क्षमा शर्मा
ऑटो लेने के लिए ऑटो स्टैंड तक आई थी। खैरियत थी कि वहां कई आॅटो खड़े थे। मगर नीली वर्दी वाले चालक एक जगह घेरा बना कर खड़े थे। एक लड़की की जोर से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। थोड़ी दूर खड़ी होकर देखने लगी कि मामला क्या है। लड़की क्यों चिल्ला रही है। क्या उसके साथ किसी ने बुरा वर्ताव किया है। छेड़खानी की है। पता चला कि आॅटो वाले ने उस तरफ जाने से मना कर दिया था, जिस तरफ लड़की जाना चाहती थी। वह इसी से नाराज होकर आॅटो वाले को मां-बहन की गालियां दे रही थी। हां, यह बात अलग है कि उसने उन गालियों का अंगरेजी अनुवाद कर लिया था। हिंदी की गालियां अंगरेजी मेंअनूदित होकर पढ़े-लिखेपन का सबूत देती हैं। बहुत-सी लड़कियां शायद ऐसा ही सोचती हैं, इसीलिए वह लड़की भी धाराप्रवाह गाली दे रही थी।
हिंदी फिल्मों में भी इन दिनों प्रचुर मात्रा में औरतों के मुंह से वही गालियां दिलवाई जा रही हैं, जो पुरुष देते रहे हैं। ऐसे महिला चरित्रों को बदलाव का प्रतीक बताया जा रहा है। उन्हें बोल्ड बताया जा रहा है। अगर औरतों के अपमान से भरी गाली देने से ही किसी चरित्र की ताकत की असली पहचान होती है, तो सड़क छाप शोहदे सबसे ताकतवर कहला सकते हैं। और वे ही स्त्री विमर्श की असली पहचान बताए जा सकते हैं। सच तो यह है कि औरतों के मुंह से पुरुषों वाली गालियां दिलवा कर सोचा जाता है कि इससे किसी फिल्म या रचना को अधिक पाठक और दर्शक मिलते हैं। जबकि ये गालियां बदलाव नहीं ‘सेल वैल्यू’ का प्रतीक हैं।
बरसों पहले एक मित्र ने बातचीत में कहा था कि वे इन दिनों कहानियां नहीं पढ़ पाते। क्योंकि कहानियों में गालियां बहुत बढ़ गई हैं। औरतों की कहानियों में भी। उनकी बात सुन कर सबसे पहले वही तर्क दिमाग में आया कि कहानियों में अगर पुरुष लेखक गाली दे सकते हैं, तो औरतें क्यों नहीं। औरतों पर इस तरह की रोक लगाना और गाली देने के कारण उनकी रचनाओं को खदेड़ना कहां तक ठीक है। लेकिन बाद में सोचने लगी, तो दी जाने वाली गालियों पर ध्यान गया। यह भी लगा कि दरअसल, गाली देना एक चमत्कार पैदा करना भी है कि देखो, अगर कोई हमें गाली दे सकता है, तो पलट कर हम भी उसे वही गाली दे सकते हैं। शर्म और लिहाज का जो चोला अब तक औरतों को ओढ़ाया गया था, उसके दिन जा चुके हैं। औरतें भी जैसे को तैसा करना सीख गई हैं। और यह तर्क भी कि औरतें तो हमेशा से गाली देती आई हैं।
अब अगर वे कहानी, उपन्यासों अपनी रचनाओं में पात्रों के मुंह से गालियां दिलवा रही हैं, तो ऐसा कौन-सा कुफ्र हो गया। वैसे यह तर्क भी इन दिनों दिया जाता है कि अगर शाकाहारी रचनाएं पढ़नी हों तो गीता प्रेस गोरखपुर से छपी किताबें पढ़िए, साहित्य पढ़ने की क्या जरूरत। यानी कि साहित्य में गालियां देना मांसाहारी होना है। और प्रकारांतर से जो मांसाहारी होते हैं, वे ज्यादा गालियां देते होंगे। कितनी उथली सोच है। मांसाहारियों को एक झाड़ू से अशिष्ट के खाते में डालना। और यह तर्क देना कि शिष्टता और सभ्यता की बातें वे करते हैं, जिनकी सोच पिछड़ी होती है। आखिर शिष्टता की सारी उम्मीद औरतों से ही क्यों की जाए। मगर गाली देने वाले आदमियों को भी कौन शिष्ट मानता है। कौन कहता है कि गाली देकर वे बहुत अच्छा कर रहे हैं। समाज को बहुत आगे बढ़ा रहे हैं। किसी क्रांति के बीज बो रहे हैं। सच तो यह है कि गालियां हमारे मन की भड़ास निकालने का साधन होती हैं। चूंकि किसी ताकतवर का साधनहीन होने के कारण आम लोग कुछ नहीं बिगाड़ सकते, इसलिए उसे गाली देते हैं। और जो कमजोर होता है, वही गालियां देता है। गालियां कमजोर का अस्त्र हैं, तो क्या औरतें कमजोर हैं, इसलिए गालियां दे रही हैं। और उन्हीं गालियों को चुन रही हैं, जो आज तक पुरुष देते आए हैं।
आपने देखा होगा कि पुरुषों के मुंह से जिस तरह की गालियां निकलती हैं, वे आमतौर पर औरतों को संबोधित होती हैं। उनके नाते-रिश्तेदारों से लेकर उनके तमाम संबंधों से जुड़ी होती हैं। इसके अलावा ये औरतों के यौन संबंधों का बयान करती हैं। ‘सेक्स’ गालियों का सबसे बड़ा वाहक है। औरतों का हर क्रिया-कलाप, उनका रहन-सहन, सब गालियों के योग्य है। अगर औरतें ये गालियां दे रही हैं और अपने को भारी स्त्री विमर्शकार समझ रही हैं, तो अफसोस है, क्योंकि वे तो एक तरह से उसी पुरुष विमर्श को पुख्ता कर रही हैं, जिससे आज तक परेशान होती आई हैं। अपने ही मुंह से औरतों को लक्षित गालियां देकर, वे नया कुछ नहीं कर रहीं। औरतों के मुंह से लगातार पुरुष वर्चस्ववादी गालियां सुन कर यह बात बार-बार साबित हो रही है कि जो हमें सताता है, जिसकी हम निंदा करते हैं, अंतत: हम वैसे ही बन जाना चाहते हैं। घृणा हमें उससे दूर नहीं फेंकती जिससे हम घृणा करते हैं, बल्कि उसकी नकल करना सिखाती है और अंतत: वैसा ही बना देती है।
अपने यहां औरतें गाली देती रही हैं, मगर वे नहीं जो इन दिनों अपने को पढ़ी-लिखी और सशक्त कहने वाली औरतें देती हैं। ग्रामीण समाजों में सोहर से लेकर तमाम अवसरों पर गालियां दी जाती रही हैं। मशहूर कवयित्री अनामिका ने एक बार लिखा था कि कैसे बिहार में एक अवसर पर औरतें अपने ही परिजनों को खूब गालियां देती हैं, जिससे कि उन पर आने वाली व्याधियां नष्ट हो सकें। मगर औरतों द्वारा दी जाने वाली गालियां औरतों के नाते-रिश्तेदारों के लिए नहीं होतीं। हमने ज्योनार के अवसर पर लड़की के परिवार की तरफ से गीत गाने वाली औरतों को लड़के के तमाम परिवार वालों को खूब गालियां देते सुना है। इसकी एक वजह ससुराल वालों को यह बताना भी है कि वे सताएंगे, तो घर की औरतों से गालियां खाएंगे।
इसके अलावा जब दो औरतों की लड़ाई हो जाती थी, तो वे खूब गालियां देती थीं। मगर वे गालियां वे नहीं होतीं, जिनका इस्तेमाल प्रचुर मात्रा में पुरुष करते हैं। ध्यान से देखें तो ये गालियां किसी अन्याय और आर्थिक नुकसान को लेकर दी जाती हैं। वंश मिटने की कामना किसी का सबसे बड़ा नुकसान माना जाता रहा है। औरतों को इस पीड़ा को लगातार झेलना भी पड़ है। जिस औरत के बच्चे नहीं होते, उसे इस तरह की गालियां सुननी पड़ती रही हैं, इसलिए पलट कर वे भी वैसी ही गालियां देती रही हैं। लेकिन शहरी समाज में औरतों द्वारा वही गालियां दिया जाना, जो पुरुषों के कोश की हैं, दरअसल पुरुष विमर्श को ही आगे बढ़ाना है।
