दिनेश कुमार

अभिव्यक्ति के किसी भी माध्यम के लिए वस्तु के साथ-साथ रूप का सवाल भी महत्वपूर्ण होता है। अन्य कलाओं में तो रूप और वस्तु को एक दूसरे से अभिन्न माना जाता है, पर साहित्य में इन्हें अलगा कर देखने की प्रवृत्ति भी रही है। एक पक्ष वस्तु को महत्त्वपूर्ण मानता है, तो दूसरा रूप को। दरअसल, ये दोनों अतिवादी मान्यताएं हैं, जिनसे साहित्य को लाभ कम, नुकसान अधिक हुआ है। साहित्य के संदर्भ में भी वस्तु और रूप को अभिन्न ही मानना चाहिए। वस्तु और रूप के मेल से अंतर्वस्तु निर्मित होती है। यहां वस्तु से तात्पर्य विषय-वस्तु से है। प्राय: विषय-वस्तु और अंतर्वस्तु को एक ही समझ लिया जाता है, जबकि इन दोनों में बुनियादी भेद है। एक ही विषय-वस्तु पर लिखी गई रचनाओं की अंतर्वस्तु भिन्न-भिन्न हो सकती है। यह भिन्नता रूप के कारण पैदा होती है। समान विषय-वस्तु को अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त करने से उसकी अंतर्वस्तु भी अलग-अलग हो जाती है। रामकथा को आधार बना कर लिखी गई रचनाओं की अंतर्वस्तु अलग-अलग है। इसी तरह, ‘गोदान’ और ‘मैला आंचल’ दोनों की विषय-वस्तु तो ग्रामीण जीवन है, पर दोनों की अंतर्वस्तु अलग-अलग है। ‘शतपथ ब्राह्मण’ में वर्णित घटना को जब प्रसाद ‘कामायनी’ की संरचना में रूपायित करते हैं तो उसकी अंतर्वस्तु ‘शतपथ ब्राह्मण’ से काफी कुछ बदल जाती है।

विषय-वस्तु और अंतर्वस्तु के परस्पर संबंध को एक उदाहरण से स्पष्ट समझा जा सकता है। विषय-वस्तु एक तरह से कच्चा माल है और रूप सांचा है। सांचे से निकल कर जो सामग्री मिलती है वह अंतर्वस्तु है। जैसे मिट्टी को अलग-अलग सांचे में ढाल कर अलग-अलग बर्तन बनाए जा सकते हैं वैसे ही एक ही विषय-वस्तु को अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त या रूपायित कर अलग-अलग अंतर्वस्तु को सृजित किया जा सकता है। आपको अपनी इच्छानुसार वर्तन प्राप्त करने के लिए उसके अनुरूप कच्चे माल की तलाश और सांचे का निर्माण करना होगा, ठीक वैसे ही, जो कुछ आप अभिव्यक्त करना चाहते हैं, उसके अनुरूप विषय-वस्तु की खोज और रूप का चयन करना होता है। रूप का चयन अनायास न होकर सायास होता है। विषय-वस्तु स्वयं अपने अनुकूल रूप का चयन नहीं करती, बल्कि उसके लिए सचेत लेखकीय हस्तक्षेप किया जाता है। किसी विषय-वस्तु को जब रचनाकार एक निचित रूपात्मक ढांचे में अभिव्यक्त करता है, तभी उसकी जीवन-दृष्टि या विश्वदृष्टि सामने आती है। या यह कहें कि रचनाकार विषय-वस्तु के लिए वैसा ही संरचनात्मक ढांचा निर्मित करता है, जिसके माध्यम से उसकी विश्वदृष्टि अभिव्यक्त हो सके।

विषय-वस्तु, अभिव्यक्ति-विधान और लेखक की जीवन-दृष्टि तीनों मिलकर रचना की अंतर्वस्तु का निर्माण करते हैं। रचनाकार का संघर्ष इन्हीं तीनों क्षेत्रों में होता है। ये तीनों क्षेत्र एक-दूसरे से अंतरगुंफित हैं। रचना के संदर्भ में विषय-वस्तु से तात्पर्य यथार्थ यानी जीवन-वास्तविकता की पहचान से है। जिस लेखक को इसकी पहचान जितनी अधिक होगी वह युग-सत्य को अभिव्यक्त करने के लिए उतना ही बेहतर विषय-वस्तु का चुनाव करेगा। अभिव्यक्ति-विधान से तात्पर्य उपयुक्त विधा (रूप) का चयन और संप्रेषणीयता से है और जीवन-दृष्टि से तात्पर्य यथार्थ यानी युग-सत्य को व्याख्यायित और परिभाषित करने से है।

साहित्यिक रचना में रूप एक तरह से अंतर्वस्तु को अभिव्यक्त करने का माध्यम या साधन होता है। यह माध्यम या साधन जितना सक्षम होगा, अंतर्वस्तु की अभिव्यक्ति भी उतनी ही प्रभावशाली होगी। रूप का एक अर्थ तो विधा से है। जैसे-कविता, कहानी, उपन्यास, रेखाचित्र, संस्मरण आदि। इसका दूसरा अर्थ विधा की आंतरिक संरचना से है। इसलिए, रूपगत परिवर्तन विधागत भी हो सकता है और विधा के भीतर भी। किसी विषय पर कहानी भी लिखी जा सकती है और कविता भी। यह विधागत परिवर्तन है। पर, किसी विषय पर दो अलग-अलग कहानियों का लिखा जाना विधा के भीतर का संरचनात्मक परिवर्तन है। रूपगत परिवर्तन विधागत हो या विधा के भीतर, यह निश्चित है कि उससे रचना की अंतर्वस्तु बदल जाएगी। रचना के रूप में किसी तरह का परिवर्तन उसकी अंतर्वस्तु को प्रभावित करेगी ही।

अब तक यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि रचना के लिए रूप का महत्त्व असंदिग्ध है। शायद इसीलिए साहित्य रचना में विविध विधाओं का जन्म हुआ। विधा का चयन रचनाकार का सचेत चयन होता है और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव रचना की अंतर्वस्तु पर पड़ता है। विधा के चुनाव से लेखक की जीवन-दृष्टि का भी पता चलता है। जब कोई लेखक किसी विधा का चयन करता है तो एक तरह से वह जीवन-जगत को देखने और व्यक्त करने की दृष्टि और पद्धति का भी चयन करता है। यह प्राय: देखा गया है कि जब कोई लेखक दो अलग-अलग विधाओं में लिखता है, तो उन रचनाओं में अभिव्यक्त जीवन-सत्य और दृष्टि में भी भिन्नता आ जाती है। महादेवी के काव्य और गद्य की जीवन-दृष्टि की भिन्नता को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।

जीवन में व्यवस्था हो या न हो, लेकिन रचना में व्यवस्था जरूरी है। जीवनानुभूति की कोई संरचना नहीं होती, पर जब वह रचना में अभिव्यक्त होगी, तो इसे एक संरचना में ढलना पड़ेगा। इस संरचना या व्यवस्था का अभाव साहित्य-सृजन में अराजकता को जन्म देती है। लेखन में यह संरचना या व्यवस्था स्वत:स्फूर्त न होकर अर्जित होती है। इसको अर्जित करने के लिए कठिन साधना की जरूरत होती है। इसीलिए रचना-कर्म बहुत कठिन मन जाता है।

अगर किसी दौर में रचना-कर्म के लिए विधा या रूप के महत्त्व को नजरअंदाज किया जा रहा हो या विधाओं में आपसी घालमेल हो रहा हो, तो समझना चाहिए कि वह रचनात्मकता के लिए उर्वर न होकर अराजक दौर है। विधा के प्रति उदासीनता सृजन-कर्म को बहुत सतही और आसान बना देती है। इसलिए, ऐसे दौर में लेखक तो खूब पैदा होते हैं और रचनाएं भी बहुत लिखी जाती हैं, पर उल्लेखनीय कम ही साबित हो पाती हैं। हिंदी में पिछले दो दशक, खासकर दो हजार दस के बाद का रचनात्मक परिवेश बहुत हद तक ऐसा ही बन गया है। लेखक कहानी को फुला कर उपन्यास बना रहा है और उपन्यास को पिचका कर लंबी कहानी बना रहा है। कहानी में लेख लिख रहा है, तो उपन्यास में कविता ठेल दे रहा है। सीढ़ीनुमा गद्य लिख कर उसे कविता घोषित कर रहा है। विधा के रूप में रेखाचित्र की तो मौत हो ही चुकी है, संस्मरण की स्थिति भी अच्छी नहीं है। लेखक जिस पर संस्मरण लिख रहा है, उसकी चर्चा कम, अपने व्यक्तित्व का उद्घाटन अधिक कर रहा है। वह आत्ममुग्ध संस्मरण लिख रहा है। कई बार इस तरह की विधागत अराजकता को प्रयोग के नाम पर सही ठहराने के प्रयास होता है। दरअसल, यह प्रयोग नहीं, बल्कि कुछ भी लिख कर उसे साहित्यिक रचना के तौर पर प्रस्तुत करना है। यह एक तरह से लेखकीय असमर्थता का प्रकटीकरण है कि वह विषय-वस्तु को सुसंगत ढांचे में अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा है। उसकी इस अक्षमता के कारण रचना में अभिव्यक्त जीवन-दृष्टि भी खंडित हो जाती है।

इधर कहानी लेखन में सिनेमा की तकनीक का इस्तेमाल कुछ लेखक कर रहे हैं। अब उन्हें यह कौन समझाए कि कहानी और सिनेमा दो बिल्कुल भिन्न माध्यम हैं। कहानी को जब सिनेमा के लिए परिवर्तित किया जाता है, तो उसकी अंतर्वस्तु पूरी तरह बदल जाती है। कहानी सिर्फ विषय-वस्तु (कच्चा माल)है, जो सिनेमा रूपी सांचे से होकर निकलती है, तो कुछ और ही बन जाती है। इसलिए अगर कोई लेखक इस बात को ध्यान में रख कर कहानी लिख रहा है कि उसकी कहानी पर फिल्म बन सके, तो वह कहानी विधा के साथ घोर अन्याय कर रहा है। इस प्रक्रिया में उसकी रचना-दृष्टि और जीवन-दृष्टि दोनों विकृत होती है। उसकी कहानी की अंतर्वस्तु साहित्य के उद्देश्य से बहुत दूर हो जाती है और उसकी कहानियां श्रेष्ठता के दर्जे से नीचे गिर जाती है। रचनाशीलता के क्षेत्र में व्याप्त अराजकता को समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि साहित्य की विधा और रूप के महत्त्व पर बल दिया जाए। आलोचना को विधा और रूप को लेकर कठोर रुख अपनाने की जरूरत है।