रेनू सैनी
बच्चो, कल स्कूल में एक कार्यक्रम होगा। उसमें पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा तक के बच्चे भाग लेंगे।’ अंजलि मैडम ने कहा।
‘मैडम किस तरह का कार्यक्रम होगा।’ अवनि अपनी बड़ी-बड़ी आंखें घुमाते हुए बोली।
‘कल स्कूल में ईमानदारी की दुकान लगेगी और उसमें तुम सब बच्चे अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीद सकोगे।’
यह सुनते ही चौथी कक्षा के सभी बच्चे खुशी से चहक उठे।
कुछ सोच कर युग बोला, ‘मैडम, उस दुकान में हमें मुफ्त में सामान मिलेगा?’
यह तुमने बड़े काम की बात कही। बेटा, आप सभी एक बात याद रखो कि इस दुनिया में मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। कुछ पाने के लिए सदा मेहनत करनी पड़ती है। जो लोग बिना मेहनत के कुछ पाने की इच्छा रखते हैं, वे जीवन में कामयाब नहीं होते।’
आयुशी बोली, ‘मैडम, पर पृथ्वी पर जल, वायु तो हमें मुफ्त में मिलते हैं न!’
‘बच्चो, जल और वायु भी मुफ्त में नहीं मिलते। ये तो अत्यंत अनमोल हैं। अभी तुम्हें इनकी कीमत नहीं देनी पड़ती, इसलिए लगता है कि ये मुफ्त में मिलते हैं। लेकिन इसके लिए तुम्हारे पूर्वजों ने अत्यंत मेहनत की थी। उन्होंने अधिक मात्रा में पेड़ लगाए, स्वच्छता को अपनाया तो तुमने यह सब पाया। तुम्हारे पूर्वजों ने तो इसके लिए कीमत चुकाई न। इतना ही नहीं, आज हम सभी जगह-जगह पेड़ लगाते हैं, जल का दुरुपयोग नहीं करते हैं, यह भी एक तरह से जल और वायु को प्राप्त करने की कीमत ही है।’
तभी हितैशी बोली, ‘मैडम, मैं अपने जन्मदिन पर अपने माता-पिता के साथ अपनी आयु जितने पेड़ लगाती हूं। इस बार मेरा आठवां जन्मदिन था, तो मैंने आठ पेड़ लगाए।’
‘शाबास। सभी बच्चों को ऐसा करना चाहिए, तभी तो हम उचित मात्रा में जल और वायु प्राप्त करेंगे।’
तपस बोला, ‘मैडम, ईमानदारी की दुकान की बात तो बीच में ही रह गई। आपने बताया नहीं कि क्या हमें उस दुकान से सामान लेने के लिए घर से पैसे लाने होंगे।’
‘हां बच्चों, आप सब अपने माता-पिता से अपनी पॉकेट मनी मांग कर ला सकते हैं। पर हां आपमें से कोई भी बच्चा मम्मी-पापा से अधिक रुपयों की मांग नहीं करेगा। वे जो देंगे आप चुपचाप ले लेंगे। आपकी डायरी में मैंने इस बारे में नोट भी चिपका दिया है।’
सभी बच्चे बेसब्री से कल का इंतजार करने लगे। आखिर ईमानदारी की दुकान कैसी होती है, किसी भी बच्चे ने इस बारे में नहीं सुना था।
अगले दिन बच्चे स्कूल पहुंचे तो देखा कि चॉकलेट, आइसक्रीम और खिलौनों की दुकानें लगी हुई थीं। हर दुकान पर बस एक ही नाम लिखा हुआ था ‘ईमानदारी की दुकान’। सबसे हैरानी की बात तो यह थी कि इन दुकानों पर कोई भी व्यक्ति सामान देने के लिए नहीं बैठा था। बस हर सामान की कीमत लिखी थी। बच्चों को अपनी पसंद का सामान उठा कर उस पर लिखी कीमत एक गुल्लक में डालनी थी। यह देख कर बच्चे आश्चर्य से एक-दूसरे से बातें करते हुए बोले, ‘ऐसा तो सिर्फ सपनों में होता है। जब हमें कोई देख ही नहीं रहा तो हम सामान की कीमत क्यों दें? क्यों न चुपचाप सामान ले लें।’ फिर वे सभी अपनी-अपनी पसंद का सामान लेने दुकानों की ओर बढ़ चले। पर यह क्या, जैसे ही बच्चों ने अपनी पसंद का सामान उठाया, तुरंत उन्हें माता-पिता और टीचर की बातें याद आर्इं कि कभी भी बेईमानी नहीं करनी चाहिए। ईमानदारी एक ऐसा गुण है, जिसके बल पर व्यक्ति सब कुछ प्राप्त कर सकता है। बस फिर क्या था, सभी बच्चों ने सामान की कीमत गुल्लक में डाली और सामान अपने हवाले कर लिया। बच्चों को आज अचानक बड़े हो जाने का बोध हो रहा था। सब कुछ उनके हाथ में था। अपनी पसंद के खिलौने, खाने-पीने की चीजें, सभी कुछ वे अपनी पसंद से ले सकते थे और उसकी कीमत भी चुपचाप चुका सकते थे।
कई बच्चे, जिनके माता-पिता आर्थिक रूप से अधिक संपन्न नहीं थे, उनका तो फिजूल के खिलौनों और चीजों की तरफ देखने का मन भी नहीं हो रहा था। बच्चे अपने आप ही सोच रहे थे कि छोटी-सी चीज के लिए पचास रुपए देकर क्यों पैसे व्यर्थ किए जाएं। इनसे अधिक उपयोग की वस्तु आ सकती है।
दो घंटे तक ईमानदारी की दुकान चलती रही। दुकानों का अधिकांश सामान बिक गया और गुल्लक में पैसे भी आ गए। अब बात हुई कि क्या गुल्लक में सामान के पूरे पैसे आए हैं या कम। गिन कर देखा गया तो रुपए कम आए थे। इसका अर्थ था कि कुछ बच्चों ने सामान की कीमत या तो कम दी थी या दी ही नहीं थी। लेकिन इस बात का पता लगाना मुश्किल था कि किसने रुपए दिए और किसने नहीं या किसने कम दिए।
यह देख कर प्रिंसिपल बोलीं, ‘बेटा, ईमानदारी की दुकान में आप सभी दुकानदार थे और सभी खरीदार। अगर खरीदी गई चीजों की पूरी कीमत नहीं आई, तो इसमें दोष किसका हुआ? दुकानदार का। क्योंकि दुकानदार का फर्ज होता है कि वह दुकान का ध्यान रखे, साथ ही ईमानदारी से दुकान चलाए। इसका अर्थ यह हुआ कि आप सभी अच्छे दुकानदार नहीं हैं। यह सुन कर उन बच्चों को बेहद पछतावा हुआ, जिन्होंने सामान की कीमत नहीं चुकाई थी या कम चुकाई थी। उन्हीं में से प्रांशु भी था। वह खड़ा होकर बोला, ‘मैडम, क्यों न एक बार फिर से ईमानदारी की दुकान लगाई जाए। इससे जिन बच्चों ने सामान की कीमत नहीं चुकाई या कम चुकाई, वे इस बार सामान से अधिक कीमत चुका कर अपनी कमी को पूरा करेंगे और बेईमानी को सदा-सदा के लिए अपने अंदर से निकाल देंगे।’ प्रांशु की बात पर सभी बच्चों ने सहमति जताई।
यह सुन कर प्रिंसिपल बोलीं, ‘ठीक है, अगले सप्ताह फिर से ईमानदारी की दुकान लगाई जाएगी और इस बार सभी दुकानों की गुल्लक में पूरे पैसे आए तो सभी दुकानदारों यानी कि आपको पुरस्कृत किया जाएगा।’ यह सुन कर बच्चे खुशी से झूम उठे। प्रिंसिपल के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गई। आखिर ईमानदारी की दुकान के बहाने उन्होंने सभी बच्चों को ईमानदार जो बना दिया था।
