यह दुखद है कि आज विकास का अर्थ विस्तार हो गया है। विस्तार- शहरों के आकार का, सड़कों, भवनों आदि का। लेकिन बारीकी से देखें तो यह विस्तार या विकास प्राकृतिक संरचनाओं, जैसे कि धरती, नदी या तालाब, पहाड़ और पेड़, जीव-जंतु आदि के नैसर्गिक स्थान को घटा कर किया जाता है। नदी के पाट को घटा कर बने ‘रिवर फ्रंट’ हों या तालाब को मिट्टी से भर कर बनाई गई कॉलोनियां, तात्कालिक रूप से तो सुख देती हैं, लेकिन प्रकृति के विपरीत जाना इंसान के लिए संभव नहीं है और उसके दुष्परिणाम कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। पीने के जल का संकट, बरसात में जलभराव, आबादी और यातायात बढ़ने से उपजने वाले प्राण वायु का जहरीला होना आदि।
देश के अधिकांश उभरते शहर अब सड़कों के दोनों ओर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। न तो वहां सार्वजनिक परिवहन है, न ही सुरक्षा, न बिजली-पानी की न्यूनतम आपूर्ति। असल में देश में बढ़े काले धन को जब बैंक या घर में रखना जटिल होने लगा तो जमीन में निवेश के अंधे कुंए का सहरा लिया जाने लगा। इससे खेत की कीमतें बढ़ीं, खेती की लागत भी बढ़ी और किसानी लाभ का काम नहीं रहा गया। पारंपरिक शिल्प और रोजगार की त्यागने वालों का सहारा शहर बने और उससे वहां का अनियोजित और बगैर दूरगामी सोच के विस्तार का आत्मघाती कदम उभरा।
साल दर साल बढ़ता जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और उसके कारण मौसम की अनियमितता, गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, मरीजों से पट रहे अस्पताल… ऐसे कई मसले हैं जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे हैं। मगर भारत जैसे विकासशील देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन तेजी से होता ‘शहरीकरण’ एक समग्र विषय के तौर लगभग उपेक्षित है। हमारे देश में संस्कृति, मानवता और बसावट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उनके तट पर मानव-जीनव फलता-फूलता रहा है। बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई। यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर।
बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और उज्ज्वल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचौंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृत्ति का परिणाम है कि देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या 302 हो गई है। जबकि 1971 में ऐसे शहर मात्र एक सौ इक्यावन थे। यही हाल दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की है। इसकी संख्या गत दो दशकों में दोगुनी होकर सोलह हो गई है। पांच से दस लाख आबादी वाले शहर 1971 में मात्र नौ थे, जो आज बढ़ कर करीब पचास हो गए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आज देश की कुल आबादी का साढ़े आठ प्रतिशत हिस्सा देश के छब्बीस महानगरों में रह रहा है।
विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि आने वाले बीस-पच्चीस सालों में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या साठ से अधिक हो जाएगी, जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान सत्तर प्रतिशत होगा। एक बात और बेहद चौंकाने वाली है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या शहरों में रहने वाले गरीबों के बराबर ही है। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यानी यह डर गलत नहीं होगा कि कहीं भारत आने वाली सदी में ‘अरबन स्लम’ में तब्दील न हो जाए।
