डॉ. वरुण वीर
वैदिकत्रैतवाद के सिद्धांत पर आधारित समस्त संसार में व्याप्त मनुष्य द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कर्म को तीन सात्विक, राजस तथा तामस गुणों के आधार पर देखा जाता है। वैदिक त्रैतवाद परमात्मा, आत्मा तथा प्रकृति को अनादि मानता है। तीनों का ही अस्तित्व बिल्कुल एक-दूसरे से अलग है। सात्विक, राजस, तामस तीनों गुण प्रकृति के हैं। परमात्मा ने प्रकृति को इन तीनों गुणों के आधार पर ही कर्म और कर्ता के भी तीन-तीन भेद किए हैं। इसी सिद्धांत के आधार पर सात्विक, राजस तथा तामस कर्मों का निर्धारण होता है और इन तीनों गुणों के आधार पर ही कर्म किया जा सकता है या कहा जा सकता है कि कोई भी कर्म इन तीनों गुणों के बाहर नहीं है। इन तीनों गुणों के आधार पर जो कर्म किया जाता है वह बंधनकारी ही होता है और अगर कोई जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा का साक्षात्कार कर मोक्ष को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे सात्विक गुणों को ग्रहण कर अंत में उन सात्विक गुणों तथा संस्कारों को भी निर्मूल नष्ट करना होगा, तभी वह मोक्ष का आनंद ले सकेगा। आज समस्त संसार में राजस तथा तामस कर्म की अधिकता दिखाई देती है। सात्विक कर्म करने वाले भी हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है। इस भौतिकवादी युग में अर्थ और काम का चिंतन तथा उसे पूरा करने की अंधी दौड़ लगी हुई है, इसीलिए हिंसा, अहंकार, वासना, बेईमानी और केवल धन प्रमुख रह गया है। संबंध छोटे और कच्चे हो गए हैं। संबंधों का आधार लोभ, लालच या काम निकलवाना ही रह गया है।
नियतं सडगरहितमरागलेषत: कृतम/ अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते॥ (गीता) यानी जो कर्म आसक्ति रहित किया गया हो, सफलता के बदले कोई फल चाहने वाले द्वारा न किया गया हो तथा राग द्वेष से दूर होकर किया गया हो और जो ऋषि-मुनियों द्वारा शास्त्र मर्यादा अनुसार नियमबद्ध हो वह कर्म सात्विक श्रेणी में आता है। भारतीय समाज बड़ा ही धार्मिक समाज है। वह अधिकतर कर्म परमात्मा को याद कर तथा उसी के नाम पर आरंभ और अंत करता है, जो कि स्वभाव में सहनशक्ति (टॉलरेंस) और आत्मिक बल को बढ़ाता है। यही कारण है कि भारतीय शासकों तथा समाज ने कभी अनैतिक रूप से या धर्म के नाम पर किसी दूसरे धर्म तथा देश पर अपनी विचारधारा थोपने का काम नहीं किया है। हमारी सत्य सनातन परंपरा तथा संस्कार शाश्वत अनादि हैं क्योंकि यह ज्ञान ईश्वर द्वारा मनुष्य को दिया गया है और समूचे विश्व में केवल हम हैं, जिन्होंने इस ज्ञान तथा धर्म को बचा कर रखा हुआ है।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुन:/ क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदा हृतम्॥ (गीता) यानी जो कर्म अनेक प्रकार की कामनाओं को पूरा करने के लिए किया जाता है, जैसे जीवन को वैभवशाली, अनेक साधनों और संसाधनों को पूरा करने के लिए तथा अहंकार की पूर्ति के लिए किया जाए, अनेक प्रकार के कष्ट सहते हुए केवल अपने सुख की पूर्ति के लिए जो कर्म किया जाए, वह राजस श्रेणी में आता है। लोकेषणा अर्थात लोक में प्रसिद्धि, ऊंचा नाम, लोगों में वाहवाही या आत्मप्रसंशा के लिए ही चारों ओर दिखाई देती है। वितेषणा अर्थात व्यक्ति पूरे दिन, महीने तथा सालों इतनी मेहनत करता है कि रात दिन का भी ध्यान नहीं रखता है, न ही अपने शारीरिक मानसिक तथा आत्मिक स्वास्थ्य का ध्यान रख पाता है और उस मेहनत के बदले उसे केवल धन की प्राप्ति होती है। जब वह धन मिलता है तब तक वह अपना शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य खो देता है और आत्मिक संतोष तो मिल ही नहीं पाता है तथा वह पारिवारिक सुख से भी वंचित रह जाता है। राजस कर्म करने में केवल अहंकार की संतुष्टि होती है। आत्मसंतुष्टि नहीं होती है।
अनुबंधं क्षयं हिंसामनवेक्ष्ये च पौरुषम्/ मोहादारभ्यते कर्म यततामसमुच्यते॥ (गीता)
समझौता करके, परिणाम के परिणाम तथा उनके परिणाम, अपना लाभ दूसरों की हानि, अन्यों के प्रति हिंसा, अन्याय तथा अपनी शक्ति पुरुषार्थ का ठीक-ठीक नाप न करके, मूर्खतावश जो कर्म किया जाता है, वह तमोगुण कहलाता है। सामान्य भाषा में कहा जाता है कि ‘अपना काम बनता दन दना दन जनता’। केवल अपना काम बनना चाहिए, चाहे दूसरे का काम बिगड़ जाए या बिगाड़ दिया जाए, उसकी किसी को कोई परवाह नहीं है। चारों तरफ हिंसा, क्रूरता, भ्रष्टाचार तथा मूर्खता के कारण आज समाज में अशांति तथा परिवार में कलह और परिवारों के बिखरने का कारण बन रहा है। तामस कर्म का त्याग कर मन में सुख, शांति तथा प्रसन्नता के लिए सात्विक तथा उच्च श्रेणी के राजसी कर्म करने से गृहस्थ जीवन अच्छे प्रकार से चलता है। पूर्ण सात्विक कर्म होने से भी समाज, परिवार और राष्ट्र नहीं चल सकता है, इसलिए जीवन को चलाने के लिए बुद्धि पूर्वक संतुलित सात्विक तथा राजस कर्मों को करना चाहिए और वह तामसिक कर्म भी ठीक है, जहां अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरे का बुरा न होता हो। इन्हीं तीनों कर्मों के आधार पर तीन कर्ता भी होते हैं।
मुक्त संगोडनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:/ सिद्धयसिद्धयो निर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते॥ (गीता)
आसक्ति रहित ‘मैंने यह किया मैंने वह किया’ इस प्रकार के अहंवाद से शून्य जो अपनी प्रशंसा नहीं चाहता, जो धैर्य तथा उत्साह के साथ कर्म करता है तथा बुद्धि पूर्वक कर्म करने के बाद जो भी परिणाम होता है, चाहे सफलता हो या विफलता उस स्थिति में स्थिर तथा निर्विकार रहता है, ऐसा कार्यकर्ता सात्विक कार्यकर्ता कहलाता है। इस प्रकार की श्रेणी का व्यक्ति सदैव प्रसन्न तथा आनंद में रह कर अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को सुखपूर्वक भोगता है। जीवन में संतोष, अहिंसा, सत्य, तप, स्वाध्याय आदि योग के नियम मनुष्य को सात्विक बनाने में सहायक होते हैं।
रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोडशुचि:/ हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:॥ (गीता) अर्थात अलग-अलग पदार्थों में राग रखने वाला, उत्तम कर्म करके उसके फल की कामना करने वाला, लोभी, अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए हिंसा, बुरे कर्म तथा फल प्राप्ति में हर्ष और फल हानि में शोक मानने वाला कार्यकर्ता रजोगुण कार्यकर्ता कहलाता है। फल की इच्छा रखते हुए कर्म को करना और वह भी अपनी स्वार्थ के लिए और जो कर्म नहीं करना चाहिए, वह केवल इसलिए करना कि धन या अन्य किसी वस्तु की प्राप्ति होगी, यह सभी कर्म सुख के साथ-साथ बड़े दुख के भी कारण होते हैं, क्योंकि इन कर्मों में स्वार्थ तथा लोभ छुपा होता है। अत्यधिक कामनाओं की पूर्ति में हमेशा लगे रह कर कुछ न कुछ पाने की इच्छा रखना, व्यक्ति को व्यस्त तो रखता है, लेकिन संतोषी स्वभाव ही सुख कारक होता है। जीवन पल-पल निकलता चला जाता है और अंत में केवल भौतिक सफलता के अलावा हाथ खाली रह जाते हैं और भौतिक सफलता यहीं रह जाती है।
अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृति कोडलस:/ विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ (गीता) युक्ति पूर्वक सोच-विचार कर कर्म न करने वाला, साधारण भावनाओं वाला अर्थात ऊंची भावनाओं से न प्रेरित, घमंडी, दुष्ट, बदला लेने के स्वभाव वाला, आलसी, उत्साहहीन, और दीर्घ सूत्री अर्थात हर काम को टालने वाला, इस प्रकार के स्वभाव से युक्त कर्म करने वाला कार्यकर्ता तामस कार्यकर्ता कहलाता है। इस प्रकार के लोगों की संख्या अधिक पाई जाती है तभी तो राष्ट्र में हिंसा, किसी भी काम में निपुणता तथा कुशलता का अभाव दिखाई देता है। अगर आप देश में सड़क, पुल, इमारतों तथा कहीं भी कोई भी विकास देखेंगे तो उसमें कार्य की कुशलता दिखाई नहीं देती है। सड़क नई होने के बाद भी उबड़-खाबड़ है, फुटपाथ पर कोई चल नहीं सकता, पुल कुछ ही वर्ष में जर्जर हो जाते हैं। न सफाई है और न ही सुंदर शहर हैं। सभी व्यवस्थाएं अधूरी और बदसूरत दिखाई देती हैं। कारण यही है कि तामस कर्म करने वालों के हाथ में ये सभी कर्म दे दिए गए हैं, इसीलिए परिणाम सुखद और सुंदर नहीं होते हैं। उत्तम नैतिक योग शिक्षा जब तक विद्यालयों का अंग नहीं होगी, तब तक कर्म में कुशलता का आना संभव नहीं होगा। समाज, परिवार, राष्ट्र, व्यक्ति सुखी, संपन्न तथा स्वस्थ रखना है तो जरूरी है कि देश योग शिक्षा को अपनाए।
