सुरेश सेठ

उन्होंने कहा, ‘वे मुझे बहस नहीं करने देते।’ संसद में बहस करना चाहता हूं, तो उसे बाधित करवा देते हैं। सत्र के बाद सत्र गुजर जाते हैं। बहस नहीं होती। होता है तो केवल हल्ला-गुल्ला। मेजें थपथपाई जाती हैं। कागज फाड़ कर एक-दूसरे पर या स्पीकर महोदया की ओर फेंके जाते हैं। चंद भद्र नेता उग्र हो जाते हैं, सदन के कुएं में जाकर प्रदर्शन के नाम पर तानाकशी करते हैं, बाद में वह गाली-गलौच में बदल जाती है। यह जनता का कीमती समय है। एक मिनट कम से कम अढ़ाई लाख रुपए का। एक मिनट नहीं, पूरा सत्र कोलाहल के बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। किसी ने नहीं सोचा कि जनता के गाढ़े पसीने की कुल कमाई नष्ट हो गई?

अजी नष्ट न होती, तो गरीबों की बस्तियों में इससे कितने स्कूल खुल जाते। भूखे पेटों के लिए न जाने कितना राशन बंटता। लेकिन स्कूल खोलने की चिंता किसे है? इनमें पढ़ना ही कौन चाहता है? जो पढ़ लेता है, वही क्या आसमान में थिगली लगा लेता है। अखबार बोलते हैं- एक चपरासी की नौकरी के लिए आजकल हजारों एमए, बीए कतार लगा देते हैं। नौकरी फिर भी पहुंच के बिस्तर से उठ कर आए साहब के भाई-भतीजों को मिलती है। शेष रद्द हो गए लोग चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं, ‘अरे हमारी हालत पर तरस नहीं खाना, तो इस पर कम से कम बहस ही कर लो। बहस नहीं, तो कम से कम चिंता कर लो। हुजूर आपने तो जनाब अकबर इलाहाबादी साहब को भी झुठला दिया। उन्होंने कहा था- ‘हाकिमों को बहुत चिंता है, अपना डिनर खाने के बाद।’

लीजिए साहब! ऐसा तो हुआ नहीं। हाकिमों ने अपना डिनर खा लिया, लेकिन देश के करोड़ों भूखे नंगों की चिंता ही नहीं की। अपना सांसद या विधायक होने का वेतन बढ़वा लिया। अपने लिये पेंशन भी लगवा ली, लेकिन हमारी तो लगी-लगाई पेंशन कटवा दी। उसका कॉरपस फंड बना कर शेयर मार्किट के रहमो-करम पर छोड़ दिया। कभी सर्वोच्च न्यायालय ने मजदूर संगठनों को फरमाया था- ‘पेंशन कोई खैरात नहीं, आपका अधिकार है। आपने उम्र भर जो मेहनत की, उसका स्थगित भुगतान है।’

हाकिम बोले, ‘अजी हमने आपका अधिकार कहां नकारा। केवल उसका भुगतान करने का तरीका बदल दिया।’ पहले यह सरकारी खजाने से आता था, अब यह निजी निवेशक के व्यवसायिक उतार-चढ़ाव से पैदा होगा। या फिर अधिकतर या सेस के रूप में सामाजिक कोष में योगदान करो, तभी बेचारे वंचितों को पेंशन अदा करें। तुम कर नहीं दोगे, तो उनकी पेंशन रुक जाएगी। आखिर अपनी जेब कटवाओ तो किसी गरीब की फटी हुई जेब सिले। लेकिन वह जेब तो फिर भी सिल नहीं पाई। ‘कैग’ साहब ने फरमाया, सवाल गंदम जवाब चना। यानी जाते थे जापान पहुंच गए चीन समझ गए ना। सेस इकट्ठा हुआ गरीब के संरक्षण के लिए, उसे लगा दिया सरकारी नेताओं के बंगलों की मरम्मत या उनकी नई गाड़ियां खरीदने वास्ते। कहीं की र्इंट किसी और चौबारे में जा लगी, भानुमती ने कुनबा तो जोड़ लिया, लेकिन गरीब कहता रहा, न हमें र्इंट मिली न रोड़ा।

किसान बोला, हमारी फसल खरीद के भुगतान के लिए इकतीस हजार करोड़ रुपए का अनुदान आया। कर्जा बन कर हमारे गले से लटक गया, लेकिन पैसा किसी मद पर खर्च हो गया, ‘कैग’ महोदय पता कर रहे हैं। लेकिन इतना पक्का है कि यह खर्च कहीं न कहीं सरकारी मशीनरी को तेल देने में ही खर्च हुआ होगा। अब इसकी परवाह कीजिए, और हमारा कर्ज माफ कर दीजिए। लेकिन जनता पूछती है, कर्ज केवल इकतीस हजार करोड़ का नहीं, दो लाख करोड़ से ऊपर है। यहां केवल धरती पुत्र ही अस्सी हजार करोड़ रुपए का कर्जदार हो गया। आप उसे फिलहाल पंद्रह सौ करोड़ रुपए के भुगतान से बहलाना चाहते हैं। लेकिन इसकी कर्जमाफी की चिट्ठियां भी अभी लालफीताशाही की भेंट चढ़ रही हैं। हां, कर्जदारों ने फिलहाल सहकारी बैंकों को अपनी कर्जमाफी की किस्तें चुकानी बंद कर दी। उसके खाते मृत होते चले गए, बैंकों के ढांचे धराशायी हो रहे हैं।

जनता पूछती है कि यह कैसा डिजीटल इंडिया? यह कैसा महाजनी सभ्यता से छुटकारा? लेकिन ये सवाल शून्य में उभरती चीखों से अधिक रुतबा नहीं पाते। क्योंकि उनके सांसदों और विधायकों ने सदन के प्रश्नकाल में ऐसे प्रश्न पूछने पर कीमत टैग लगा दिए हैं। जब ऐसे घपले बेनकाब होने लगें, तो पूरे के पूरे प्रश्नकाल को ही शोर-शराबे के दरिया में बहा दिया गया। देखो, अब पंद्रह मिनट बहस करने की चुनौतियां दी जा रही हैं। सरकारी नेता कहते हैं कि हमें संसद में बोलने नहीं देते, इसलिए हम जनता की अदालत में बोलते हैं। विपक्ष के नेता कहते हैं कि वे लोग इसलिए नहीं बोलते कि उनके पास हमारे सवालों का जवाब नहीं। अब बेचारी जनता क्या करे? जनता की चिंता यह नहीं कि नेतागढ़ पढ़े-लिखे हैं या बिना पढ़े जुमले फेंकते हैं, उन्हें चिंता है कि उन्हें इन जुमलों के युद्ध की जगह रोटी कब मिलेगी? रोजगार की उम्मीद कब पूरी होगी? लेकिन जुमलों के युद्ध के तमुलनाद में ऐसे सवालों के जवाब नहीं होते। आप संविधान दिवस मना लीजिए, लोकतंत्र को सिर नवा लीजिए, ऐसे-ऐसे आरोप लगाइए कि जो गद्दी पर बैठा उसने लोकतंत्र का अपहरण कर लिया। अब उसे हटा कर हम लोकतंत्र को सीधी पटरी पर डालेंगे। लेकिन उनसे कोई नहीं कहता कि प्यादे से फर्जी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय। लकीर टेढ़ी हो या सीधी, नतीजा तो यह निकले कि भूखे पेट अपने पेट पर तबला बजाना बंद करें, उनके पेट की अंतड़ियां पीठ से न सटें, उनके चेहरों पर मुस्कान लौटे और वे अपनी निस्तेज आंखों से आकाश के रंगों को यों थामना शुरू कर दें कि उन्हें अपने इर्द-गिर्द इंद्रधनुष खिलते हुए लगें। लेकिन ऐसा होता नहीं, केवल एक प्रश्न गूंजता रहता है कि यह इंद्रधनुष क्षितिज पर खिलने से पहले ही टूट क्यों गया और लोग सपने देखने से पहले ही शर्मिंदा क्यों महसूस करने लगे?