ईश्वर चंद्र विद्यासागर शिक्षाविद्, संस्कृत के विद्वान और महान समाज सुधारक थे। उन्होंने न केवल बंगाली वर्णमाला को बदला, बल्कि हिंदू रूढ़िवादिता को चुनौती देते हुए विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रारंभिक जीवन
ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के वीरसिंह गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम ईश्वर चंद्र वंद्योपाध्याय था। नौ साल की उम्र में वे अपने पिता के साथ मिदनापुर से कोलकाता आ गए और संस्कृत कॉलेज में पढ़ाई शुरू कर दी। वे पढ़ाई-लिखाई में सबसे आगे थे। प्राय: सभी परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करते। उत्तम शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए उन्हें छात्रवृत्ति मिलती रही। इसके बावजूद वे बच्चों को ट्यूशन दिया करते थे, ताकि परिवार को आर्थिक रूप से थोड़ा सहारा मिल जाए। संस्कृत कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद 1839 में उन्होंने कानून की डिग्री प्राप्त की। संस्कृत कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने संस्कृत व्याकरण, साहित्य, भाषाशास्त्र में योग्यता प्राप्त की। यहीं उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि से नवाजा गया। चौदह साल की उम्र में उनका विवाह दिनमणी देवी के साथ हुआ।
सामाजिक कार्यों की ओर रुझान
इक्कीस साल की उम्र में फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के रूप में उन्होंने पदभार ग्रहण किया। 1846 में इस पद को छोड़ कर संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव हो गए। पहले ही साल विद्यासागर ने शिक्षा व्यवस्था में कई महत्त्वपूर्ण बदलाव किए, जिसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद वे दोबारा फोर्ट विलियम कॉलेज में बतौर हेड क्लर्क जुड़े। विद्यासागर ने अमूल्य अंबाती सुधारक द्वारा 1856 में कोलकाता में बारिशा हाई स्कूल की स्थापना की। यहीं से वे सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेने लगे। वे समाज में महिलाओं और विधावाओं की स्थिति को लेकर चितिंत रहते। विद्यासागर ने बाल-विवाह और बहुविवाह प्रथा के उन्मूलन का मुद्दा उठाया। उन्होंने निम्न जाति के छात्रों के लिए कॉलेजों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के दरवाजे खोले, जो पहले केवल ब्राह्मणों के लिए आरक्षित थे। उदारता और सहृदयता के कारण लोग उन्हें ‘दयासागर’ भी कहते थे।
विधवा विवाह
ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने जुलाई 1856 में हिंदू विधवा-पुनर्विवाह का कानून पारित करवाया था। खुद विद्यासागर ने अपने बेटे का विवाह एक विधवा से करवाया था। इस अधिनियम से पहले तक हिंदू समाज में उच्च जाति की विधवा महिलाओं को दुबारा शादी की इजाजत नहीं थी। 1856-60 के मध्य इन्होंने पचीस विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। विद्यासागर ने महिलाओं की शिक्षा के लिए प्रयास किया और इसी क्रम में उन्होंने पैंतीस स्कूल खुलवाए। इसके अलावा बाल विवाह की प्रथा को सख्ती से चुनौती दी।
साहित्यिक अवदान
वे साहित्य के क्षेत्र में बांग्ला गद्य के प्रथम प्रवर्तकों में थे। उन्होंने बावन पुस्तकों की रचना की, जिनमें चौदह संस्कृत में, पांच अंग्रेजी और शेष बांग्ला में हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, ‘वैतालपंचविंशति’, ‘शकुंतला’ तथा ‘सीतावनवास’। इसके अलावा विद्यासागर ने बंगाली वर्णमाला का पुनर्निर्माण किया और बारह स्वरों और चालीस व्यंजनों की एक वर्णमाला में बंगाली टाइपोग्राफी को सरल बनाया।
निधन
ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने जीवन के अंतिम अठारह-बीस वर्ष झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड़ में संताल आदिवासियों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। सत्तर वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
