यह एक कंपा देने वाली वास्तविकता इतिहास में दर्ज है कि द्वितीय चीन-जापान युद्ध में करीब अस्सी हजार चीनी महिलाओं का बलात्कार जापानी सैनिकों ने किया था। वहीं संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि 2017 में मुसलिम अल्पसंख्यकों के जनसंहार के इरादे से म्यांमा सेना ने रोहिंग्या महिलाओं के साथ यौन हिंसा की। एक समय अमेरिकी सैनिकों के भी इराकी महिलाओं के साथ यौन अपराध करने की कई घटनाएं सामने आई थीं। मतलब साफ है कि कबीलाई झगड़े हों या देशों के बीच वर्चस्व साबित करने को युद्ध हुए हों, अक्सर इसका आसान शिकार महिलाएं ही हुई हैं। अन्य देशों को अपमानित करने, अपनी ताकत दिखाने और अपनी कुंठा निकालने के लिए सैनिकों द्वारा पराजित देश की महिलाओं के प्रति ऐसी यौन हिंसा करना कई युद्धों में आम बात रही है। मगर इससे उस पुरुषवादी मानसिकता को समझा जा सकता है, जिसमें वजह कोई हो, निशाना नारी अस्मिता को ही बनाया गया है। यानी देश ही नहीं, विश्व परिदृश्य तक पुरुषवादी मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।

बलात्कार जहां अपराध है, वहीं यह एक सामाजिक समस्या भी है। मगर अफसोस यह है कि यह समस्या गहरे तक अपनी जड़ें जमा चुकी है और इसे खाद-पानी पुरुषवादी मानसिकता के साथ उन विज्ञापनों, फिल्मों और टीवी धारावाहिकों से भी मिलता है, जिनमें महिला की छवि किसी वस्तु की तरह ‘ग्लैमराइज’ करके पेश की जाती रही है। दर्शकों की भीड़ को आकर्षित करने के लिए अक्सर सिनेमा के पोस्टरों, फिल्म, धारावाहिक के ट्रेलर आदि में उत्तेजित करने वाले अश्लील लिबासों में दृश्यों को दर्शाया जाता है।

बलात्कार इसी सब से पनपी मानसिकता का नतीजा है। इसका गहरा असर मानसिकता पर पड़ता है। क्योंकि आज इंटरनेट के जरिए फिल्में, अश्लील सामग्री देखना आसान हो गया है और मोबाइल अब बच्चों की पहुंच में भी हैं, वे कम उम्र से ही इस तरह की चीजें देखते हैं और उनकी सोच में अपराध घर करने लगता है। ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जब महिलाओं के प्रति आपराधिक मानसिकता रखने और अपराध करने वालों में कम उम्र के लड़के और वृद्ध दोनों ही शामिल पाए गए। महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल तैयार करने की मंशा को देखते हुए यह गंभीर बात है। वहीं छोटी बच्चियों से भी दुष्कर्म जैसे मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि उन पर डर बैठाना ज्यादा आसान होता है और अपराधी बिना किसी डर के लंबे समय तक अपराध करता रहता है।