योगेश दीक्षित

सहमते हुए उन्होंने श्रीनगर की घटना कह सुनाई। रुस्तम सिंह को विश्वास नहीं हुआ कि एक सिरफिरा आतंकवादी कैसे समर्पण की सोच सकता है। लेकिन जब उन्होंने उसके परिवार की निकटता के बारे में बताया, तो उन्हें संतोष हुआ। रुस्तम सिंह की योजना के मुताबिक उन्होंने समीर को फोन लगाया। समीर जैसे ही आया… सैनिकों ने राइफल तान कर उसे घेर लिया। उसकी तलाशी ली गई और बेड़ियों से उसे जकड़ दिया। वह बोला, बाबूजी आप तो बोले थे कि आजाद हो जाओगे?

शहर आतंकवादी घटनाओं से आक्रांत था। जब तब घटनाएं घटती रहतीं। कभी पुलिस पर हमला होता, तो कभी निर्दोष नागरिकों पर। जीना मुश्किल हो गया था। शाम गहराते ही लोग घर में कैद हो जाते। रातें सहमते हुए गुजरतीं, पता नहीं कब कौन राइफल लेकर आ जाए। वे श्रीनगर में पोस्टिंग पर अभी दो माह पूर्व आए थे। जम्मू में बड़े सुकून से थे, खतरा वहां बहुत कम था, हिंदू आबादी भी बहुत थी। अलगाववादी गतिविधियां कम थीं, लेकिन श्रीनगर की स्थिति बिल्कुल विपरीत थी। फिदायीन हमलों से शहर का कोना-कोना अशांत था। कोई दिन ऐसा न जाता जब दुर्घटना नहीं घटती। मासूम बच्चों और महिलाओं को भी ए नहीं छोड़ते। देश को आजाद हुए सत्तर वर्ष हो गए। कितनी सरकारें बनीं, कितनी गिरीं, कितना विकास हुआ, कितना विनाश, इसका लेखा-जोखा उनके दिमाग में था। फिर भी अपेक्षाकृत विकास ज्यादा हुआ था। सड़कों का जाल बिछा, रेल लाइनों की लंबाई बढ़ी, अस्पताल और शिक्षण संस्थाओं की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई, आर्थिक प्रगति हुई, उत्पादन बढ़ा, लेकिन सांप्रदायिक दंगे नहीं रुके। धर्म-जाति और वैमनस्यता का जहर समाज में घुलता रहा। अलगावादी शक्तियां एकजुटता पर निशाना साधती रहीं।

विकास का रथ, जो नेताओं ने दौड़ाया वह बढ़ तो रहा है, लेकिन दहशतगर्दी कम नहीं कर सका। आगजनी, पत्थरबाजी पर लगाम नहीं लगी। दोस्ती के पैगामों पर भी वार हुए। इसे हम विफलता कहें या अकर्मण्यता… देश धधकती ज्वालाआें के कगार पर खड़ा है। स्वाधीन भारत के मुकुट पर निर्दोषों के रक्त के छींटे उन्हें भाव विह्वल कर देते हैं। आदमी इतना निष्ठुर, दानव कैसे हो सकता है आदि विचार उनके मस्तिष्क में उमड़ रहे थे कि एकाएक दरवाजे की कुंडी बजी। वे आशंकित हो गए, इतनी रात गए कौन हो सकता है! पीछे कमरे में पत्नी और बेबी सो रही थीं। वे आहिस्ता से उठे कि देखें कौन हैं, लेकिन दरवाजा खोलने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। वे वापस बिस्तर पर बैठ गए… तभी दरवाजा जोर से भड़का। वे कंपकपा उठे… जरूर आतंकवादी है। अंदर से पत्नी की आवाज आई, देखो कौन है…।

‘मैं नहीं देखता, तू देख…।’
दरवाजा पुन: भड़का। बेबी जाग गई, ‘पापा कौन दरवाजा भड़का रहा है?’
‘पता नहीं बेटा।’ उनका दिल धड़क उठा।
तभी पहचानी-सी आवाज सुनाई दी, ‘दरवाजा खोलो मम्मी…।’
‘अरे, यह तो राहुल है!’ उन्होंने निश्चिंतता की सांस ली और दरवाजा खोला।
‘इतनी देर क्यों लगाई पापा… कब से कुंडी बजा रहा हूं।’ अंदर आते हुए राहुल बोला।
‘न कोई फोन, न चिट्ठी अचानक कैसे?’
‘पापा दुकान में आग लग गई।’
‘क्या! जम्मू में भी आतंकवादी?’
‘आपको तो हर जगह आतंकवादी दिखते हैं पापा! आग शॉर्ट सर्किट से लगी है। फायर बिग्रेड वाले जल्दी नहीं आते, तो बहुत बड़ा नुकसान हो जाता।… आग पर जल्दी काबू पा लिया गया, ऊपर नहीं फैल पाई।’
‘तेरे को तो कुछ नहीं हुआ? बहू, बंटी कैसे हैं?’ मां ने बेटे की बलैयां उतारते हुए पूछा।
‘मां सब कुशल से हैं। आग बड़े सुबह लगी, जैसे ही दूकान खोली आग की लपटें देखी, तुरंत फायरबिग्रेड को फोन किया।
‘नुकसान तो बहुत हो गया होगा?’
‘इलेक्ट्रिक का सामान और शोकेस ही जला है। अलमारियां बच गर्इं।’
‘चलो कोई बात नहीं, चल अंदर आराम कर, थक गया होगा… खाना खाया कि नहीं?’
‘मैं खाकर आया हूं।’ कह राहुल अंदर चला गया। वे दीवान पर लेट गए।
राहुल और बेबी उनकी दो संतानें थीं। बेबी को वे अपने साथ ले आए थे। उसका स्कूल में दाखिला करा दिया था। राहुल की जम्मू में इलेक्ट्रिक दुकान थी। उसके एक नन्ही-सी बच्ची थी, जिसकी चिंता उन्हें लगी रहती थी।
राहुल दो दिन रुक कर चला गया। उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं थी कि पापा श्रीनगर में नौकरी करें। उसे मम्मी पापा की चिंता लगी रहती थी। उसने पापा को वीआरएस लेने की सलाह भी दी थी। मगर वे अपने फैसले पर अडिग रहे। नौकरी के दो वर्ष ही बचे थे, वे पूरी नौकरी कर रिटायर होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी। वे सजग, कर्तव्यनिष्ठ, शासकीय सेवा में लगे रहे। उन्होंने जम्मू हेडक्वार्टर में उच्च अधिकारी से आग्रह भी किया था कि उनकी सेवा के मात्र दो वर्ष शेष हैं, उन्हें जम्मू में रखा जाए। मगर उच्च अधिकारी ने इनकार कर दिया। बोले, राज्य शासन का आदेश है, वे कुछ नहीं कर सकते। विवश होकर उन्हें श्रीनगर आना पड़ा।
शहर के एक छोर पर उन्हें किराए का मकान मिला, जो उन्हें अशांत ही किए रहा। हनुमान चालीसा पढ़ते उनकी दिनचर्या शुरू होती और कालीमंत्र पढ़ते वे सोते।
सुबह का अखबार जब उनके हाथ लगता तो अंदर का दर्द छलक उठता, नजरें जम-सी जातीं। डकैती, अपहरण की खबरें उन्हें विचलित कर देतीं। वे सोचते, आतंकवादियों को क्या मिलता है निर्दोषों की हत्या करते, मासूमों को रौंदते, महिलाओं का अपहरण करते।
यह कैसा धर्म, यह कैसी इबादत है जो मनुष्य को मनुष्य न समझे। ऐसी बर्बरता तो उन्होंने इतिहास के पन्नों में भी नहीं पढ़ी थी। जो घट रहा था मनुष्यता से परे था, जानवरों से बदतर था। इसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है, लेकिन उनकी सोच से क्या होता है। यह तो विनाश काले विपरीत बुद्धि…।
आज अट्ठावन वर्ष की अवस्था में वे जिस शांति और निर्भीकता से शासकीय सेवा करना चाहते थे, उसमें भी उन्हें भय दिख रहा था। असुरक्षा की भावना उन्हें जंजीरों से जकड़े थी; नौकरी के शेष दो वर्ष उन्हें काल-सर्प से लग रहे थे। पूरा कर पाते हैं कि नहीं, यह चिंता उन्हें सताती रहती।
किसी तरह असमंजस की स्थिति में एक वर्ष बीत गया। यह साल बीत जाए, यही उनकी प्रार्थना थी, लेकिन समय को कोई नहीं जानता। अकसमात वे विषम स्थिति में फंस गए। जो भय उन्हें सताता रहता था वह घटित हो ही गया।
वे खाना खाकर लेटे ही थे कि पीछे की खिड़की तोड़ कर तीन आतंकवादी घर में घुस आए। उनकी घिग्घी बंध गई। पत्नी बेहोश होकर गिर पड़ी, बेबी भय से कंपकपाती पलंग के नीचे छिप गई। तीनों आतंकवादियों ने चेहरे पर काला कपड़ा बांध रखा था। वे हथियारों से लैश थे। बड़े खूंखार लग रहे थे। एक आतंकवादी उनके सिर पर रिवाल्वर तान कर बोला, ‘निकाल माल कहां छिपा कर रखा है।’
कुछ नहीं है, हम कर्मचारी है… भाई।’
‘चुप, चाबी दे…।’
‘अलमारी खुली है… ले लो जो लेना हो… हमारी जान बख्शो…।’
‘चल निकाल कर दे’, दूसरा उन्हें धकेलते हुए बोला। वे चारपाई पर गिरते-गिरते बचे।
तीसरा आतंकवादी स्टेनगन लिए उनके सामने आया। भय से वे कंपकपा गए… हाथ जोड़ते हुए उसके पैरों में गिर पड़े। उसने उन्हें उठाया, गौर से देख कर स्टेनगन नीचे कर साथियों से बोला, छोड़ो इसे चलो…।’
वे फर्रांटे से खिड़की कूद कर भाग गए।
वे अवाक खड़े रह गए… उन्होंने अपने को टटोला, दुरुस्त हैं, सचमुच बच गए। मौत तो समक्ष खड़ी थी, यह सब कैसे हुआ। समझ नहीं पाए। पत्नी अब भी बेहोश पड़ी थी, उसे जगाया। बेबी भी पलंग के नीचे से बाहर आ गई। बोली, ‘पापा आपको मारा क्या?’
‘नहीं बेटा, मारने तो आए थे, चले गए। भगवान ने बचा लिया।’
अगले दिन एक आतंकवादी सैनिक के भेस में पुन: उनके घर आया, वे घबड़ा गए। हाथ जोड़ कर बोले, ‘भाई हमारी जान बख्शो, कल ही हम लोग यह शहर छोड़ देंगे।’
‘आप कहीं नहीं जाएंगे, यही रहेंगे।’
‘नहीं, मैं नहीं रुक सकता। मुझे माफ करो भाई, सुबह ही मैं यह घर छोड़ दूंगा।’
‘ मैंने कहा न, कहीं जाने की जरूरत नहीं। आप यहां आराम से रहिए।’
‘यह कैसी सजा दे रहे हो, मेरे छोटे बच्चे हैं, परिवार है, रहम करो…।’
‘कुछ नहीं होगा… बाबू मुझे पहचाना नहीं’, चेहरे से काला कपड़ा हटाते हुए, वह बोला, ‘मैं समीर…।’
‘तुम समीर हो?’
‘हां बाबूजी मैं आपका अहसान कैसे भूल सकता हूं आपने मेरी अम्मी को बचाया, मेरी बीवी की नौकरी लगाई। मुझे अपना फर्ज तो निभाने दो।’
वे एक क्षण उसे देखते रह गए। यह वही समीर है, जो वर्षों पहले उनके घर काम करता था, बाजार-हाट से सामान लाता था।… यह आतंकवादी कैसे? बोले, ‘बेटा तुम तो सीधे-सरल थे। यह रूप तुमने कैसे धारण कर लिया?’
‘लंबी कहानी है, बताता हूं। पहले मुझे चाय तो पिलाओ… मां जी के हाथों की चाय बहुत दिनों से नहीं पी।’
‘अभी लाई बेटा…।’ पत्नी जल्दी किचन में घुस गई।
‘बाबूजी, मैं इस रास्ते पर जबर्दश्ती ढकेल दिया गया। मेरा एक मित्र शहजादा, जिस पर मैं बहुत भरोसा करता था वह अपने दिल की बात भी मुझसे करता था। मुझे नहीं पता था उसके दिल में शैतान का जहर फैला है। उसके संबंध संदिग्ध लोगों से थे। मेरे घर के कमरे में रहते हुए उसने भयानक जाल बुना, किसी को कानोंकान खबर नहीं लगी। एक दिन उसने मुझे थैला देकर स्टेशन चलने को कहा। मुझे नहीं मालूम था उस थैले में क्या है। उसके आदेशानुसार वह थैला मैंने एक दुकान पर खड़े एक व्यक्ति को दिया और जैसे ही मुड़ कर मुख्य सड़क पर पहुंचा, जोरदार धमाका हुआ। पुलिस हमें पकड़ने दौड़ी। मैं छिपता हुआ शहजादे के पास पहुंचा। पुलिस को मुझ पर शक हो गया था। पकड़े जाने के डर से मैं गिरोह में शामिल हो गया। आप तो जानते ही हैं कि कालिख की कोठरी में जो एक बार गया, उसका साबुत निकलना कितना मुश्किल है। अब तो जुल्म के इतने दाग लग गए, जो साफ हो ही नहीं सकते।
उसकी कहानी सुन कर उनका हृदय द्रवित हो गया कि कैसे एक सीधा सच्चा इंसान जुर्म की दुनिया में चला गया। एक दीर्घ श्वास लेते हुए उन्होंने कहा, ‘एक रास्ता है।’
‘क्या’? उत्सुकता से उसने पूछा।
‘तुम आत्मसमर्पण कर दो।’
‘कैसे, वे मुझे देखते ही मार देंगे।’
‘नहीं… मैं बात करता हूं। तुम्हें कुछ नहीं होगा, मुझ पर विश्वास है तो मुझे अपना मोबाइल नंबर दे दो।’
‘आपके लिए मेरे प्राण समर्पित हंै। मेरा नंबर नोट कीजिए।…’
उन्होंने तुरंत नंबर नोट किया। वह उनके चरण स्पर्श कर चला गया।
उसके जाने के बाद पत्नी उन पर बरस पड़ी, ‘यह क्या कर रहे हो… वह समीर नहीं रहा, आतंकवादी है। अगर किसी ने उसे यहां से निकलते देख लिया, तो हम सब जेल में होंगे।’
‘नहीं भाग्यवान, उसकी मदद करनी चाहिए। वह जुर्म के दलदल में फंसा है, उसे सहारे की जरूरत है।’
‘तुम्हें कौन सहारा देगा… पुलिस पकड़ के ले गई, तो हम बर्बाद हो जाएंगे। क्यों इस लफड़े में पड़ते हो। ये आतंकवादी कभी किसी के सगे नहीं होते। इनके सिर पर खून सवार रहता है।’
‘नहीं, वह ऐसा नहीं है। अगर उसे मारना होता, तो उसी दिन ट्रिगर दबा देता।…’
‘मुझे तनिक भरोसा नहीं। चलो, सामान बांधो, अपन सुबह ही जम्मू चलते हैं।’
‘नहीं, तुम बेबी के साथ चली जाओ। मैंने उसे वचन दिया है, मैं उसका आत्मसमर्पण करा के आऊंगा।’
‘सठिया गए तुम… करो जो करना हो।’ पत्नी रोती हुई अंदर चली गई।
वे विचार में पड़ गए कि वचन तो उन्होंने दे दिया है… उसका आत्मसमर्पण कैसे कराएं। पुलिस कहीं उसका एन्काउंटर न कर दे। वे स्वयं शक के दायरे में आ सकते हैं। पत्नी सही कहती है, जोखिम तो है।… पीछे कैसे हटें। चिंताआें के बादल मस्तिष्क पर छा गए।
तभी उन्हें अपने मित्र रुस्तमसिंह का नाम याद आया। वह आर्मी बटालियन में मेजर था। जम्मू में ही उसकी पोस्टिंग थी; वह उनका लंगोटिया यार था, वह मदद कर सकता है। यह सोच कर उन्होंने डायरी निकाली और फोन पर उंगली रखी ही थी कि अंदर से पत्नी आई और फोन झपटते हुए बोली, पहले मेरा गला घोंट दो फिर फोन करना।
वे स्तब्ध रह गए, कि यहां कुछ नहीं कर सकते। जम्मू से ही कुछ हो सकता है। इसलिए पत्नी की बात मान ली और उससे जम्मू चलने को कहा। पत्नी ने राहत की सांस ली।
सुबह होते ही वे परिवार सहित जम्मू के लिए रवाना हो गए।
जम्मू में भी उन्हें चैन नहीं मिला। समीर का चेहरा सामने झूल जाता। कहता, बाबूजी आप ही कुछ कर सकते हैं। मुझे दलदल से बाहर निकाल दीजिए। ये विचार उन्हें जीने नहीं दे रहे थे। जितना ही दूर हटते, उतने ही विचलित होते। आखिर उन्होंने रुस्तम सिंह से मिलने का फैसला कर लिया।
सुबह-सुबह उनके बंगले पहुंच गए। मित्र को देख रुस्तम सिंह भावविह्वल हो गए। उन्हें गले लगाते ड्राइंग रूम में ले गए। बोले कैसे हो, बहुत दिन बाद आए।
‘एक जरूरी काम से आया हूं।’
‘हां हां बताओ।’
‘कहां से शुरू करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा।’
‘बोलो, शुरू हो जाओ… तकल्लुफ कैसी?’
सहमते हुए उन्होंने श्रीनगर की घटना कह सुनाई। रुस्तम सिंह को विश्वास नहीं हुआ कि एक सिरफिरा आतंकवादी कैसे समर्पण की सोच सकता है। लेकिन जब उन्होंने उसके परिवार की निकटता के बारे में बताया, तो उन्हें संतोष हुआ।
रुस्तम सिंह की योजना के मुताबिक उन्होंने समीर को फोन लगाया।
समीर जैसे ही आया… सैनिकों ने राइफल तान कर उसे घेर लिया। उसकी तलाशी ली गई और बेड़ियों से उसे जकड़ दिया। वह बोला, बाबूजी आप तो बोले थे कि आजाद हो जाओगे?
‘बेटा आजादी तुम्हें अवश्य मिलेगी कानूनी कार्यवाही तो पूरी होने दो।’
वह बैरक में चला गया। वे नम आंखों से घर आ गए। उन्हें संतोष था कि आतंकवादी शरणागत तो हुआ।