मन को एकाग्र चित्त कर परमात्मा का चिंतन-मनन करता है और धीरे-धीरे अभ्यास से परमात्मा के निकट पहुंच जाता है। इस कर्म का फल एक जन्म में नहीं, बल्कि अनेक जन्मों में सिद्ध होता है। लेकिन निरंतर अभ्यास तथा वैराग्य से इस कठिन मार्ग को पार कर परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
इस योग मार्ग में अभ्यास करते समय जो अनेक बाधाएं आती हैं, उनका उल्लेख जरूरी है, जिससे साधक अपने आप को इस बाधाओं से बचा सके और ठीक प्रकार से धीरे-धीरे योग मार्ग में सफलता प्राप्त करता चला जाए। जब साधक योग के मार्ग पर चलता है, तब योग के साधन तत्व क्या हैं? उसका ज्ञान होना जरूरी है। योग मार्ग में चलने के लिए एक विशेष प्रकार की योजना बनानी पड़ती है कि योग को साधने में क्या-क्या सकारात्मक तथा सहयोगी तत्व होंगे? उन्हें अपना कर योग साधक अपने मार्ग में आगे बढ़ता है, लेकिन साथ-साथ योग साधक को योग मार्ग में आने वाली बाधाओं को भी समझना चाहिए, इससे वह इन बाधाओं को सरलता पूर्वक दूर कर सकेगा।
योग की अनेक बाधाएं
पहला- व्याधि यानी ‘रोग’। वात, पित्त तथा कफ में असंतुलन होना रोग है। अगर साधक को कोई भी शारीरिक रोग है, तो पहले उसे उस रोग की चिकित्सा कर दूर करना चाहिए। अगर साधक किसी भी रोग से पीड़ित है, तो न ही प्राणायाम ठीक से कर सकेगा और न ही आसन स्थिर करके ध्यान लगा सकेगा। चाहे नया साधक हो या फिर समाधि तक पहुंचा हुआ योगी, रोग दोनों के लिए ही योग सिद्धि नहीं होने देगा। रोग योग का शत्रु है और योग भी रोग का शत्रु है। योग मन तथा उसके विकारों को तुरंत दूर कर देता है और बहुत हद तक शारीरिक रोगों को भी। मगर फिर भी शरीर के रोगों को ठीक करने के लिए दवाई का प्रयोग कर रोग को तुरंत दूर करना चाहिए।
दूसरा- अकर्मण्यता। परिश्रम करने से बचने की भावना। जो व्यक्ति बिना परिश्रम के कुछ पाना चाहता है, वह जीवन में कुछ भी नहीं पा सकता है। समय जल्दी से बीतता जाता है और बिना कर्म के हाथ खाली रह जाते हैं। इसलिए समय का सदुपयोग करना चाहिए और परिश्रम द्वारा ही योग सिद्ध होता है अन्यथा योग में सफलता नहीं मिलती है।
तीसरा- संशय। जब साधक को एक विषय में दो प्रकार का विरोधी ज्ञान होने लगे, जैसे परमात्मा है या नहीं है? यदि है तो कैसा दिखता है या नहीं दिखता है? आत्मा है या नहीं है? क्या आत्मा ही परमात्मा है या फिर उसका ही अंग है? जब योग साधक को शंका उत्पन्न होती है, तब वह यह समझने में असमर्थ हो जाता है कि सत्य क्या है? तब वह योग मार्ग से भटक जाता है और उसे छोड़ने लगता है, क्योंकि संशय योग साधक की गति को रोक देता है। इस कारण संशय योग का विरोधी है। तब साधक योग द्वारा परमात्मा की सहायता से ही अपने ज्ञान का विकास कर उसे दृढ़ बनाता है। तब उसके सभी संशय दूर हो जाते हैं।
चौथा- प्रमाद। योग मार्ग के साधनों को न अपनाना। साधक जानता है कि योग के साधन कौन-कौन से हैं? वह जानता है कि इन सभी साधनों को अपना कर ही योग साधा जा सकता है। लेकिन वह उन साधनों का प्रयोग नहीं करता या फिर उन्हें टालता रहता है कि आज नहीं कल करूंगा और जब कल आता है तब वह बोलता है कि परसों करूंगा। यह टालने की प्रवृत्ति उसे योग से दूर करती है। बिना साधनों के प्रयोग किए योग सिद्ध नहीं हो सकता है।
पांचवां- आलस्य। आलसी व्यक्ति योग ही नहीं, बल्कि किसी भी कार्य को सिद्ध करने में असफल रहता है। आलस्य भाव भी प्रत्येक कार्य को टालने के कारण अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता है। शरीर तथा मन में भारीपन आलस्य का कारण है। आलसी व्यक्ति को आराम अधिक पसंद होता है और वह समझता है कि आराम से अधिक आनंद योग में नहीं है, जो कि ठीक बात नहीं है। जब तक दृढ़ निश्चय न किया जाए, तब तक आलस्य भागता नहीं है। जिस प्रकार आलस्य योग का विरोधी है, उसी प्रकार योग भी आलस्य का विरोधी है। प्रतिदिन नियमित योगाभ्यास करने से आलस्य को दूर भगाया जा सकता है।
छठवां- अविरति। वैराग्य का अभाव तथा विषय भोगों में रुचि होना। संसार में जितने भी भौतिक सुख दिखाई देते हैं, यही सब कुछ हैं और उन्हें पाकर भोगना ही जीवन का आनंद है इस प्रकार का भाव मन में रखना तथा इन सुखों को पाने की इच्छा और परिश्रम करना साधक को योग के मूल आनंद से दूर करता है। वैराग्य भाव से सांसारिक सुखों को भोगना चाहिए। विषय भोगों में डूब कर उसे भोगना योग की जड़ को उखाड़ देता है। विषय भोगों को योग से छोड़ा जा सकता है। बिना योग के विषयों का पूर्ण त्याग नहीं हो सकता है।
सातवां- भ्रांतिदर्शन। किसी भी विषय में विपरीत ज्ञान होना, जैसे जड़ को चेतन तथा चेतन को जड़ समझना। जो ईश्वर नहीं है उसे ईश्वर समझना तथा जो ईश्वर है उसे ईश्वर न समझना तथा उसकी उपासना करना। हानिकारक वस्तु को लाभकारी तथा लाभकारी वस्तुओं को हानिकारक समझना भ्रांतिदर्शन है।
आठवां- समाधि की अप्राप्ति। साधक जब लंबे प्रयास के बाद भी योग का लाभ नहीं उठा पाता है, तब उसे मन में निराशा होती है और योग में उसकी गति रुक जाती है। अगर साधक योग के किसी एक विषय को सिद्ध कर लेता है, तब उसका फल उसे उत्साहित करता है। साधक का विश्वास दृढ़ हो जाता है कि अब वह समाधि तक पहुंच सकता है, इसलिए योग में किसी भी एक विषय पर अधिक ध्यान देने से उसे सिद्ध करना लाभकारी होता है।
नौवां- अनवस्थितत्व। जब साधक लंबे प्रयास से समाधि को पा लेता है, लेकिन समाधि में स्थिरता नहीं रहती, उखड़ती रहती है उसी को अनवस्थितत्व तत्व कहते हैं। इसलिए लंबे काल तक विधि पूर्वक योगाभ्यास करने से यह बाधा दूर होती है। योग बाधाओं की तरह ही श्वास-प्रश्वास का ठीक न होना, दुख, अंगों का कांपना, कमजोरी आदि अनेक बाधाएं हैं, जिन्हें विधि पूर्वक योगाभ्यास करने तथा ईश्वरप्राणिधान का नियम पालने से दूर किया जा सकता है और आत्मा तथा ईश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है।
डॉ. वरुण वीर
