आनंद कुमार सिंह

साहित्य में विधाओं का अपना तय स्वरूप होता है। हालांकि सिद्ध रचनाकारों ने विधाओं के तय पैमाने में कुछ तोड़-फोड़ करने के प्रयास भी किए हैं, पर ऐसा नहीं कि उन्होंने विधाओं का परस्पर घालमेल कर उनके स्वरूप को ही बदल देने की जिद दिखाई हो। मगर पिछले कुछ सालों से अक्सर कहा जाने लगा है कि अब विधाओं का कोई मतलब नहीं रह गया है। इनकी परस्पर आवाजाही होनी चाहिए। इस प्रयास में कई रचनाकार स्वच्छंद रूप से विधाओं का अंतर्मिलन कराते देखे जा रहे हैं। यह कहां तक उचित या अनुचित है, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

आजकल यह कहा जाने लगा है कि साहित्य की मान्य विधाएं अपने कथनी यथार्थ की अंतिम परिणति पर पहुंच चुकी हैं। यानी इस सीमा के अंतर्गत उन्हें जितना कहना था वह सब कुछ कहा जा चुका। अब कुछ नया कहने के लिए वे विधाएं सभी एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर चल रही हैं और विशृंखलित यथार्थ की पुनर्रचना के कठिन समय में सब मिलकर या कभी-कभी अपनी इयत्ता को दूसरी विधाओं को सौंप कर ही साहित्य को बचाए रख पा रही हैं। इस सदी में सच्चाई यही है कि अलग-अलग अपना निजी विधागत पार्थक्य सुरक्षित रख कर वे पिछली सदी के रूप-शिल्प को दोहरा तो सकती हैं, लेकिन हमारे वर्तमान वैश्विक पाठ का प्रतिनिधित्व करने में मौलिक रूप से असमर्थ और नाकाफी सिद्ध हो रही हैं। कारण यह भी है कि आज इक्कीसवीं सदी का जीवन पिछली शताब्दी की तुलना में इतनी तेजी से बदल रहा है कि मानवीय बुद्धि के जितने भी नैसर्गिक रूप बताए जाते थे, जिनसे साहित्य ही नहीं, सभी विद्याओं का विकास हुआ था, वे सभी मान-विकसित ‘आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस’ के सामने बौने साबित होते जा रहे हैं।

आजकल इसी नई अनैसर्गिक-बुद्धि से जीवन संचालित होने लगा है और संभावना यही है कि आगे-आगे जब इसकी गति और बढ़ेगी तब कला-साहित्य की अर्थवत्ता कितनी सुरक्षित, प्रामाणिक और सहवर्ती बची रह सकेगी! यह प्रश्न इसलिए भी बहुत जरूरी लगता है, क्योंकि स्वयं साहित्य की मान्य विधाओं में एक तरह का तेजी से रूपभ्रंशन और विरूपीकरण हुआ है, जिससे एक ऐसा विमिश्र और द्रवणशील साहित्य सामने आने लगा है, जो हमारे समकालीन, तीव्र, कटु, बहुधंधी और बहुकोणीय यथार्थ को अनेक दिशाओं से परिभाषित करने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन इस जी-तोड़ कोशिश में साहित्य की मान्य विधाओं की परिभाषाएं और सीमाएं भी टूटती नजर आ रही हैं।

यही नहीं, इतिहास, मनोविज्ञान, साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र, विज्ञान की सैद्धांतिकी, खगोल विज्ञान और राजनीतिशास्त्र आदि अनुशासनों की सीमाएं भी टूट रही हैं। यह सारा लक्षण उत्तराधुनिक जीवन और साहित्य का है, जो पश्चिम में पहले ही आ चुका। वहां तो पहले ही इस बात पर विमर्श चलता ही रहा कि महत्त्व विषय का नहीं, बल्कि भाषिक निर्वचन का है। फिर साहित्य भी अंतत: भाषा का ही खेल है, तो किसी के अलहदा महत्त्व का कोई अर्थ नहीं। मूल बात अर्थान्वेषण या इंट्रप्रेटेशन है और वह एक सामाजिक पाठ पर निर्भर है, जिससे अर्थ को खोजा जा सकता है। वहां अनुशासनों का इस दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं है। उसी की नकल में उत्तराधुनिक चिंतन की चर्चा तो हिंदी में भी समय से पहले बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में ही शुरू हो गई थी। लेकिन वास्तविकता यही थी कि हिंदी में ये सारे लक्षण इक्कीसवीं सदी में अब जाकर प्रकट हुए हैं।

असल में बात यह है कि मानव का जीवन स्वयं ही सबसे बड़ा साहित्य है। उसी के संरचनात्मक अंतर्विरोध और आंतरिक संघर्ष के युग परिवर्तक स्वप्न और यथार्थ आदि से भाषा या साहित्य की सभी विधाएं तय होती हैं। सीधी-सी बात है कि जीवन में जब-जब बदलाव आएंगे, साहित्य में और उसकी विधाओं में भी बदलाव आएंगे ही। यह नहीं होगा तो फिर साहित्य जीवन को अपनी शाब्दिक चेतना के समुच्चय में अभिव्यक्त ही कैसे कर सकेगा? फिर ऐसे साहित्य का औचित्य भी क्या होगा। जब रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य के इतिहास को जनता की बदलती चित्तवृत्तियों के समांतर दिखाने की बात कही थी तो उनका आशय भी यही था।

हमारे देश मे साहित्य की सभी महत्त्वपूर्ण विधाएं अपने तत्कालीन जीवन के अनुरूप उनकी संगति में ही प्रकट हुर्इं। ऐतिहासिक रूप से जैसे-जैसे बदलाव आया, जो कि धीमा बदलाव था, वैसे-वैसे उसकी छाया हमारे साहित्य के हरेक रूप पर पड़ी। आधुनिक काल में जब हम पश्चिम के संपर्क में आए तब उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में पश्चिमी साहित्य के प्रभाव से अन्य भारतीय साहित्य के साथ ही हिंदी साहित्य की आधुनिक विधाएं भी अपने नवीन रूप में आ सकीं।

सामान्यत: साहित्य में कविता-उपन्यास-नाटक-कहानी-निबंध-आत्मकथा-जीवनी आदि विधाएं मानवीय चित्तवृत्तियों और उनकी संवेदना को आत्मसात करने, उनका रसग्रहण करने और उन्हें विशेषीकृत रूप से समझने की सुविधा के लिए वर्गीकृत की गई होती हैं। यों तो रेलगाड़ी की तरह इनके ‘कंपार्टमेंटलाइजेशन’ के लिए विभेदीकृत स्तरीकरण भी समाज में पहले से प्रचलित हैं ही। लेकिन सच यही है कि इन सभी को एक साहित्य का ही इंजन खींच रहा है। हिंदी के परिदृश्य में देखें तो आजकल सोशल मीडिया पर प्रचलित पुराने ढब की कविताएं बहुत बड़ी संख्या में लिखी जा रही हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कुछ अपवादों को छोड़ कर इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की यह पारंपरिक कविता हमारे वर्तमान समाज की राजनीतिक विडंबना, आध्यात्मिक अवरोध, धार्मिक कुंठा, द्वंद्व, अवसाद, विरोधाभास, विसंगति और विकृति को संरचनात्मक नएपन के साथ उस ताजा और टटकी दृष्टि से नहीं देख पा रही है, जिसे पिछले साहित्यिक युगों की तुलना में बहुत उल्लेखनीय कहा जा सके। यही नहीं, उस ढब से वह हमारे जीवन की सजीवता, कमनीयता, मांसलता, बहुस्तरीयता, सहज प्रेममयता, वैज्ञानिक बोध से उपजे नए ‘पैराडाइम’ और उल्लासयुक्त उत्कटता को भी उस शिद्दत से व्यक्त करने में कहीं न कहीं उलझी हुई है। जहां पर वह नई शैली में कोशिश कर रही है, वहां पर वह अपने विधागत स्वरूप को बचाने की कोशिश में हांफती और लाचार नजर आ रही है। पारंपरिक गीत विधा के समक्ष नवगीत विधा का भी यही हश्र हुआ। नए यथार्थ को व्यक्त करने की स्पृहा में नवगीत विधा को पारंपरिक गीत के ढांचे को तोड़ना ही पड़ा और न चाहते हुए भी अपने यथार्थ को लेकर वह नई कविता के समीप आने लगी, जहां उसका सांस लेना भी दूभर हो गया।

इन दिनों कहानी (अंग्रेजी में जिसे शॉर्ट स्टोरी कहते हैं!) प्राय: अधिक लोकप्रिय विधा के रूप में मान्य है। अपने लघु कलेवर में काल्पनिक गद्य विधा के रूप में विश्वभर में यह शीर्ष पर है। हमारे चारों ओर बेतरतीबी से फैले हुए जीवन की आंतरिक जटिलताओं, विडंबनाओं, संभावनाओं और अनिश्चितताओं को कहानी अपनी परिधि में बांध कर पाठक को धीरे-धीरे उस ‘फोकलाइजेशन’ की ओट से ‘क्लाइमैक्स’ की ओर ले चलती है, जो कहानीकार का मूल उद्देश्य हुआ करता है। इसलिए कहानी विधागत संक्षिप्ति और कलात्मक संयम की अधिक मांग करती है, जिसे न समझने के कारण ही आजकल अनेक कहानीकार वर्णनात्मक या तथ्य-निरूपण को ही कहानी के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। कहानी केवल घटना नहीं है बल्कि वह जीवन में घटित एक संवेदना के कोण पर उसकी बारीक नोक पर टिकी हुई अचूक घटना है। यथार्थ के जितने भी आयाम संभव हो सकते हैं या उसके जितने भी रूप हमारे जीवन में सामने आते हैं कहानी विधा के पंजों से बच कर नहीं निकल सकते। इस अर्थ में कहानी पाठक के मन पर एक प्रभाव छोड़ती है, जो इतनी सघनता और शीघ्रता से किसी अन्य विधा द्वारा संभव नहीं हो पाता।

इन्हीं अर्थों में देखें तो एक गीत या कविता भी यही काम करती है। वह भी अपनी प्रभावात्मकता की पूरी अन्विति में इसी बेतरतीबी से फैले जीवन के मर्म, उसकी सार्थकता, उसकी विडंबना, सांस्कृतिक नागरिकता की इकाई के रूप में अकेले पड़ते जाने की अकुलाहट, विकलता, विवशता और लाचारीवश छूट चली सामूहिक स्मृतियों के जखीरे को एक अपूर्व रंग में प्रस्तुत करती है। उसके साथ पाठक या श्रोता को यह सुविधा है कि वह उसे दोहरा सके, गुनगुना सके, याद रख सके और बिना उसका संक्षेपण किए उसे पुन: संस्मृत कर कमोबेश वही प्रभाव पैदा कर सके, जो कवि को अभिप्रेत रहा हो।

साहित्य की अन्य सर्जनात्मक विधाओं में इनके समांतर ही विकसित होने वाली निबंध विधा भी विचारात्मक श्रेणियों के अतिरिक्त ललित निबंध, आत्मनिबंध या विमर्शात्मक सांस्कृतिक निबंधों की दृष्टियों से जीवन की संस्कृति, सभ्यता, कलात्मक उन्मेष, विज्ञान और तकनीक, धर्म, राजनीति और सूचना माध्यमों की विरूपताओं, आख्यानों, फिल्मों और आजकल की सर्वव्यापी विरूपताओं को चिह्नित, आलोचित और उद्घाटित करती हैं। यह भी कह सकते हैं कि आजकल निबंध विधा एक तरह की सर्वग्रासी विधा है। वह अपनी व्याप्ति में किसी भी अन्य विधा को नहीं छोड़ती और आलोचनात्मक विमर्श की शक्ल में सभी अन्य विधाओं का मूल्य-निर्णय भी करने लगती है। लेकिन यह काम भी वह तभी कर सकी, जब उसे शुक्लोत्तर युग के निबंधों की जकड़बंदी से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने छुटकारा दिलाया। आचार्य द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र के निबंधों में जितना अंतर है, उससे कहीं अधिक बड़ी छलांग कुबेरनाथ राय और अश्विनी कुमार के निबंधों की है।

हिंदी नाटकों के साथ भी यही हुआ। पारसी रंगमंच के सामने प्रसाद के नाटकों का रूप ही अलग है। मोहन राकेश ने उसे अलग नवीनता दी और भारती जी ने ‘अंधायुग’ में उसे उसकी विधागत सीमाओं से बाहर जाकर ही रचा। आशय यह कि हर समय में रचनाकारों ने अपने युगीन यथार्थ के दबाव में विधागत सीमाएं तोड़ी हैं, क्योंकि उन प्रभावों को उन्होंने पृथक-पृथक समझने की कोशिश की थी। तब वह एक साथ संभव नहीं हो सकता था। संभवत: वह उनके युग की सीमा रही होगी।

लेकिन, आज इक्कीसवीं सदी का यथार्थ अब किसी एक समझदार इकाई का अकेला सत्य नहीं है, बल्कि उस सत्य का अब इतना अधिक समाजीकरण हो चुका है कि वह सभी रचनाकारों की वृहत्तर सामाजिक सौंदर्यानुभूति का अंग बन गया है। इसलिए आज का कहानीकार अपनी कहानी में ललित निबंध भी रचता है, गद्य में आलोचनात्मक विश्लेषण भी करता है, प्राचीन आख्यानों की शैली की अवतारणा भी करता है और मनोविज्ञान तथा दर्शन या विज्ञान की भाषिक निष्पत्तियों का उपयोग भी करता है। इसी तरह इतिहासकार की तरह बहुत सूक्ष्मता से शोध कर आज उपन्यासकार समाज का इतिहास भी लिखता है, व्यक्ति के अंतर्गत का विश्लेषण ठीक चिकित्सक की तरह उसी की भाषा में करता है और यात्रावृत्तांत को भी उसी में अंतर्भुक्त कर देता है। हिंदी में साहित्यिक विधाओं का सर्वाधिक अंतर्मिलन उपन्यास, कहानी और निबंधों के क्षेत्र में हो रहा है। पर केवल सीमाओं के टूटने से नहीं, नए जीवन-यथार्थता के वास्तिवक दबाव के कारण विधाओं के टूटने से जो चीज बने वह अपने आंतरिक तर्क के साथ मौजूद हो, तभी उसकी कलात्मक उपयोगिता भी होगी।